महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
‘माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं। अन्तरिक्षमें चहारदीवारी, खाई, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है। वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है॥ २२-२३॥ उदयास्तमने संध्ये वेदयन्ती महद्भयम्। शिवा च वाशते घोरं तत् पराभवलक्षणम्॥ २४॥ ‘सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों संध्याओंके समय एक गीदड़ी महान् भयकी सूचना देती हुई भयंकर आवाजमें रोती है। यह भी कौरवोंकी पराजयका लक्षण है॥ २४॥ एकपक्षाक्षिचरणाः पक्षिणो मधुसूदन। उत्सृजन्ति महद् घोरं तत् पराभवलक्षणम्॥ २५॥ ‘मधुसूदन! एक पाँख, एक आँख और एक पैरवाले पक्षी अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं। यह भी कौरवपक्षकी पराजयका ही लक्षण है॥ २५॥ कृष्णग्रीवाश्च शकुना रक्तपादा भयानकाः। संध्यामभिमुखा यान्ति तत् पराभवलक्षणम्॥ २६॥ ‘संध्याकालमें काली ग्रीवा और लाल पैरवाले भयानक पक्षी सामने आ जाते हैं, वह भी पराजयका ही चिह्न है॥ २६॥ ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि गुरूंश्च मधुसूदन। भृत्यान् भक्तिमतश्चापि तत् पराभवलक्षणम्॥ २७॥ ‘मधुसूदन! दुर्योधन पहले ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है; फिर गुरुजनोंसे तथा अपने प्रति भक्ति रखनेवाले भृत्योंसे भी द्रोह करने लगता है, यह उसकी पराजयका ही लक्षण है॥ २७॥ पूर्वा दिग् लोहिताकारा शस्त्रवर्णा च दक्षिणा। आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन। उत्तरा शङ्खवर्णाभा दिशां वर्णा उदाहृताः॥ २८॥ ‘श्रीकृष्ण! पूर्व दिशा लाल, दक्षिण दिशा शस्त्रोंके समान रंगवाली (काली), पश्चिम दिशा मिट्टीके कच्चे बर्तनोंकी भाँति मटमैली तथा उत्तर दिशा शंखके समान श्वेत दिखायी देती है। इस प्रकार ये दिशाओंके पृथक्-पृथक् वर्ण बताये गये हैं॥ २८॥ प्रदीप्ताश्च दिशः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव। महद् भयं वेदयन्ति तस्मिन्नुत्पातदर्शने॥ २९॥ ‘माधव! दुर्योधनको इन उत्पातोंका दर्शन तो होता ही है। उसके लिये सारी दिशाएँ भी प्रज्वलित-सी होकर महान् भयकी सूचना दे रही हैं॥ २९॥ सहस्रपादं प्रासादं स्वप्नान्ते स्म युधिष्ठिरः। अधिरोहन् मया दृष्टः सह भ्रातृभिरच्युत॥ ३०॥
‘अच्युत! मैंने स्वप्नके अन्तिम भागमें युधिष्ठिरको एक हजार खंभोंवाले महलपर भाइयोंसहित चढ़ते देखा है ॥ ३० ॥ श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते सर्वे वै शुक्लवाससः । आसनानि च शुभ्राणि सर्वेषामुपलक्षये ॥ ३१ ॥ ‘उन सबके सिरपर सफेद पगड़ी और अंगोंमें श्वेत वस्त्र शोभित दिखायी दिये हैं। मैंने उन सबके आसनोंको भी श्वेत वर्णका ही देखा है ॥ ३१ ॥ तव चापि मया कृष्ण स्वप्नान्ते रुधिराविला । अन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन ॥ ३२ ॥ ‘जनार्दन! श्रीकृष्ण! मैंने स्वप्नके अन्तमें आपकी इस पृथ्वीको भी रक्तसे मलिन और आँतसे लिपटी हुई देखा है ॥ ३२ ॥ अस्थिसंचयमारूढश्चामितौजा युधिष्ठिरः । सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्तवान् घृतपायसम् ॥ ३३ ॥ ‘मैंने स्वप्नमें देखा, अमिततेजस्वी युधिष्ठिर सफेद हड्डियोंके ढेरपर बैठे हुए हैं और सोनेके पात्रमें रखी हुई घृतमिश्रित खीरको बड़ी प्रसन्नताके साथ खा रहे हैं ॥ ३३ ॥ युधिष्ठिरो मया दृष्टो ग्रसमानो वसुन्धराम् । त्वया दत्तामिमां व्यक्तं भोक्ष्यते स वसुन्धराम् ॥ ३४ ॥ ‘मैंने यह भी देखा कि युधिष्ठिर इस पृथ्वीको अपना ग्रास बनाये जा रहे हैं; अतः यह निश्चित है कि आपकी दी हुई वसुन्धराका वे ही उपभोग करेंगे ॥ ३४ ॥ उच्चं पर्वतमारूढो भीमकर्मा वृकोदरः । गदापाणिर्नरव्याघ्रो ग्रसन्निव महीमिमाम् ॥ ३५ ॥ ‘भयंकर कर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेन भी हाथमें गदा लिये ऊँचे पर्वतपर आरूढ़ हो इस पृथ्वीको ग्रसते हुए-से स्वप्नमें दिखायी दिये हैं ॥ ३५ ॥ क्षपयिष्यति नः सर्वान् स सुव्यक्तं महारणे । विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ३६ ॥ अतः यह स्पष्टरूपसे जान पड़ता है कि वे इस महायुद्धमें हम सब लोगोंका संहार कर डालेंगे। हृषीकेश! मुझे यह भी विदित है कि जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है ॥ ३६ ॥ पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनंजयः । त्वया सार्धं हृषीकेश श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ३७ ॥ ‘श्रीकृष्ण! इसी प्रकार गाण्डीवधारी धनंजय भी आपके साथ श्वेत गजराजपर आरूढ़ हो अपनी परम कान्तिसे प्रकाशित होते हुए मुझे स्वप्नमें दृष्टिगोचर हुए हैं ॥ ३७ ॥ यूयं सर्वे वधिष्यध्वं तत्र मे नास्ति संशयः । पार्थिवान् समरे कृष्ण दुर्योधनपुरोगमान् ॥ ३८ ॥
