महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 979, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘भूमिपालो! आप कुरुक्षेत्रमें सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें ऐसे शिविर तैयार करावें, जिनमें अपनी आवश्यकताके अनुसार पर्याप्त अवकाश हों तथा शत्रुलोग जिनपर अधिकार न कर सकें। उनमें पास ही जल और काष्ठ आदि मिलनेकी सुविधाएँ हों। उनमें ऐसे मार्ग होने चाहिये जिनके द्वारा खाद्यसामग्री सुविधासे लायी जा सके और शत्रुलोग उसे नष्ट न कर सकें तथा उनके चारों तरफ किलेबन्दी कर देनी चाहिये ।। १४-१५ ।।
विविधायुधपूर्णानि पताकाध्वजवन्ति च । समाश्च तेषां पन्थानः क्रियन्तां नगराद् बहिः ॥ १६ ॥ ‘उन शिविरोंको नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे भरपूर तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित रखना चाहिये। शिविरोंका जो नगर बसाया जाय, उससे बाहर अनेक सीधे तथा समतल मार्ग उन शिविरोंमें जानेके लिये बनाये जायँ ॥ १६ ॥
प्रयाणं घुष्यतामद्य श्वोभूत इति मा चिरम् । ते तथेति प्रतिज्ञाय श्वोभूते चक्रिरे तथा ॥ १७ ॥ हृष्टरूपा महात्मानो निवासाय महीक्षिताम् । ‘आज ही यह घोषणा करा दी जाय कि कल सबेरे ही युद्धके लिये प्रस्थान करना है। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये।’ दुर्योधनका यह आदेश सुनकर ‘बहुत अच्छा—ऐसा ही होगा’ यह प्रतिज्ञा करके महामना कर्ण आदिने अत्यन्त प्रसन्न होकर सबेरा होते ही राजाओंके निवासके लिये शिविर बनवाने आरम्भ कर दिये ।। १७ १/२ ।।
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तच्छ्रुत्वा राजशासनम् ॥ १८ ॥ आसनेभ्यो महार्हेभ्य उदतिष्ठन्नमर्षिताः । बाहून् परिघसंकाशान् संस्पृशन्तः शनैः शनैः ॥ १९ ॥ काञ्चनाङ्गददीप्तांश्च चन्दनागुरुभूषितान् । तदनन्तर वहाँ आये हुए सब नरेश राजा दुर्योधनकी यह आज्ञा सुनकर रोषावेशसे परिपूर्ण हो चन्दन और अगुरुसे चर्चित तथा सोनेके भुजबंदोंसे प्रकाशित अपनी परिघके समान मोटी भुजाओंका धीरे-धीरे स्पर्श करते हुए बहुमूल्य आसनोंसे उठकर खड़े हो गये ।। १८-१९ १/२ ।।
उष्णीषाणि नियच्छन्तः पुण्डरीकनिभैः करैः । अन्तरीयोत्तरीयाणि भूषणानि च सर्वशः ॥ २० ॥ उन्होंने अपने कमलसदृश करोंसे मस्तकपर पगड़ी बाँध ली; फिर धोती, चादर और सब प्रकारके आभूषण धारण कर लिये ॥ २० ॥
ते रथान् रथिनः श्रेष्ठा हयांश्च हयकोविदाः । सज्जयन्ति स्म नागांश्च नागशिक्षास्वनुष्ठिताः ॥ २१ ॥ श्रेष्ठ रथी अपने रथोंको, अश्वसंचालनकी कलामें कुशल योद्धा घोड़ोंको और हस्तिशिक्षामें निपुण सैनिक हाथियोंको सुसज्जित करने लगे ।। २१ ।।