महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 939, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु मेरे पास आनेका जो कष्ट तुमने उठाया है, वह भी व्यर्थ नहीं होगा। संग्राममें तुम्हारे चार पुत्रोंको काबूके अंदर तथा वधके योग्य अवस्थामें पाकर भी मैं नहीं मारूँगा। वे चार हैं, अर्जुनको छोड़कर युधिष्ठिर, भीम, नकुल और सहदेव। युधिष्ठिरकी सेनामें अर्जुनके साथ ही मेरा युद्ध होगा ।। २०-२१ ।।
अर्जुनं हि निहत्याजौ सम्प्राप्तं स्यात् फलं मया ।
यशसा चापि युज्येयं निहतः सव्यसाचिना ॥ २२ ॥
अर्जुनको युद्धमें मार देनेपर मुझे संग्रामका फल प्राप्त हो जायगा अथवा स्वयं ही सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारा जाकर मैं यशका भागी बनूँगा ।। २२ ।।
न ते जातु न शिष्यन्ति पुत्राः पञ्च यशस्विनि ।
निरर्जुनाः सकर्णा वा सार्जुना वा हते मयि ॥ २३ ॥
यशस्विनि! किसी भी दशामें तुम्हारे पाँच पुत्र अवश्य शेष रहेंगे। यदि अर्जुन मारे गये तो कर्णसहित और यदि मैं मारा गया तो अर्जुनसहित तुम्हारे पाँच पुत्र रहेंगे ।। २३ ।।
इति कर्णवचः श्रुत्वा कुन्ती दुःखात् प्रवेपती ।
उवाच पुत्रमाश्लिष्य कर्णं धैर्यादकम्पनम् ॥ २४ ॥
कर्णकी यह बात सुनकर कुन्ती धैर्यसे विचलित न होनेवाले अपने पुत्र कर्णको हृदयसे लगाकर दुःखसे काँपती हुई बोली— ।। २४ ।।
एवं वै भाव्यमेतेन क्षयं यास्यन्ति कौरवाः ।
यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु बलवत्तरम् ॥ २५ ॥
‘कर्ण! दैव बड़ा बलवान् है। तुम जैसा कहते हो वैसा ही हो। इस युद्धके द्वारा कौरवोंका संहार होगा ।।
त्वया चतुर्णां भ्रातॄणामभयं शत्रुकर्शन ।
दत्तं तत् प्रतिजानीहि संगरप्रतिमोचनम् ॥ २६ ॥
‘शत्रुसूदन! तुमने अपने चार भाइयोंको अभयदान दिया है। युद्धमें उन्हें छोड़ देनेकी प्रतिज्ञापर दृढ़ रहना ।।
अनामयं स्वस्ति चेति पृथाथो कर्णमब्रवीत् ।
तां कर्णोऽथ तथेत्युक्त्वा ततस्तौ जग्मतुः पृथक् ॥ २७ ॥
‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें किसी प्रकारका कष्ट न हो।' इस प्रकार जब कुन्तीने कर्णसे कहा, तब कर्णने भी ‘तथास्तु' कहकर उसकी बात मान ली। फिर वे दोनों पृथक्-पृथक् अपने स्थानको चले गये ।। २७ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीकर्णसमागमे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।