महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 980, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ वर्माणि चित्राणि काञ्चनानि बहूनि च ।
विविधानि च शस्त्राणि चक्रुः सर्वाणि सर्वशः ॥ २२ ॥
उन्होंने सोनेके बने हुए बहुत-से विचित्र कवच तथा सब प्रकारके विभिन्न अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिये ॥ २२ ॥
पदातयश्च पुरुषाः शस्त्राणि विविधानि च ।
उपाजहुः शरीरेषु हेमचित्राण्यनेकणः ॥ २३ ॥
पैदल योद्धाओंने भी अपने अंगोंमें सुवर्णजटित कवच तथा भाँति-भाँतिके अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिये ॥ २३ ॥
तदुत्सव इवोदग्रं सम्प्रहृष्टनरावृतम् ।
नगरं धार्तराष्ट्रस्य भारतासीत् समाकुलम् ॥ २४ ॥
जनमेजय! दुर्योधनका वह हस्तिनापुर नगर मानो वहाँ कोई उत्सव हो रहा हो, इस प्रकार समृद्ध और हर्षोत्फुल्ल मनुष्योंसे भर गया था, इससे वहाँ बड़ी हलचल मच गयी थी ॥ २४ ॥
जनौघसलिलावर्तो रथनागाश्वमीनवान् ।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः कोशसंचयरत्नवान् ॥ २५ ॥
चित्राभरणवर्मोर्मिः शस्त्रनिर्मलफेनवान् ।
प्रासादमालाद्रिवृतो रथ्यापणमहाह्रदः ॥ २६ ॥
योधचन्द्रोदयोद्भूतः कुरुराजमहार्णवः ।
व्यदृश्यत तदा राजंश्चन्द्रोदय इवोदधिः ॥ २७ ॥
राजन्! जैसे चन्द्रोदयकालमें समुद्र उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार कुरुराज दुर्योधनरूपी महासागर सैनिक-समुदायरूपी चन्द्रमाके उदयसे अत्यन्त उल्लसित दिखायी देने लगा। सब ओर घूमता हुआ जनसमुदाय ही वहाँ जलमें उठनेवाली भँवरोंके समान जान पड़ता था। रथ, हाथी और घोड़े उसमें मछलीके समान प्रतीत होते थे। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस कुरुराजरूपी समुद्रकी गर्जना थी। खजानोंका संग्रह ही रत्नराशिका प्रतिनिधित्व कर रहा था। योद्धाओंके विचित्र आभूषण और कवच ही उस समुद्रकी उठती हुई तरंगोंके समान जान पड़ते थे। चमकीले शस्त्र ही निर्मल फेन-से प्रतीत होते थे। महलोंकी पंक्तियाँ ही तटवर्ती पर्वत-सी जान पड़ती थीं। सड़कोंपर स्थित दूकानें ही मानो गुफाएँ थीं ॥ २५—२७ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि दुर्योधनसैन्यसज्जकरणे
त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सैन्यनिर्याणपर्वमें ‘दुर्योधनका अपनी सेनाको सुसज्जित करना’ इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा