भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1011

संजय कहते हैं— राजन्! सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाके छोड़ देनेपर शिनिपौत्र सात्यकि उठकर खड़े हो गये। फिर उन्होंने तलवार लेकर महामना भूरिश्रवाका सिर काट लेनेका निश्चय किया ।। ४९ ।। निहतं पाण्डुपुत्रेण प्रसक्तं भूरिदक्षिणम् । इयेष सात्यकिर्हन्तुं शलाग्रजमकल्मषम् ।। ५० ।। निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम् । शलके बड़े भाई प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भूरिश्रवा सर्वथा निष्पाप थे। पाण्डुपुत्र अर्जुनने उनकी बाँह काटकर उनका वध-सा ही कर दिया था और इसीलिये वे आमरण अनशनका निश्चय लेकर ध्यान आदि अन्य कार्योंमें आसक्त हो गये थे। उस अवस्थामें सात्यकिने बाँह कट जानेसे सूँड़ कटे हाथीके समान बैठे हुए भूरिश्रवाको मार डालनेकी इच्छा की ।। ५० १/२ ।।

क्रोशतां सर्वसैन्यानां निन्द्यमानः सुदुर्मनाः ।। ५१ ।। वार्यमाणः स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना । भीमेन चक्ररक्षाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च ।। ५२ ।। कर्णेन वृषसेनेन सैन्धवेन तथैव च । विक्रोशतां च सैन्यानामवधीत् तं धृतव्रतम् ।। ५३ ।। उस समय समस्त सेनाके लोग चिल्ला-चिल्लाकर सात्यकिकी निन्दा कर रहे थे। परंतु सात्यकिकी मनोदशा बहुत बुरी थी। भगवान् श्रीकृष्ण तथा महात्मा अर्जुन भी उन्हें रोक रहे थे। भीमसेन, चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजा, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, वृषसेन तथा सिंधुराज जयद्रथ भी उन्हें मना करते रहे, किंतु समस्त सैनिकोंके चीखने-चिल्लानेपर भी सात्यकिने उस व्रतधारी भूरिश्रवाका वध कर ही डाला ।। ५१—५३ ।।

प्रायोपविष्टाय रणे पार्थेन छिन्नबाहवे । सात्यकिः कौरवेयाय खड्गेनापाहरच्छिरः ।। ५४ ।। रणभूमिमें अर्जुनने जिनकी भुजा काट डाली थी तथा जो आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठे थे, उन भूरिश्रवापर सात्यकिने खड्गका प्रहार किया और उनका सिर काट लिया ।। ५४ ।।