महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 852, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन सोढुं समरे शक्यस्तं न बुद्ध्यसि केशवम् ॥ ३८ ॥ ‘देवता, मनुष्य, गन्धर्व, असुर और नाग भी संग्रामभूमिमें जिनका वेग नहीं सह सकते, उन भगवान् श्रीकृष्णको तू नहीं जानता ॥ ३८ ॥ दुर्ग्राह्यः पाणिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी । दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्ग्राह्यः केशवो बलात् ॥ ३९ ॥ ‘जैसे वायुको हाथसे पकड़ना दुष्कर है, चन्द्रमाको हाथसे छूना कठिन है और पृथ्वीको सिरपर धारण करना असम्भव है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको बलपूर्वक पकड़ना दुष्कर है’ ॥ ३९ ॥ इत्युक्ते धृतराष्ट्रेण क्षत्तापि विदुरोऽब्रवीत् । दुर्योधनमभिप्रेत्य धार्तराष्ट्रममर्षणम् ॥ ४० ॥ धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर विदुरने भी अमर्षमें भरे हुए धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार कहा ।।
विदुर उवाच
दुर्योधन निबोधेदं वचनं मम साम्प्रतम् । सौभद्वारे दानवेन्द्रो द्विविदो नाम नामतः । शिलावर्षेण महता छादयामास केशवम् ॥ ४१ ॥ **विदुर बोले—**दुर्योधन! इस समय मेरी बातपर ध्यान दो। सौभद्वारमें द्विविद नामसे प्रसिद्ध एक वानरोंका राजा रहता था, जिसने एक दिन पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा करके भगवान् श्रीकृष्णको आच्छादित कर दिया ॥ ४१ ॥ ग्रहीतुकामो विक्रम्य सर्वयत्नेन माधवम् । ग्रहीतुं नाशकच्चैनं तं त्वं प्रार्थयसे बलात् ॥ ४२ ॥ वह पराक्रम करके सभी उपायोंसे श्रीकृष्णको पकड़ना चाहता था, परंतु इन्हें कभी पकड़ न सका। उन्हीं श्रीकृष्णको तुम बलपूर्वक अपने वशमें करना चाहते हो! ॥ ४२ ॥ प्राग्ज्योतिषगतं शौरिं नरकः सह दानवैः । ग्रहीतुं नाशकत् तत्र तं त्वं प्रार्थयसे बलात् ॥ ४३ ॥ पहलेकी बात है, प्राग्ज्योतिषपुरमें गये हुए श्रीकृष्णको दानवोंसहित नरकासुरने भी वहाँ बन्दी बनानेकी चेष्टा की; परंतु वह भी वहाँ सफल न हो सका। उन्हींको तुम बलपूर्वक अपने वशमें करना चाहते हो ॥ ४३ ॥ अनेकयुगवर्षायुर्निहत्य नरकं मृधे । नीत्वा कन्यासहस्राणि उपयेमे यथाविधि ॥ ४४ ॥ अनेक युगों तथा असंख्य वर्षोंकी आयुवाले नरकासुरको युद्धमें मारकर श्रीकृष्ण उसके यहाँसे सहस्रों राजकन्याओंको (उद्धार करके) ले गये और उन सबके साथ उन्होंने