महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनातिक्रामेत् सत्पुरुषेण संगतं तस्मात् सतां संगतं लिप्सितव्यम् ॥ २३ ॥ **ऋषि बोले—**एक बार साधु पुरुषोंकी संगतिकी अभिलाषा अवश्य रखनी चाहिये। साधु पुरुषोंका संग प्राप्त होनेपर उससे परम कल्याण ही होगा। साधु पुरुषोंके संगकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। अतः संतोंका रंग मिलनेकी अवश्य इच्छा करे ॥ २३ ॥ दृढं सतां संगतं चापि नित्यं ब्रूयाच्चार्थं ह्यर्थकृच्छ्रेषु धीरः । महार्थवत् सत्पुरुषेण संगतं तस्मात् सन्तं न जिघांसेत धीरः ॥ २४ ॥ सज्जनोंका रंग सुदृढ़ एवं चिरस्थायी होता है। धीर संत-महात्मा संकटके समय हितकर कर्तव्यका ही उपदेश देते हैं। साधु पुरुषोंका संग महान् अभीष्ट वस्तुओंका साधक होता है। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह सज्जनोंको नष्ट करनेकी इच्छा न करे ॥ २४ ॥ इन्द्रः सतां सम्मतश्च निवासश्च महात्मनाम् । सत्यवादी ह्यनिन्द्यश्च धर्मवित् सूक्ष्मनिश्चयः ॥ २५ ॥ इन्द्र सत्पुरुषोंके सम्माननीय हैं। महात्मा पुरुषोंके आश्रय हैं। वे सत्यवादी, अनिन्दनीय, धर्मज्ञ तथा सूक्ष्म बुद्धिवाले हैं ॥ २५ ॥ तेन ते सह शक्रेण संधिर्भवतु नित्यदा । एवं विश्वासमागच्छ मा तेऽभूद् बुद्धिरन्यथा ॥ २६ ॥ ऐसे इन्द्रके साथ तुम्हारी सदाके लिये संधि हो जाय। इस प्रकार तुम उनका विश्वास प्राप्त करो। तुम्हें इसके विपरीत कोई विचार नहीं करना चाहिये ॥ २६ ॥
शल्य उवाच
महर्षिवचनं श्रुत्वा तानुवाच महाद्युतिः । अवश्यं भगवन्तो मे माननीयास्तपस्विनः ॥ २७ ॥ **शल्य कहते हैं—**राजन्! महर्षियोंकी यह बात सुनकर महातेजस्वी वृत्रने उनसे कहा—'भगवन्! आप-जैसे तपस्वी महात्मा अवश्य ही मेरे लिये सम्माननीय हैं ॥ ब्रवीमि यदहं देवास्तत् सर्वं क्रियते यदि । ततः सर्वं करिष्यामि यदूचुर्मां द्विजर्षभाः ॥ २८ ॥ 'देवताओ! मैं अभी जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब यदि आपलोग स्वीकार कर लें, तो इन श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियोंने मुझे जो आदेश दिये हैं, उन सबका मैं अवश्य पालन करूँगा ॥ २८ ॥ न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा । न शस्त्रेण न चास्त्रेण न दिवा न तथा निशि ॥ २९ ॥