महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमस्त महाबली देवता जब वृत्रासुरके समीप आये, तब वह अपने तेजसे प्रज्वलित होकर दसों दिशाओंको तपा रहा था, मानो सूर्य और चन्द्रमा अपना प्रकाश बिखेर रहे हों। इन्द्रके साथ सम्पूर्ण देवताओंने वृत्रासुरको देखा। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा॥ १५-१६॥
ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचुः प्रियं वचः। व्याप्तं जगदिदं सर्वं तेजसा तव दुर्जय ॥ १७॥
उस समय वृत्रासुरके पास आकर ऋषियोंने उससे यह प्रिय वचन कहा—'दुर्जय वीर! तुम्हारे तेजसे यह सारा जगत् व्याप्त हो रहा है॥ १७॥
न च शक्नोषि निर्जेतुं वासवं बलिनां वर। युध्यतोश्चापि वां कालो व्यतीतः सुमहानिह ॥ १८॥
'बलवानोंमें श्रेष्ठ वृत्र! इतनेपर भी तुम इन्द्रको जीत नहीं सकते। तुम दोनोंको युद्ध करते बहुत समय बीत गया है॥ १८॥
पीड्यन्ते च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः। सख्यं भवतु ते वृत्र शक्रेण सह नित्यदा ॥ १९॥
'देवता, असुर तथा मनुष्योंसहित सारी प्रजा इस युद्धसे पीड़ित हो रही है। अतः वृत्रासुर! हम चाहते हैं कि इन्द्रके साथ तुम्हारी सदाके लिये मैत्री हो जाय॥ १९॥
अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रलोकांश्च शाश्वतान्। ऋषिवाक्यं निशम्याथ वृत्रः स तु महाबलः ॥ २०॥ उवाच तानृषीन् सर्वान् प्रणम्य शिरसासुरः। सर्वे यूयं महाभागा गन्धर्वाश्चैव सर्वशः ॥ २१॥ यद् ब्रूथ तच्छ्रुतं सर्वं ममापि शृणुतानघाः। संधिः कथं वै भविता मम शक्रस्य चोभयोः। तेजसोर्हि द्वयोर्देवाः सख्यं वै भविता कथम् ॥ २२॥
'इससे तुम्हें सुख मिलेगा और इन्द्रके सनातन लोकोंपर भी तुम्हारा अधिकार रहेगा।' ऋषियोंकी यह बात सुनकर महाबली वृत्रासुरने उन सबको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'महाभाग देवताओ! महर्षियो तथा गन्धर्वो! आप सब लोग जो कुछ कह रहे हैं, वह सब मैंने सुन लिया। निष्पाप देवगण! अब मेरी भी बात आपलोग सुनें। मुझमें और इन्द्रमें संधि कैसे होगी? दो तेजस्वी पुरुषोंमें मैत्रीका सम्बन्ध किस प्रकार स्थापित होगा?'॥ २०—२२॥
ऋषय ऊचुः
सकृत् सतां संगतं लिप्सितव्यं ततः परं भविता भव्यमेव।