भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 924

‘माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदीवारी, खाई, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है॥ २२-२३॥ उदयास्तमने संध्ये वेदयन्ती महद्भयम्। शिवा च वाशते घोरं तत् पराभवलक्षणम्॥ २४॥ ‘सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों संध्याओंके समय एक गीदड़ी महान् भयकी सूचना देती हुई भयंकर आवाजमें रोती है। यह भी कौरवोंकी पराजयका लक्षण है॥ २४॥ एकपक्षाक्षिचरणाः पक्षिणो मधुसूदन। उत्सृजन्ति महद् घोरं तत् पराभवलक्षणम्॥ २५॥ ‘मधुसूदन! एक पाँख, एक आँख और एक पैरवाले पक्षी अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं। यह भी कौरवपक्षकी पराजयका ही लक्षण है॥ २५॥ कृष्णग्रीवाश्च शकुना रक्तपादा भयानकाः। संध्यामभिमुखा यान्ति तत् पराभवलक्षणम्॥ २६॥ ‘संध्याकालमें काली ग्रीवा और लाल पैरवाले भयानक पक्षी सामने आ जाते हैं, वह भी पराजयका ही चिह्न है॥ २६॥ ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि गुरूंश्च मधुसूदन। भृत्यान् भक्तिमतश्चापि तत् पराभवलक्षणम्॥ २७॥ ‘मधुसूदन! दुर्योधन पहले ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है; फिर गुरुजनोंसे तथा अपने प्रति भक्ति रखनेवाले भृत्योंसे भी द्रोह करने लगता है, यह उसकी पराजयका ही लक्षण है॥ २७॥ पूर्वा दिग् लोहिताकारा शस्त्रवर्णा च दक्षिणा। आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन। उत्तरा शङ्खवर्णाभा दिशां वर्णा उदाहृताः॥ २८॥ ‘श्रीकृष्ण! पूर्व दिशा लाल, दक्षिण दिशा शस्त्रोंके समान रंगवाली (काली), पश्चिम दिशा मिट्टीके कच्चे बर्तनोंकी भाँति मटमैली तथा उत्तर दिशा शंखके समान श्वेत दिखायी देती है। इस प्रकार ये दिशाओंके पृथक्-पृथक् वर्ण बताये गये हैं॥ २८॥ प्रदीप्ताश्च दिशः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव। महद् भयं वेदयन्ति तस्मिन्नुत्पातदर्शने॥ २९॥ ‘माधव! दुर्योधनको इन उत्पातोंका दर्शन तो होता ही है। उसके लिये सारी दिशाएँ भी प्रज्वलित-सी होकर महान् भयकी सूचना दे रही हैं॥ २९॥ सहस्रपादं प्रासादं स्वप्नान्ते स्म युधिष्ठिरः। अधिरोहन् मया दृष्टः सह भ्रातृभिरच्युत॥ ३०॥