‘अतः श्रीकृष्ण! आप सब लोग इस युद्धमें दुर्योधन आदि समस्त राजाओंका वध कर डालेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है ।। ३८ ।।
नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः । शुक्लकेयूरकण्ठत्राः शुक्लमाल्याम्बरावृताः ।। ३९ ।। अधिरूढा नरव्याघ्रा नरवाहनमुत्तमम् । त्रय एते मया दृष्टाः पाण्डुरच्छत्रवाससः ।। ४० ।।
‘नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि—ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान (पालकी)-पर चढ़े दिखायी दिये हैं। ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे ।। ३९-४० ।।
श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते त्रय एते जनार्दन । धार्तराष्ट्रेषु सैन्येषु तान् विजानीहि केशव ।। ४१ ।। अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । रक्तोष्णीषाश्च दृश्यन्ते सर्वे माधव पार्थिवाः ।। ४२ ।।
‘जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं। केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें। वे हैं—अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा। माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये हैं ।। ४१-४२ ।।
उष्ट्रप्रयुक्तमारूढौ भीष्मद्रोणौ महारथौ । मया सार्धं महाबाहो धार्तराष्ट्रेण वा विभो ।। ४३ ।। अगस्त्यशास्तां च दिशं प्रयाताः स्म जनार्दन । अचिरेणैव कालेन प्राप्स्यामो यमसादनम् ।। ४४ ।।
‘महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे। विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे ।। ४३-४४ ।।
अहं चान्ये च राजानो यच्च तत् क्षत्रमण्डलम् । गाण्डीवाग्निं प्रवेक्ष्याम इति मे नास्ति संशयः ।। ४५ ।।
‘मैं' अन्यान्य नरेश तथा वह सारा क्षत्रियसमाज सब-के-सब गाण्डीवकी अग्निमें प्रवेश कर जायँगे, इसमें संशय नहीं है ।। ४५ ।।
श्रीकृष्ण उवाच
उपस्थितविनाशैयं नूनमद्य वसुन्धरा । यथा हि मे वचः कर्ण नोपैति हृदयं तव ।। ४६ ।।
**श्रीकृष्ण बोले—**कर्ण! निश्चय ही अब इस पृथ्वीका विनाशकाल उपस्थित हो गया है; इसीलिये मेरी बात तुम्हारे हृदयतक नहीं पहुँचती है ॥ ४६ ॥
सर्वेषां तात भूतानां विनाशे प्रत्युपस्थिते ।
अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति ॥ ४७ ॥
तात! जब समस्त प्राणियोंका विनाश निकट आ जाता है, तब अन्याय भी न्यायके समान प्रतीत होकर हृदयसे निकल नहीं पाता है ॥ ४७ ॥
कर्ण उवाच
अपि त्वां कृष्ण पश्याम जीवन्तोऽस्मान्महारणात् ।
समुत्तीर्णा महाबाहो वीरक्षत्रविनाशनात् ॥ ४८ ॥
**कर्ण बोला—**महाबाहु श्रीकृष्ण! वीर क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले इस महायुद्धसे पार होकर यदि हम जीवित बच गये तो पुनः आपका दर्शन करेंगे ॥ ४८ ॥
अथवा सङ्गमः कृष्ण स्वर्गे नो भविता ध्रुवम् ।
तत्रेदानीं समेष्यामः पुनः सार्धं त्वयानघ ॥ ४९ ॥
अथवा श्रीकृष्ण! अब हमलोग स्वर्गमें ही मिलेंगे, यह निश्चित है। अनघ! वहाँ आजकी ही भाँति पुनः आपसे हमारी भेंट होगी ॥ ४९ ॥
संजय उवाच
इत्युक्त्वा माधवं कर्णः परिष्वज्य च पीडितम् ।
विसर्जितः केशवेन रथोपस्थादवातरत् ॥ ५० ॥
**संजय कहते हैं—**ऐसा कहकर कर्ण भगवान् श्रीकृष्णका प्रगाढ़ आलिंगन करके उनसे विदा ले रथके पिछले भागसे उतर गया ॥ ५० ॥
ततः स्वरथमास्थाय जाम्बूनदविभूषितम् ।
सहास्माभिर्निववृते राधेयो दीनमानसः ॥ ५१ ॥
तदनन्तर अपने सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो राधानन्दन कर्ण दीनचित्त होकर हमलोगोंके साथ लौट आया ॥ ५१ ॥
ततः शीघ्रतरं प्रायात् केशवः सहसात्यकिः ।
पुनरुच्चारयन् वाणीं याहि याहीति सारथिम् ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सात्यकिसहित श्रीकृष्ण सारथिसे बार-बार ‘चलो-चलो’ ऐसा कहते हुए अत्यन्त तीव्र गतिसे उपप्लव्य नगरकी ओर चल दिये ॥ ५२ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे कृष्णकर्णसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने अभिप्राय निवेदनके प्रसंगमें भगवद्वाक्यविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४३ ।।
१४४-
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच-विचारके बाद कर्णके पास जाना
वैशम्पायन उवाच
असिद्धानुनये कृष्णे कुरुभ्यः पाण्डवान् गते ।
अभिगम्य पृथां क्षत्ता शनैः शोचन्निवाब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जब श्रीकृष्णका अनुनय असफल हो गया और वे कौरवोंके यहाँसे पाण्डवोंके पास चले गये, तब विदुरजी कुन्तीके पास जाकर शोकमग्न-से हो धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
जानासि मे जीवपुत्रि भावं नित्यमविग्रहे ।
क्रोशतो न च गृह्णीते वचनं मे सुयोधनः ॥ २ ॥
‘चिरंजीवी पुत्रोंको जन्म देनेवाली देवि! तुम तो जानती ही हो कि मेरी इच्छा सदासे यही रही है कि कौरवों और पाण्डवोंमें युद्ध न हो। इसके लिये मैं पुकार-पुकारकर कहता रह गया; परंतु दुर्योधन मेरी बात मानता ही नहीं है ॥ २ ॥
उपपन्नो ह्यसौ राजा चेदिपाञ्चालकेकयैः ।
भीमार्जुनभ्यां कृष्णेन युयुधानयमैरपि ॥ ३ ॥
‘राजा युधिष्ठिर चेदि, पांचाल तथा केकयदेशके वीर सैनिकगण, भीमसेन, अर्जुन, श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा नकुल-सहदेव आदि श्रेष्ठ सहायकोंसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥
उपप्लव्ये निविष्टोऽपि धर्ममेव युधिष्ठिरः ।
काङ्क्षते ज्ञाति सौहार्दाद् बलवान् दुर्बलो यथा ॥ ४ ॥
‘वे युद्धके लिये उद्यत हो उपप्लव्य नगरमें छावनी डालकर बैठे हुए हैं, तथापि भाई-बन्धुओंके सौहार्दवश धर्मकी ही आकांक्षा रखते हैं। बलवान् होकर भी दुर्बलकी भाँति संधि करना चाहते हैं ॥ ४ ॥
राजा तु धृतराष्ट्रोऽयं वयोवृद्धो न शाम्यति ।
मत्तः पुत्रमदेनैव विधर्मे पथि वर्तते ॥ ५ ॥
‘यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़े हो जानेपर भी शान्त नहीं हो रहे हैं। पुत्रोंके मदसे उन्मत्त हो अधर्मके मार्गपर ही चलते हैं ॥ ५ ॥
जयद्रथस्य कर्णस्य तथा दुःशासनस्य च ।
सौबलस्य च दुर्बुद्ध्या मिथो भेदः प्रपत्स्यते ॥ ६ ॥
'जयद्रथ, कर्ण, दुःशासन तथा शकुनिकी खोटी बुद्धिसे कौरव-पाण्डवोंमें परस्पर फूट होकर ही रहेगी॥
अधर्मेण हि धर्मिष्ठं कृतं वैकार्यमीदृशम्।
येषां तेषामयं धर्मः सानुबन्धो भविष्यति॥ ७॥
'(कौरवोंने चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंको राज्य लौटा देनेकी प्रतिज्ञा करके भी उसका पालन नहीं किया।) जिन्हें ऐसा अधर्मजनित कार्य भी, जो परस्पर बिगाड़ करनेवाला है, धर्मसंगत प्रतीत होता है, उनका यह विकृत धर्म सफल होकर ही रहेगा (अधर्मका फल है दुःख और विनाश। वह उन्हें प्राप्त होगा ही)॥ ७॥
क्रियमाणे बलाद् धर्मे कुरुभिः को न संज्वरेत्।
असाम्ना केशवे याते समुद्योक्ष्यन्ति पाण्डवाः॥ ८॥
'कौरवोंके द्वारा धर्म मानकर किये जानेवाले इस बलात् किसको चिन्ता नहीं होगी। भगवान् श्रीकृष्ण संधिके प्रयत्नमें असफल होकर गये हैं; अतः पाण्डव भी अब युद्धके लिये महान् उद्योग करेंगे॥ ८॥
ततः कुरूणामनयो भविता वीरनाशनः।
चिन्तयन् न लभे निद्रामहःसु च निशासु च॥ ९॥
'इस प्रकार यह कौरवोंका अन्याय समस्त वीरोंका विनाश करनेवाला होगा। इन सब बातोंको सोचते हुए मुझे न तो दिनमें नींद आती है और न रातमें ही'॥ ९॥
श्रुत्वा तु कुन्ती तद्वाक्यमर्थकामेन भाषितम्।
सा निःश्वसन्ती दुःखार्ता मनसा विममर्श ह॥ १०॥
विदुरजीने उभय पक्षके हितकी इच्छासे ही यह बात कही थी। इसे सुनकर कुन्ती दुःखसे आतुर हो उठी और लम्बी साँस खींचती हुई मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी—॥ १०॥
धिगस्त्वर्थं यत्कृतेऽयं महान् ज्ञातिवधः कृतः।
वत्स्यते सुहृदां चैव युद्धेऽस्मिन् वै पराभवः॥ ११॥
'अहो! इस धनको धिक्कार है, जिसके लिये परस्पर बन्धु-बान्धवोंका यह महान् संहार किया जानेवाला है। इस युद्धमें अपने सगे-सम्बन्धियोंका भी पराभव होगा ही॥ ११॥
पाण्डवाश्चेदिपञ्चाला यादवाश्च समागताः।
भारतैः सह योत्स्यन्ति किं नु दुःखमतः परम्॥ १२॥
'पाण्डव, चेदि, पांचाल और यादव एकत्र होकर भरतवंशियोंके साथ युद्ध करेंगे, इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है?॥ १२॥
पश्ये दोषं ध्रुवं युद्धे तथायुद्धे पराभवम्।
अधनस्य मृतं श्रेयो न हि ज्ञातिक्षयो जयः॥ १३॥
‘युद्धमें निश्चय ही मुझे बड़ा भारी दोष दिखायी देता है; परंतु युद्ध न होनेपर भी पाण्डवोंका पराभव स्पष्ट है। निर्धन होकर मृत्युको वरण कर लेना अच्छा है; परंतु बन्धु-बान्धवोंका विनाश करके विजय पाना कदापि अच्छा नहीं है ॥ १३ ॥ इति मे चिन्तयन्त्या वै हृदि दुःखं प्रवर्तते । पितामहः शान्तनव आचार्यश्च युधां पतिः ॥ १४ ॥ कर्णश्च धार्तराष्ट्रार्थं वर्धयन्ति भयं मम । ‘यह सब सोचकर मेरे हृदयमें बड़ा दुःख हो रहा है। शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, योद्धाओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण तथा कर्ण भी दुर्योधनके लिये ही युद्धभूमिमें उतरेंगे; अतः ये मेरे भयकी ही वृद्धि कर रहे हैं ॥ १४ १/२ ॥ नाचार्यः कामवान् शिष्यैर्द्रोणो युद्ध्येत जातुचित् ॥ १५ ॥ पाण्डवेषु कथं हार्दं कुर्यान्न च पितामहः । ‘आचार्य द्रोण तो सदा हमारे हितकी इच्छा रखनेवाले हैं। वे अपने शिष्योंके साथ कभी युद्ध नहीं कर सकते। इसी प्रकार पितामह भीष्म भी पाण्डवोंके प्रति हार्दिक स्नेह कैसे नहीं रखेंगे? ॥ १५ १/२ ॥ अयं त्वेको वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ १६ ॥ मोहानुवर्ती सततं पापो द्वेष्टि च पाण्डवान् । ‘परंतु यह एकमात्र मिथ्यादर्शी कर्ण मोहवश सदा दुर्बुद्धि दुर्योधनका ही अनुसरण करनेवाला है। इसीलिये यह पापात्मा सर्वदा पाण्डवोंसे द्वेष ही रखता है ॥ १६ १/२ ॥ महत्यनर्थे निर्बन्धी बलवांश्च विशेषतः ॥ १७ ॥ कर्णः सदा पाण्डवानां तन्मे दहति सम्प्रति । आशंसे त्वद्य कर्णस्य मनोऽहं पाण्डवान् प्रति ॥ १८ ॥ प्रसादयितुमासाद्य दर्शयन्ती यथातथम् । ‘इसने सदा पाण्डवोंका बड़ा भारी अनर्थ करनेके लिये हठ ठान लिया है। साथ ही कर्ण अत्यन्त बलवान् भी है। यह बात इस समय मेरे हृदयको दग्ध किये देती है। अच्छा, आज मैं कर्णके मनको पाण्डवोंके प्रति प्रसन्न करनेके लिये उसके पास जाऊँगी और यथार्थ सम्बन्धका परिचय देती हुई उससे बातचीत करूँगी ॥ तोषिता भगवान् यत्र दुर्वासा मे वरं ददौ ॥ १९ ॥ आह्वानं मन्त्रसंयुक्तं वसन्त्याः पितृवेश्मनि । साहमन्तःपुरे राज्ञः कुन्तिभोजपुरस्कृता ॥ २० ॥ चिन्तयन्ती बहुविधं हृदयेन विदूयता । बलाबलं च मन्त्राणां ब्राह्मणस्य च वाग्बलम् ॥ २१ ॥ ‘जब मैं पिताके घर रहती थी, उन्हीं दिनों अपनी सेवाओंद्वारा मैंने भगवान् दुर्वासाको संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे यह वर दिया कि मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहन करनेपर मैं
किसी भी देवताको अपने पास बुला सकती हूँ। मेरे पिता कुन्तिभोज मेरा बड़ा आदर करते थे। मैं राजाके अन्तःपुरमें रहकर व्यथित हृदयसे मन्त्रोंके बलाबल और ब्राह्मणकी वाक्शक्तिके विषयमें अनेक प्रकारका विचार करने लगी ।। १९—२१ ।। स्त्रीभावाद् बालभावाच्च चिन्तयन्ती पुनः पुनः । धात्र्या विस्रब्धया गुप्ता सखीजनवृता तदा ।। २२ ।। ‘स्त्री-स्वभाव और बाल्यावस्थाके कारण मैं बार-बार इस प्रश्नको लेकर चिन्तामग्न रहने लगी। उन दिनों एक विश्वस्त धाय मेरी रक्षा करती थी और सखियाँ मुझे सदा घेरे रहती थीं’ ।। २२ ।। दोषं परिहरन्ती च पितुश्चारित्र्यरक्षिणी । कथं नु सुकृतं मे स्यान्नापराधवती कथम् ।। २३ ।। भवेयमिति संचिन्त्य ब्राह्मणं तं नमस्य च । कौतूहलात् तु तं लब्ध्वा बालिश्यादाचरं तदा । कन्या सती देवमर्कमासादयमहं ततः ।। २४ ।। ‘मैं अपने ऊपर आनेवाले सब प्रकारके दोषोंका निवारण करती हुई पिताकी दृष्टिमें अपने सदाचारकी रक्षा करती रहती थी। मैंने सोचा, क्या करूँ, जिससे मुझे पुण्य हो और मैं अपराधिनी न होऊँ। यह सोचकर मैंने मन-ही-मन उन ब्राह्मणदेवताको नमस्कार किया और उस मन्त्रको पाकर कौतूहल तथा अविवेकके कारण मैंने उसका प्रयोग आरम्भ कर दिया। उसका परिणाम यह हुआ कि कन्यावस्थामें ही मुझे भगवान् सूर्यदेवका संयोग प्राप्त हुआ ।। २३-२४ ।। योऽसौ कानीनगर्भो मे पुत्रवत् परिरक्षितः । कस्मान्न कुर्याद् वचनं पथ्यं भ्रातृहितं तथा ।। २५ ।। ‘जो मेरा कानीन गर्भ है, इसे मैंने पुत्रकी भाँति अपने उदरमें पाला है। वह कर्ण अपने भाइयोंके हितके लिये कही हुई मेरी लाभदायक बात क्यों नहीं मानेगा?’ ।। २५ ।। इति कुन्ती विनिश्चित्य कार्यनिश्चयमुत्तमम् । कार्यार्थमभिनिश्चित्य ययौ भागीरथीं प्रति ।। २६ ।। इस प्रकार उत्तम कर्तव्यका निश्चय करके अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये एक निर्णयपर पहुँचकर कुन्ती भागीरथी गंगाके तटपर गयी ।। २६ ।। आत्मजस्य ततस्तस्य घृणिनः सत्यसङ्गिनः । गङ्गातीरे पृथाश्रौषीद् वेदाध्ययननिःस्वनम् ।। २७ ।। वहाँ गंगाके किनारे पहुँचकर कुन्तीने अपने दयालु और सत्यपरायण पुत्र कर्णके मुखसे वेदपाठकी गम्भीर ध्वनि सुनी ।। २७ ।। प्राङ्मुखस्योर्ध्वबाहोः सा पर्यतिष्ठत पृष्ठतः । जप्यावसानं कार्यार्थं प्रतीक्षन्ती तपस्विनी ।। २८ ।।
वह अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर पूर्वाभिमुख हो जप कर रहा था और तपस्विनी कुन्ती उसके जपकी समाप्तिकी प्रतीक्षा करती हुई कार्यवश उसके पीछेकी ओर खड़ी रही ॥ २८ ॥
अतिष्ठत् सूर्यतापार्ता कर्णस्योत्तरवाससि ।
कौरव्यपत्नी वार्ष्णेयी पद्ममालेव शुष्यती ॥ २९ ॥
वृष्णिकुलनन्दिनी पाण्डुपत्नी कुन्ती वहाँ सूर्यदेवके तापसे पीड़ित हो कुम्हलाती हुई कमलमालाके समान कर्णके उत्तरीय वस्त्रकी छायामें खड़ी हो गयी ॥ २९ ॥
आपृष्ठतापाज्जप्त्वा स परिवृत्य यतव्रतः ।
दृष्ट्वा कुन्तीमुपातिष्ठदभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ ३० ॥
जबतक सूर्यदेव पीठकी ओर ताप न देने लगे (जबतक वे पूर्वसे पश्चिमकी ओर चले नहीं गये); तबतक जप करके नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाला कर्ण जब पीछेकी ओर घूमा, तब कुन्तीको सामने पाकर उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके पास खड़ा हो गया ॥ ३० ॥
