महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि पहलेसे प्रतिज्ञा न की गयी होती तो संसारमें मेरे-जैसा कौन श्रेष्ठ पुरुष आप-जैसे
गुरुजनपर आज ऐसा प्रहार कर सकता था।
एवमुक्तः स पार्थेन शिरसा भूमिमस्पृशत् ।
पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम् ।। ४४ ।।
कुन्तीकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर भूरिश्रवाने अपने मस्तकसे भूमिको स्पर्श किया।
बायें हाथसे अपना दाहिना हाथ उठाकर अर्जुनके पास फेंक दिया ।। ४४ ।।
एतत् पार्थस्य तु वचस्ततः श्रुत्वा महाद्युतिः ।
यूपकेतुर्महाराज तूष्णीमासीदवाङ्मुखः ।। ४५ ।।
महाराज! पार्थकी उपर्युक्त बात सुनकर यूप-चिह्नित ध्वजावाले महातेजस्वी भूरिश्रवा
नीचे मुँह किये मौन रह गये ।। ४५ ।।
अर्जुन उवाच
या प्रीतिर्धर्मराजे मे भीमे च बलिनां वरे ।
नकुले सहदेवे च सा मे त्वयि शलाग्रज ।। ४६ ।।
उस समय अर्जुनने कहा—शलके बड़े भाई भूरिश्रवाजी! मेरा जो प्रेम धर्मराज
युधिष्ठिर, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन, नकुल और सहदेवमें है, वही आपमें भी है ।। ४६ ।।
मया त्वं समनुज्ञातः कृष्णेन च महात्मना ।
गच्छ पुण्यकृताँल्लोकान् शिबिरौशीनरो यथा ।। ४७ ।।
मैं और महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण आपको यह आज्ञा देते हैं कि आप उशीनरपुत्र
शिबिके समान पुण्यात्मा पुरुषोंके लोकोंमें जायँ ।। ४७ ।।
वासुदेव उवाच
ये लोका मम विमलाः सकृद् विभाता
ब्रह्माद्यैः सुरवृषभैरपीष्यमाणाः ।
तान् क्षिप्रं व्रज सतताग्निहोत्रयाजिन्
मत्तुल्यो भव गरुडोत्तमाङ्गयानः ।। ४८ ।।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—निरन्तर अग्निहोत्रद्वारा यजन करनेवाले भूरिश्रवाजी! मेरे
जो निरन्तर प्रकाशित होनेवाले निर्मल लोक हैं और ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी जहाँ जानेकी
सदैव अभिलाषा रखते हैं, उन्हीं लोकोंमें आप शीघ्र पधारिये और मेरे ही समान गरुड़की
पीठपर बैठकर विचरनेवाले होइये ।। ४८ ।।
संजय उवाच
उत्थितः स तु शैनेयो विमुक्तः सौमदत्तिना ।
खड्गमादाय चिच्छित्सुः शिरस्तस्य महात्मनः ।। ४९ ।।