महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1009, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदहं बाहुमच्छैत्सं न स धर्मो विगर्हितः ॥ ४२ ॥
‘आप तलवार हाथमें लेकर रणभूमिमें वृष्णिवीर सात्यकिका वध करना चाहते थे। उस दशामें मैंने जो आपकी बाँह काट डाली है, वह आश्रित-रक्षारूप धर्म निन्दित नहीं है ॥ ४२ ॥
न्यस्तशस्त्रस्य बालस्य विरथस्य विवर्मणः ।
अभिमन्योर्वधं तात धार्मिकः को नु पूजयेत् ॥ ४३ ॥
तात! बालक अभिमन्यु शस्त्र, कवच और रथसे हीन हो चुका था, उस दशामें जो उसका वध किया गया, उसकी कौन धार्मिक पुरुष प्रशंसा कर सकता है ॥ ४३ ॥
(दुर्योधनस्य क्षुद्रस्य न प्रमाणेऽवतिष्ठतः ।
सौमदत्तेर्वधः साधुः स वै साहाय्यकारिणः ॥
‘जो शास्त्रीय मर्यादामें स्थित नहीं रहता, उस नीच दुर्योधनकी सहायता करनेवाले सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाका जो इस प्रकार वध हुआ है, वह ठीक ही है।
अस्मदीया मया रक्ष्याः प्राणबाध उपस्थिते ।
ये मे प्रत्यक्षतो वीरा हन्येरन्निति मे मतिः ॥
‘मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि मुझे प्राण-संकट उपस्थित होनेपर आत्मीय जनोंकी रक्षा करनी चाहिये; विशेषतः उन वीरोंकी जो मेरी आँखोंके सामने मारे जा रहे हों।
सात्यकिश्च वशं नीतः कौरवेण महात्मना ।
ततो मयैतच्चरितं प्रतिज्ञारक्षणं प्रति ॥
‘कुरुवंशी महामना भूरिश्रवाने सात्यकिको अपने वशमें कर लिया था। इसीसे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये मैंने यह कार्य किया है’।
संजय उवाच
पुनश्च कृपयाऽऽविष्टो बहु तत्तद् विचिन्तयन् ।
उवाच चैनं कौरव्यमर्जुनः शोकपीडितः ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! फिर बहुत-सी भिन्न-भिन्न बातें सोचकर अर्जुन दयासे द्रवित और शोकसे पीड़ित हो उठे तथा कुरुवंशी भूरिश्रवासे इस प्रकार बोले।
अर्जुन उवाच
धिगस्तु क्षत्रधर्मं तु यत्र त्वं पुरुषेश्वरः ।
अवस्थामीदृशीं प्राप्तः शरण्यः शरणप्रदः ।
**अर्जुनने कहा—**उस क्षत्रिय-धर्मको धिक्कार है, जहाँ दूसरोंको शरण देनेवाले आप-जैसे शरणागतवत्सल नरेश एसी अवस्थाको जा पहुँचे हैं।
को हि नाम पुमाँल्लोके मादृशः पुरुषोत्तमः ।
प्रहरेत् त्वद्विधं त्वद्य प्रतिज्ञा यदि नो भवेत् ॥)