यथान्यायं महातेजा मानी धर्मभृतां वरः ।
उत्स्मयन् प्रणतः प्राह कुन्तीं वैकर्तनो वृषः ॥ ३१ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, अभिमानी और महातेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण जिसका दूसरा नाम वृष भी था, कुन्तीको यथोचित रीतिसे प्रणाम करके मुसकराता हुआ बोला ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णका भेंटविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
१४५-
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कुन्तीका कर्णको अपना प्रथम पुत्र बताकर उससे पाण्डवपक्षमें मिल जानेका अनुरोध
कर्ण उवाच
राधेयोऽहमाधिरथिः कर्णस्त्वामभिवादये ।
प्राप्ता किमर्थं भवती ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १ ॥
**कर्ण बोला—**देवि! मैं राधा तथा अधिरथका पुत्र कर्ण हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। आपने किसलिये यहाँतक आनेका कष्ट किया है? बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १ ॥
कुन्त्युवाच
कौन्तेयस्त्वं न राधेयो न तवाधिरथः पिता ।
नासि सूतकुले जातः कर्ण तद् विद्धि मे वचः ॥ २ ॥
**कुन्तीने कहा—**कर्ण! तुम राधाके नहीं, कुन्तीके पुत्र हो। तुम्हारे पिता अधिरथ नहीं हैं और तुम सूतकुलमें नहीं उत्पन्न हुए हो। मेरी इस बातको ठीक मानो ॥ २ ॥
कानीनस्त्वं मया जातः पूर्वजः कुक्षिणा धृतः ।
कुन्तिराजस्य भवने पार्थस्त्वमसि पुत्रक ॥ ३ ॥
तुम कन्यावस्थामें मेरे गर्भसे उत्पन्न हुए प्रथम पुत्र हो। महाराज कुन्तिभोजके घरमें रहते समय मैंने तुम्हें गर्भमें धारण किया था; अतः बेटा! तुम पार्थ हो ॥ ३ ॥
प्रकाशकर्मा तपनो योऽयं देवो विरोचनः ।
अजीजनत् त्वां मय्येष कर्ण शस्त्रभृतां वरम् ॥ ४ ॥
कर्ण! ये जो जगत्में प्रकाश और उष्णता प्रदान करनेवाले भगवान् सूर्यदेव हैं, इन्होंने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तुम-जैसे वीर पुत्रको मेरे गर्भसे उत्पन्न किया है ॥
कुण्डली बद्धकवचो देवगर्भः श्रिया वृतः ।
जातस्त्वमसि दुर्धर्ष मया पुत्र पितुर्गृहे ॥ ५ ॥
दुर्धर्ष पुत्र! मैंने पिताके घरमें तुम्हें जन्म दिया था। तुम जन्मकालसे ही कुण्डल और कवच धारण किये देवबालकके समान शोभासम्पन्न रहे हो ॥ ५ ॥
स त्वं भ्रातृनसम्बुद्ध्य मोहाद् यदुपसेवसे ।
धार्तराष्ट्रान् न तद् युक्तं त्वयि पुत्र विशेषतः ॥ ६ ॥
बेटा! तुम जो अपने भाइयोंसे अपरिचित रहकर मोहवश धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी सेवा कर रहे हो, वह तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है ॥ ६ ॥
एतद् धर्मफलं पुत्र नराणां धर्मनिश्चये ।
यत् तुष्यन्त्यस्य पितरो माता चाप्येकदर्शिनी ॥ ७ ॥
बेटा! धर्मशास्त्रमें मनुष्योंके लिये यही धर्मका उत्तम फल बताया गया है कि उनके पिता आदि गुरुजन तथा एकमात्र पुत्रपर ही दृष्टि रखनेवाली माता उनसे संतुष्ट रहें ॥ ७ ॥
अर्जुनेनार्जितां पूर्वं हृतां लोभादसाधुभिः ।
आच्छिद्य धार्तराष्ट्रेभ्यो भुङ्क्ष्व यौधिष्ठिरीं श्रियम् ॥ ८ ॥
अर्जुनने पूर्वकालमें जिसका उपार्जन किया था और दुष्टोंने लोभवश जिसे हर लिया है, युधिष्ठिरकी उस राज्यलक्ष्मीको तुम धृतराष्ट्रपुत्रोंसे छीनकर भाइयोंसहित उसका उपभोग करो ॥ ८ ॥
अद्य पश्यन्तु कुरवः कर्णार्जुनसमागमम् ।
सौभ्रात्रेण समालक्ष्य संनमन्तामसाधवः ॥ ९ ॥
आज उत्तम बन्धुजनोचित स्नेहके साथ कर्ण और अर्जुनका मिलन कौरवलोग देखें और इसे देखकर दुष्टलोग नतमस्तक हों ॥ ९ ॥
कर्णार्जुनौ वै भवेतां यथा रामजनार्दनौ ।
असाध्यं किं तु लोके स्याद् युवयोः संहितात्मनोः ॥ १० ॥
कर्ण और अर्जुन दोनों मिलकर वैसे ही बलशाली हैं जैसे बलराम और श्रीकृष्ण। बेटा! तुम दोनों हृदयसे संगठित हो जाओ तो इस जगत्में तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य असाध्य होगा? ॥ १० ॥
कर्ण शोभिष्यसे नूनं पञ्चभिर्भ्रातृभिर्वृतः ।
देवैः परिवृतो ब्रह्मा वेद्यामिव महाध्वरे ॥ ११ ॥
कर्ण! जिस प्रकार महान् यज्ञकी वेदीपर देवगणोंसे घिरे हुए ब्रह्माजी सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अपने पाँचों भाइयोंसे घिरे हुए तुम भी शोभा पाओगे ॥ ११ ॥
उपपन्नो गुणैः सर्वैर्ज्येष्ठः श्रेष्ठेषु बन्धुषु ।
सूतपुत्रेति मा शब्दः पार्थस्त्वमसि वीर्यवान् ॥ १२ ॥
अपने श्रेष्ठ स्वभाववाले बन्धुओंके बीचमें तुम सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ भ्राता परम पराक्रमी कुन्तीपुत्र कर्ण हो। तुम्हारे लिये सूतपुत्र शब्दका प्रयोग नहीं होना चाहिये ॥ १२ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णकी भेंटके प्रसंगमें एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
