महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 851, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षिप्रमानय तं पापं राज्यलुब्धं सुयोधनम् ॥ ३० ॥ सहमित्रं सहामात्यं ससोदर्यं सहानुगम् । शक्नुयां यदि पन्थानमवतारयितुं पुनः ॥ ३१ ॥ यह सुनकर धृतराष्ट्रने विदुरसे कहा—'तुम उस पापात्मा राज्यलोभी दुर्योधनको उसके मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों तथा अनुगामी सेवकोंसहित शीघ्र मेरे पास बुला लाओ। यदि पुनः उसे सन्मार्गपर उतार सकूँ तो अच्छा होगा' ॥ ३०-३१ ॥ ततो दुर्योधनं क्षत्ता पुनः प्रावेशयत् सभाम् । अकामं भ्रातृभिः सार्धं राजभिः परिवारितम् ॥ ३२ ॥ तब विदुरजी राजाओंसे घिरे हुए दुर्योधनको उसकी इच्छा न होते हुए भी भाइयोंसहित पुनः सभामें ले आये ॥ ३२ ॥ अथ दुर्योधनं राजा धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत । कर्णदुःशासनाभ्यां च राजभिश्चापि संवृतम् ॥ ३३ ॥ उस समय कर्ण, दुःशासन तथा अन्य राजाओंसे भी घिरे हुए दुर्योधनसे राजा धृतराष्ट्रने कहा— ॥ ३३ ॥ नृशंस पापभूयिष्ठ क्षुद्रकर्मसहायवान् । पापैः सहायैः संहत्य पापं कर्म चिकीर्षसि ॥ ३४ ॥ 'नृशंस महापापी! नीच कर्म करनेवाले ही तेरे सहायक हैं। तू उन पापी सहायकोंसे मिलकर पापकर्म ही करना चाहता है ॥ ३४ ॥ अशक्यमयशस्यं च सद्भिश्चापि विगर्हितम् । यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्येत् कुलपांसनः ॥ ३५ ॥ 'वह कर्म ऐसा है, जिसकी साधु पुरुषोंने सदा निन्दा की है। वह अपयशकारक तो है ही, तू उसे कर भी नहीं सकता; परंतु तेरे-जैसा कुलांगार और मूर्ख मनुष्य उसे करनेकी चेष्टा करता है ॥ ३५ ॥ त्वमिमं पुण्डरीकाक्षमप्रधृष्यं दुरासदम् । पापैः सहायैः संहत्य निग्रहीतुं किलेच्छसि ॥ ३६ ॥ 'सुनता हूँ, तू अपने पापी सहायकोंसे मिलकर इन दुर्धर्ष एवं दुर्जय वीर कमलनयन श्रीकृष्णको कैद करना चाहता है ॥ ३६ ॥ यो न शक्यो बलात् कर्तुं देवैरपि सवासवैः । तं त्वं प्रार्थयसे मन्द बालश्चन्द्रमसं यथा ॥ ३७ ॥ 'ओ मूढ! इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी जिन्हें बलपूर्वक अपने वशमें नहीं कर सकते, उन्हींको तू बंदी बनाना चाहता है। तेरी यह चेष्टा वैसी ही है, जैसे कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ना चाहता हो ॥ ३७ ॥ देवैर्मनुष्यैर्गन्धर्वैरसुरैरुरगैश्च यः ।