भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 943

हमारे छोटे चाचा धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विदुरने भी, जो हम पुत्रोंके शोकसे सदा संतप्त रहते हैं, दुर्योधनसे क्या कहा? ।। किं च सर्वे नृपतयः सभायां ये समासते । उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद् ब्रूहि त्वं जनार्दन ॥ १० ॥ जनार्दन! इसके सिवा जो समस्त राजालोग सभामें बैठे थे, उन्होंने अपना विचार किस रूपमें प्रकट किया? आप इन सब बातोंको ठीक-ठीक बताइये ।। उक्तवान् हि भवान् सर्वं वचनं कुरुमुख्ययोः । धार्तराष्ट्रस्य तेषां हि वचनं कुरुसंसदि ॥ ११ ॥ कामलोभाभिभूतस्य मन्दस्य प्राज्ञमानिनः । अप्रियं हृदये मह्यं तन्न तिष्ठति केशव ॥ १२ ॥ कृष्ण! आपने कौरवसभामें निश्चय ही कुरुश्रेष्ठ भीष्म और धृतराष्ट्रके समीप सब बातें कह दी थीं। परंतु आपकी और उनकी उन सब बातोंको मेरे लिये हितकर होनेके कारण अपने लिये अप्रिय मानकर सम्भवतः काम और लोभसे अभिभूत मूर्ख एवं पण्डितमानी दुर्योधन अपने हृदयमें स्थान नहीं देता ।। तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । यथा च नाभिषद्येत कालस्तात तथा कुरु । भवान् हि नो गतिः कृष्ण भवान् नाथो भवान् गुरुः ॥ १३ ॥ गोविन्द! मैं उन सबकी कही हुई बातोंको सुनना चाहता हूँ। तात! ऐसा कीजिये, जिससे हमलोगोंका समय व्यर्थ न बीते। श्रीकृष्ण! आप ही हमलोगोंके आश्रय, आप ही रक्षक तथा आप ही गुरु हैं ।। १३ ।।

वासुदेव उवाच शृणु राजन् यथा वाक्यमुक्तो राजा सुयोधनः । मध्ये कुरूणां राजेन्द्र सभायां तन्निबोध मे ॥ १४ ॥ श्रीकृष्ण बोले—राजेन्द्र! मैंने कौरवसभामें राजा दुर्योधनसे जिस प्रकार बातें की हैं, वह बताता हूँ; सुनिये ।। १४ ।। मया विश्राविते वाक्ये जहास धृतराष्ट्रजः । अथ भीष्मः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥ मैंने जब अपनी बात दुर्योधनसे सुनायी, तब वह हँसने लगा। यह देख भीष्मजी अत्यन्त कुपित हो उससे इस प्रकार बोले— ।। १५ ।। दुर्योधन निबोधेदं कुलार्थे यद् ब्रवीमि ते । तच्छ्रुत्वा राजशार्दूल स्वकुलस्य हितं कुरु ॥ १६ ॥