भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 102

आरावं विपुलं कुर्वन् व्यथयन् सर्वसैनिकान् । यदाऽऽयान्नकुलो द्रोणं के शूराः पर्यवारयन् ।। ३० ।। सुकुमार, तरुण, शूरवीर, दर्शनीय (सुन्दर), मेधावी, युद्धकुशल, बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी पाण्डुपुत्र नकुल जब युद्धमें जोर-जोरसे गर्जना करके समस्त सैनिकोंको पीड़ित करते हुए द्रोणाचार्यपर चढ़ आये, उस समय किन वीरोंने उन्हें रोका था? ।। २९-३० ।। आशीविष इव क्रुद्धः सहदेवो यदाभ्ययात् । कदनं करिष्यञ्छत्रूणां तेजसा दुर्जयो युधि ।। ३१ ।। आर्यव्रतममोघेषुं ह्रीमन्तमपराजितम् । सहदेवं तमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ।। ३२ ।। विषधर सर्पके समान क्रोधमें भरे हुए तथा तेजसे दुर्जय सहदेव जब युद्धमें शत्रुओंका संहार करते हुए द्रोणाचार्यके सामने आये, उस समय श्रेष्ठ व्रतधारी अमोघ बाणोंवाले लज्जाशील और अपराजित वीर सहदेवको आते देख किन शूरवीरोंने उन्हें रोका था? ।। ३१-३२ ।। यस्तु सौवीरराजस्य प्रमथ्य महतीं चमूम् । आदत्त महिषीं भोजां काम्यां सर्वाङ्गशोभनाम् ।। ३३ ।। सत्यं धृतिश्च शौर्यं च ब्रह्मचर्यं च केवलम् । सर्वाणि युयुधानेऽस्मिन् नित्यानि पुरुषर्षभे ।। ३४ ।। जिन्होंने सौवीरराजकी विशाल सेनाको मथकर उनकी सर्वांगसुन्दरी कमनीय कन्या भोजाको अपनी रानी बनानेके लिये हर लिया था, उन पुरुषशिरोमणि सात्यकिमें सत्य, धैर्य, शौर्य और विशुद्ध ब्रह्मचर्य आदि सारे सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं ।। ३३-३४ ।। बलिनं सत्यकर्माणमदीनमपराजितम् । वासुदेवसमं युद्धे वासुदेवादनन्तरम् ।। ३५ ।। धनंजयोपदेशेन श्रेष्ठमिष्वस्त्रकर्मणि । पार्थेन सममस्त्रेषु कस्तं द्रोणादवारयत् ।। ३६ ।। वे सात्यकि बलवान्, सत्यपराक्रमी, उदार, अपराजित, युद्धमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समान शक्तिशाली, अवस्थामें उनसे कुछ छोटे, अर्जुनसे ही शिक्षा पाकर बाणविद्यामें श्रेष्ठ तथा अस्त्रोंके संचालनमें कुन्तीकुमार अर्जुनके तुल्य यशस्वी हैं। उन वीरवर सात्यकिको किसने द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोका? ।। ३५-३६ ।। वृष्णीनां प्रवरं वीरं शूरं सर्वधनुष्मताम् । रामेण सममस्त्रेषु यशसा विक्रमेण च ।। ३७ ।। वृष्णिवंशके श्रेष्ठ शूरवीर सात्यकि सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें उत्तम हैं। वे अस्त्र-विद्या, यश तथा पराक्रममें परशुरामजीके समान हैं ।। ३७ ।।

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