महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंके सामने डटकर खड़े होनेका साहस करते हैं और इसी आशासे जो मेरा आदर करते हैं, उनके मनोरथको मैं छिन्न-भिन्न कैसे करूँ? ।। १२-१३ ।। मया प्लवेन संग्रामं तितीर्षन्ति दुरत्ययम् । अपारे पारकामा ये त्यजेयं तानहं कथम् ।। १४ ।। जो मुझको ही नौका बनाकर उसके सहारे दुर्लङ्घ्य समरसागरको पार करना चाहते हैं और मेरे ही भरोसे अपार संकटसे पार होनेकी इच्छा रखते हैं, उन्हें इस संकटके समयमें कैसे त्याग दूँ? ।। १४ ।। अयं हि कालः सम्प्राप्तो धार्तराष्ट्रोपजीविनाम् । निर्वेष्टव्यं मया तत्र प्राणानपरिरक्षता ।। १५ ।। दुर्योधनके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करनेवालोंके लिये यही उपकारका बदला चुकानेके योग्य अवसर आया है। इस समय मुझे अपने प्राणोंकी रक्षा न करते हुए उनके ऋणसे उऋण होना है ।। १५ ।। कृतार्थाः सुभृता ये हि कृत्यकाले ह्युपस्थिते । अनवेक्ष्य कृतं पापा विकुर्वन्त्यनवस्थिताः ।। १६ ।। राजकिल्बिषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम् । नैवायं न परो लोको विद्यते पापकर्मणाम् ।। १७ ।। जो किसीके द्वारा अच्छी तरह पालित-पोषित होकर कृतार्थ होते हैं; परंतु उस उपकारका बदला चुकाने-योग्य समय आनेपर जो अस्थिरचित्त पापात्मा पुरुष पूर्वकृत उपकारोंको न देखकर बदल जाते हैं, वे स्वामीके अन्नका अपहरण करनेवाले तथा उपकारी राजाके प्रति अपराधी हैं। उन पापाचारी कृतघ्नोंके लिये न तो यह लोक सुखद होता है न परलोक ही ।। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामर्थे योत्स्यामि ते सुतैः । बलं च शक्तिं चास्थाय न वै त्वय्यनृतं वदे ।। १८ ।। मैं तुमसे झूठ नहीं बोलता। धृतराष्ट्रके पुत्रोंके लिये मैं अपनी शक्ति और बलके अनुसार तुम्हारे पुत्रोंके साथ युद्ध अवश्य करूँगा ।। १८ ।। आनृशंस्यमथो वृत्तं रक्षन् सत्पुरुषोचितम् । अतोऽर्थकरमप्येतन्न करोम्यद्य ते वचः ।। १९ ।। परंतु उस दशामें भी दयालुता तथा सज्जनोचित सदाचारकी रक्षा करता रहूँगा। इसीलिये लाभदायक होते हुए भी तुम्हारे इस आदेशको आज मैं नहीं मानूँगा ।। १९ ।। न च तेऽयं समारम्भो मयि मोघो भविष्यति । वध्यान् विषह्यान् संग्रामे न हनिष्यामि ते सुतान् ।। २० ।। युधिष्ठिरं च भीमं च यमौ चैवार्जुनार्दृते । अर्जुनेन समं युद्धमपि यौधिष्ठिरे बले ।। २१ ।।