१४६-
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्णका कुन्तीको उत्तर तथा अर्जुनको छोड़कर शेष चारों पाण्डवोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा
वैशम्पायन उवाच
ततः सूर्यान्निश्चरितां कर्णः शुश्राव भारतीम्।
दुरत्ययां प्रणयिनीं पितृवद् भास्करेरिताम्॥ १॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सूर्यमण्डलसे एक वाणी प्रकट हुई, जो सूर्यदेवकी ही कही हुई थी। उसमें पिताके समान स्नेह भरा हुआ था और वह दुर्लङ्घ्य प्रतीत होती थी। कर्णने उसे सुना॥ १॥
सत्यमाह पृथा वाक्यं कर्ण मातृवचः कुरु।
श्रेयस्ते स्यान्नरव्याघ्र सर्वमाचरतस्तथा॥ २॥
(वह वाणी इस प्रकार थी—) ‘नरश्रेष्ठ कर्ण! कुन्ती सत्य कहती है। तुम माताकी आज्ञाका पालन करो। उसका पूर्णरूपसे पालन करनेपर तुम्हारा कल्याण होगा’॥ २॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य मात्रा च स्वयं पित्रा च भानुना।
चचाल नैव कर्णस्य मतिः सत्यधृतेस्तदा॥ ३॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! माता कुन्ती और पिता साक्षात् सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर भी उस समय सच्चे धैर्यवाले कर्णकी बुद्धि विचलित नहीं हुई॥ ३॥
कर्ण उवाच
न चैतच्छ्रद्दधे वाक्यं क्षत्रिये भाषितं त्वया।
धर्मद्वारं ममैतत् स्यान्नियोगकरणं तव॥ ४॥
**कर्ण बोला—**राजपुत्रि! तुमने जो कुछ कहा है, उसपर मेरी श्रद्धा नहीं होती। तुम्हारी इस आज्ञाका पालन करना मेरे लिये धर्मका द्वार है, इसपर भी मैं विश्वास नहीं करता॥ ४॥
अकरोन्मयि यत् पापं भवती सुमहात्ययम्।
अपाकीर्णोऽस्मि यन्मातस्तद् यशः कीर्तिनाशनम्॥ ५॥
तुमने मेरे प्रति जो अत्याचार किया है, वह महान् कष्टदायक है। माता! तुमने जो मुझे पानीमें फेंक दिया, वह मेरे लिये यश और कीर्तिका नाशक बन गया॥ ५॥
अहं चेत् क्षत्रियो जातो न प्राप्तः क्षत्रसत्क्रियाम्।
त्वत्कृते किं नु पापीयः शत्रुः कुर्यान्ममाहितम्॥ ६॥
यद्यपि मैं क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ था तो भी तुम्हारे कारण क्षत्रियोचित संस्कारसे वंचित रह गया। कोई शत्रु भी मेरा इससे बढ़कर कष्टदायक एवं अहितकारक कार्य और क्या कर सकता है? ।। ६ ।।
क्रियाकाले त्वनुक्रोशमकृत्वा त्वमिमं मम ।
हीनसंस्कारसमयमद्य मां समचूचुदः ।। ७ ।।
जब मेरे लिये कुछ करनेका अवसर था, उस समय तो तुमने यह दया नहीं दिखायी और आज जब मेरे संस्कारका समय बीत गया है, ऐसे समयमें तुम मुझे क्षात्रधर्मकी ओर प्रेरित करने चली हो ।। ७ ।।
न वै मम हितं पूर्वं मातृवच्चेष्टितं त्वया ।
सा मां सम्बोधयस्यद्य केवलात्महितैषिणी ।। ८ ।।
पूर्वकालमें तुमने माताके समान मेरे हितकी चेष्टा कभी नहीं की और आज केवल अपने हितकी कामना रखकर मुझे मेरे कर्तव्यका उपदेश दे रही हो ।। ८ ।।
कृष्णेन सहितात् को वै न व्यथेत धनंजयात् ।
कोऽद्य भीतं न मां विद्यात् पार्थानां समितिं गतम् ।। ९ ।।
श्रीकृष्णके साथ मिले हुए अर्जुनसे आज कौन वीर भय मानकर पीड़ित नहीं होता? यदि इस समय मैं पाण्डवोंकी सभामें सम्मिलित हो जाऊँ तो मुझे कौन भयभीत नहीं समझेगा? ।। ९ ।।
अभ्राता विदितः पूर्वं युद्धकाले प्रकाशितः ।
पाण्डवान् यदि गच्छामि किं मां क्षत्रं वदिष्यति ।। १० ।।
आजसे पहले मुझे कोई नहीं जानता था कि मैं पाण्डवोंका भाई हूँ। युद्धके समय मेरा यह सम्बन्ध प्रकाशमें आया है। इस समय यदि पाण्डवोंसे मिल जाऊँ तो क्षत्रियसमाज मुझे क्या कहेगा? ।। १० ।।
सर्वकामैः संविभक्तः पूजितश्च यथासुखम् ।
अहं वै धार्तराष्ट्राणां कुर्यां तदफलं कथम् ।। ११ ।।
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने मुझे सब प्रकारकी मनोवांछित वस्तुएँ दी हैं और मुझे सुखपूर्वक रखते हुए सदा मेरा सम्मान किया है। उनके उस उपकारको मैं निष्फल कैसे कर सकता हूँ? ।। ११ ।।
उपनह्य परैर्वैरं ये मां नित्यमुपासते ।
नमस्कुर्वन्ति च सदा वसवो वासवं यथा ।। १२ ।।
मम प्राणेन ये शत्रूञ्शक्ताः प्रतिसमासितुम् ।
मन्यन्ते ते कथं तेषामहं छिन्द्यां मनोरथम् ।। १३ ।।
शत्रुओंसे वैर बाँधकर जो नित्य मेरी उपासना करते हैं तथा जैसे वसुगण इन्द्रको प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार जो सदा मुझे मस्तक झुकाते हैं, मेरी ही प्राणशक्तिके भरोसे जो
