महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 945, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंस हि रामभयादेभिर्नागरैर्विप्रवासितः ॥ २४ ॥
‘तदनन्तर एक समय मैं परशुरामजीके साथ द्वन्द्वयुद्धके लिये समरभूमिमें उतरा। उन दिनों परशुरामजीके भयसे यहाँके नागरिकोंने राजा विचित्रवीर्यको इस नगरसे दूर हटा दिया था ॥ २४ ॥
दारेष्वप्यतिसक्तश्च यक्ष्माणं समपद्यत ।
यदा त्वराजके राष्ट्रे न ववर्ष सुरेश्वरः ।
तदाभ्यधावन् मामेव प्रजाः क्षुद्भयपीडिताः ॥ २५ ॥
‘वे अपनी पत्नियोंमें अधिक आसक्त होनेके कारण राजयक्ष्माके रोगसे पीड़ित हो मृत्युको प्राप्त हो गये। तब बिना राजाके राज्यमें देवराज इन्द्रने वर्षा बंद कर दी, उस दशामें सारी प्रजा क्षुधाके भयसे पीड़ित हो मेरे ही पास दौड़ी आयी’ ॥ २५ ॥
प्रजा ऊचुः
उपक्षीणाः प्रजाः सर्वा राजा भव भवाय नः ।
ईतीः प्रणूद भद्रं ते शान्तनोः कुलवर्धन ॥ २६ ॥
**प्रजा बोली—**शान्तनुके कुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज! आपका कल्याण हो। राज्यकी सारी प्रजा क्षीण होती चली जा रही है। आप हमारे अभ्युदयके लिये राजा होना स्वीकार करें और अनावृष्टि आदि ईतियोंका भय दूर कर दें ॥ २६ ॥
पीड्यन्ते ते प्रजाः सर्वा व्याधिभिर्भृशदारुणैः ।
अल्पावशिष्टा गाङ्गेय ताः परित्रातुमर्हसि ॥ २७ ॥
गंगानन्दन! आपकी सारी प्रजा अत्यन्त भयंकर रोगोंसे पीड़ित है। प्रजाओंमेंसे बहुत थोड़े लोग जीवित बचे हैं। अतः आप उन सबकी रक्षा करें ॥ २७ ॥
व्याधीन् प्रणूद वीर त्वं प्रजा धर्मेण पालय ।
त्वयि जीवति मा राष्ट्रं विनाशमुपगच्छतु ॥ २८ ॥
वीर! आप रोगोंको हटावें और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करें। आपके जीते-जी इस राज्यका विनाश न हो जाय ॥ २८ ॥
भीष्म उवाच
प्रजानां क्रोशतीनां वै नैवाक्षुभ्यत मे मनः ।
प्रतिज्ञां रक्षमाणस्य सद् वृत्तं स्मरतस्तथा ॥ २९ ॥
**भीष्म कहते हैं—**प्रजाओंकी यह करुण पुकार सुनकर भी प्रतिज्ञाकी रक्षा और सदाचारका स्मरण करके मेरा मन क्षुब्ध नहीं हुआ ॥ २९ ॥
ततः पौरा महाराज माता काली च मे शुभा ।
भृत्याः पुरोहिताचार्या ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः ।
मामूचुर्भृशसंतप्ता भव राजेति संततम् ॥ ३० ॥