महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 923, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपराभवस्य तल्लिङ्गमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥ १५ ॥ 'मधुसूदन! दुर्योधनकी समस्त सेनाओंमें ये बातें पायी जाती हैं। मनीषी पुरुष इन्हें पराजयका लक्षण कहते हैं ।। १५ ।। प्रहृष्टं वाहनं कृष्ण पाण्डवानां प्रचक्षते । प्रदक्षिणा मृगाश्चैव तत् तेषां जयलक्षणम् ॥ १६ ॥ 'श्रीकृष्ण! पाण्डवोंके वाहन प्रसन्न बताये जाते हैं और मृग उनके दाहिनेसे जाते देखे जाते हैं; यह लक्षण उनकी विजयका सूचक है ।। १६ ।। अपसव्या मृगाः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य केशव । वाचश्चाप्यशरीरिण्यस्तत् पराभवलक्षणम् ॥ १७ ॥ 'केशव! सभी मृग दुर्योधनके बाँयेंसे निकलते हैं और उसे प्रायः ऐसी वाणी सुनायी देती है, जिसके बोलनेवालेका शरीर नहीं दिखायी देता। यह उसकी पराजयका चिह्न है ।। १७ ।। मयूराः पुण्यशकुना हंससारसचातकाः । जीवंजीवकसङ्घाश्चाप्यनुगच्छन्ति पाण्डवान् ॥ १८ ॥ 'मोर, शुभ शकुन सूचित करनेवाले मुर्गे, हंस, सारस, चातक तथा चकोरोंके समुदाय पाण्डवोंका अनुसरण करते हैं ।। १८ ।। गृध्राः कङ्का बकाः श्येना यातुधानास्तथा वृकाः । मक्षिकाणां च सङ्घाता अनुधावन्ति कौरवान् ॥ १९ ॥ 'इसी प्रकार गीध, कंक, बक, श्येन (बाज), राक्षस, भेड़िये तथा मक्खियोंके समूह कौरवोंके पीछे दौड़ते हैं ।। १९ ।। धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु भेरीणां नास्ति निःस्वनः । अनाहताः पाण्डवानां नदन्ति पटहाः किल ॥ २० ॥ 'दुर्योधनकी सेनाओंमें बजानेपर भी भेरियोंके शब्द प्रकट नहीं होते हैं और पाण्डवोंके डंके बिना बजाये ही बज उठते हैं ।। २० ।। उदपानाश्च नर्दन्ति यथा गोवृषभास्तथा । धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु तत् पराभवलक्षणम् ॥ २१ ॥ 'दुर्योधनकी सेनाओंमें कुएँ आदि जलाशय गाय-बैलोंके समान शब्द करते हैं। यह उसकी पराजयका लक्षण है ।। २१ ।। मांसशोणितवर्षं च वृष्टं देवेन माधव । तथा गन्धर्वनगरं भानुमत् समुपस्थितम् ॥ २२ ॥ सप्राकारं सपरिखं सवप्रं चारुतोरणम् । कृष्णश्च परिघस्तत्र भानुमावृत्य तिष्ठति ॥ २३ ॥