शत्रुओंके सामने डटकर खड़े होनेका साहस करते हैं और इसी आशासे जो मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथको मैं छिन्न-भिन्न कैसे करूँ? ।। १२-१३ ।। मया प्लवेन संग्रामं तितीर्षन्ति दुरत्ययम् । अपारे पारकामा ये त्यजेयं तानहं कथम् ।। १४ ।। जो मुझको ही नौका बनाकर उसके सहारे दुर्लङ्घ्य समरसागरको पार करना चाहते हैं और मेरे ही भरोसे अपार संकटसे पार होनेकी इच्छा रखते हैं, उन्हें इस संकटके समयमें कैसे त्याग दूँ? ।। १४ ।। अयं हि कालः सम्प्राप्तो धार्तराष्ट्रोपजीविनाम् । निर्वेष्टव्यं मया तत्र प्राणानपरिरक्षता ।। १५ ।। दुर्योधनके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंके लिये यही उपकारका बदला चुकानेके योग्य अवसर आया है। इस समय मुझे अपने प्राणोंकी रक्षा न करते हुए उनके ऋणसे उऋण होना है ।। १५ ।। कृतार्थाः सुभृता ये हि कृत्यकाले ह्युपस्थिते । अनवेक्ष्य कृतं पापा विकुर्वन्त्यनवस्थिताः ।। १६ ।। राजकिल्बिषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम् । नैवायं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम् ।। १७ ।। जो किसीके द्वारा अच्छी तरह पालित-पोषित होकर कृतार्थ होते हैं; परंतु उस उपकारका बदला चुकाने-योग्य समय आनेपर जो अस्थिरचित्त पापात्मा पुरुष पूर्वकृत उपकारोंको न देखकर बदल जाते हैं, वे स्वामीके अन्नका अपहरण करनेवाले तथा उपकारी राजाके प्रति अपराधी हैं। उन पापाचारी कृतघ्नोंके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही ।। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामर्थे योत्स्यामि ते सुतैः । बलं च शक्तिं चास्थाय न वै त्वय्यनृतं वदे ।। १८ ।। मैं तुमसे झूठ नहीं बोलता। धृतराष्ट्रके पुत्रोंके लिये मैं अपनी शक्ति और बलके अनुसार तुम्हारे पुत्रोंके साथ युद्ध अवश्य करूँगा ।। १८ ।। आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन् सत्पुरुषोचितम् । अतोऽर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वचः ।। १९ ।। परंतु उस दशामें भी दयालुता तथा सज्जनोचित सदाचारकी रक्षा करता रहूँगा। इसीलिये लाभदायक होते हुए भी तुम्हारे इस आदेशको आज मैं नहीं मानूँगा ।। १९ ।। न च तेऽयं समारम्भो मयि मोघो भविष्यति । वध्यान् विषह्यान् संग्रामे न हनिष्यामि ते सुतान् ।। २० ।। युधिष्ठिरं च भीमं च यमौ चैवार्जुनार्दृते । अर्जुनेन समं युद्धमपि यौधिष्ठिरे बले ।। २१ ।।
परंतु मेरे पास आनेका जो कष्ट तुमने उठाया है, वह भी व्यर्थ नहीं होगा। संग्राममें तुम्हारे चार पुत्रोंको काबूके अंदर तथा वधके योग्य अवस्थामें पाकर भी मैं नहीं मारूँगा। वे चार हैं, अर्जुनको छोड़कर युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव। युधिष्ठिरकी सेनामें अर्जुनके साथ ही मेरा युद्ध होगा ।। २०-२१ ।।
अर्जुनं हि निहत्याजौ सम्प्राप्तं स्यात् फलं मया ।
यशसा चापि युज्येयं निहतः सव्यसाचिना ॥ २२ ॥
अर्जुनको युद्धमें मार देनेपर मुझे संग्रामका फल प्राप्त हो जायगा अथवा स्वयं ही सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारा जाकर मैं यशका भागी बनूँगा ।। २२ ।।
न ते जातु न शिष्यन्ति पुत्राः पञ्च यशस्विनि ।
निरर्जुनाः सकर्णा वा सार्जुना वा हते मयि ॥ २३ ॥
यशस्विनि! किसी भी दशामें तुम्हारे पाँच पुत्र अवश्य शेष रहेंगे। यदि अर्जुन मारे गये तो कर्णसहित और यदि मैं मारा गया तो अर्जुनसहित तुम्हारे पाँच पुत्र रहेंगे ।। २३ ।।
इति कर्णवचः श्रुत्वा कुन्ती दुःखात् प्रवेपती ।
उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्णं धैर्यादकम्पनम् ॥ २४ ॥
कर्णकी यह बात सुनकर कुन्ती धैर्यसे विचलित न होनेवाले अपने पुत्र कर्णको हृदयसे लगाकर दुःखसे काँपती हुई बोली— ।। २४ ।।
एवं वै भाव्यमेतेन क्षयं यास्यन्ति कौरवाः ।
यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु बलवत्तरम् ॥ २५ ॥
‘कर्ण! दैव बड़ा बलवान् है। तुम जैसा कहते हो वैसा ही हो। इस युद्धके द्वारा कौरवोंका संहार होगा ।।
त्वया चतुर्णां भ्रातॄणामभयं शत्रुकर्शन ।
दत्तं तत् प्रतिजानीहि संगरप्रतिमोचनम् ॥ २६ ॥
‘शत्रुसूदन! तुमने अपने चार भाइयोंको अभयदान दिया है। युद्धमें उन्हें छोड़ देनेकी प्रतिज्ञापर दृढ़ रहना ।।
अनामयं स्वस्ति चेति पृथाथो कर्णमब्रवीत् ।
तां कर्णोऽथ तथेत्युक्त्वा ततस्तौ जग्मतुः पृथक् ॥ २७ ॥
‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें किसी प्रकारका कष्ट न हो।' इस प्रकार जब कुन्तीने कर्णसे कहा, तब कर्णने भी ‘तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली। फिर वे दोनों पृथक्-पृथक् अपने स्थानको चले गये ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कुन्ती और कर्णका भेंटविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥
१४७-
सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना
वैशम्पायन उवाच
आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिंदमः ।
पाण्डवानां यथावृत्तं केशवः सर्वमुक्तवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने हस्तिनापुरसे उपप्लव्यमें आकर पाण्डवोंसे वहाँका सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया ॥ १ ॥
सम्भाष्य सुचिरं कालं मन्त्रयित्वा पुनः पुनः ।
स्वमेव भवनं शौरिर्विश्रामार्थं जगाम ह ॥ २ ॥
दीर्घकालतक बातचीत करके बारंबार गुप्त मन्त्रणा करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण विश्रामके लिये अपने वासस्थानको गये ॥ २ ॥
विसृज्य सर्वान् नृपतीन् विराटप्रमुखांस्तदा ।
पाण्डवा भ्रातरः पञ्च भानावस्तं गते सति ॥ ३ ॥
संध्यामुपास्य ध्यायन्तस्तमेव गतमानसाः ।
आनाय्य कृष्णं दाशार्हं पुनर्मन्त्रममन्त्रयन् ॥ ४ ॥
तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर पाँचों भाई पाण्डव विराट आदि सब राजाओंको विदा करके संध्योपासना करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णमें ही मन लगाकर कुछ कालतक उन्हींका ध्यान करते रहे। फिर दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्णको बुलाकर वे उनके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगे ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः ।
किमुक्तः पुण्डरीकाक्ष तन्नः शंसितुमर्हसि ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर बोले— कमलनयन! आपने हस्तिनापुर जाकर कौरवसभामें धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे क्या कहा, यह हमें बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥
वासुदेव उवाच
मया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रजः ।
तथ्यं पथ्यं हितं चोक्तो न च गृह्णाति दुर्मतिः ॥ ६ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**राजन्! मैंने हस्तिनापुर जाकर कौरवसभामें धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यथार्थ लाभदायक और हितकर बात कही थी; परंतु वह दुर्बुद्धि उसे स्वीकार ही नहीं करता था॥ ६॥
युधिष्ठिर उवाच
तस्मिन्नुत्पथमापन्ने कुरुवृद्धः पितामहः।
किमुक्तवान् हृषीकेश दुर्योधनममर्षणम्॥ ७॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**हृषीकेश! दुर्योधनके कुमार्गका आश्रय लेनेपर कुरुकुलके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मने ईर्ष्या और अमर्षमें भरे हुए दुर्योधनसे क्या कहा?॥ ७॥
आचार्यो वा महाभाग भारद्वाजः किमब्रवीत्।
पिता वा धृतराष्ट्रस्तं गान्धारी वा किमब्रवीत्॥ ८॥
महाभाग! भरद्वाजनन्दन आचार्य द्रोणने उस समय क्या कहा? पिता धृतराष्ट्र और माता गान्धारीने भी दुर्योधनसे उस समय क्या बात कही?॥ ८॥
पिता यवीयानस्माकं क्षत्ता धर्मविदां वरः।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः किमाह धृतराष्ट्रजम्॥ ९॥
हमारे छोटे चाचा धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विदुरने भी, जो हम पुत्रोंके शोकसे सदा संतप्त रहते हैं, दुर्योधनसे क्या कहा? ।। किं च सर्वे नृपतयः सभायां ये समासते । उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद् ब्रूहि त्वं जनार्दन ॥ १० ॥ जनार्दन! इसके सिवा जो समस्त राजालोग सभामें बैठे थे, उन्होंने अपना विचार किस रूपमें प्रकट किया? आप इन सब बातोंको ठीक-ठीक बताइये ।। उक्तवान् हि भवान् सर्वं वचनं कुरुमुख्ययोः । धार्तराष्ट्रस्य तेषां हि वचनं कुरुसंसदि ॥ ११ ॥ कामलोभाभिभूतस्य मन्दस्य प्राज्ञमानिनः । अप्रियं हृदये मह्यं तन्न तिष्ठति केशव ॥ १२ ॥ कृष्ण! आपने कौरवसभामें निश्चय ही कुरुश्रेष्ठ भीष्म और धृतराष्ट्रके समीप सब बातें कह दी थीं। परंतु आपकी और उनकी उन सब बातोंको मेरे लिये हितकर होनेके कारण अपने लिये अप्रिय मानकर सम्भवतः काम और लोभसे अभिभूत मूर्ख एवं पण्डितमानी दुर्योधन अपने हृदयमें स्थान नहीं देता ।। तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । यथा च नाभिषद्येत कालस्तात तथा कुरु । भवान् हि नो गतिः कृष्ण भवान् नाथो भवान् गुरुः ॥ १३ ॥ गोविन्द! मैं उन सबकी कही हुई बातोंको सुनना चाहता हूँ। तात! ऐसा कीजिये, जिससे हमलोगोंका समय व्यर्थ न बीते। श्रीकृष्ण! आप ही हमलोगोंके आश्रय, आप ही रक्षक तथा आप ही गुरु हैं ।। १३ ।।
वासुदेव उवाच शृणु राजन् यथा वाक्यमुक्तो राजा सुयोधनः । मध्ये कुरूणां राजेन्द्र सभायां तन्निबोध मे ॥ १४ ॥ श्रीकृष्ण बोले—राजेन्द्र! मैंने कौरवसभामें राजा दुर्योधनसे जिस प्रकार बातें की हैं, वह बताता हूँ; सुनिये ।। १४ ।। मया विश्राविते वाक्ये जहास धृतराष्ट्रजः । अथ भीष्मः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥ मैंने जब अपनी बात दुर्योधनसे सुनायी, तब वह हँसने लगा। यह देख भीष्मजी अत्यन्त कुपित हो उससे इस प्रकार बोले— ।। १५ ।। दुर्योधन निबोधेदं कुलार्थे यद् ब्रवीमि ते । तच्छ्रुत्वा राजशार्दूल स्वकुलस्य हितं कुरु ॥ १६ ॥