भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 103

सत्यं धृतिर्मतिः शौर्यं ब्राह्मं चास्त्रमनुत्तमम् । सात्वते तानि सर्वाणि त्रैलोक्यमिव केशवे ॥ ३८ ॥ जैसे भगवान् श्रीकृष्णमें तीनों लोक स्थित हैं, उसी प्रकार सात्वतवंशी सात्यकिमें सत्य, धैर्य, बुद्धि, शौर्य तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र विद्यमान हैं ॥ ३८ ॥

तमेवंगुणसम्पन्नं दुर्वारमपि दैवतैः । समासाद्य महेष्वासं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ३९ ॥ इस प्रकार सर्वसद्गुणसम्पन्न महाधनुर्धर सात्यकिको रोकना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। उनके पास पहुँचकर किन शूरवीरोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोका? ॥ ३९ ॥

पञ्चालेषूत्तमं वीरमुत्तमाभिजनप्रियम् । नित्यमुत्तमकर्माणमुत्तमौजसमाहवे ॥ ४० ॥ युक्तं धनंजयहिते समानर्थार्थमुत्थितम् । यमवैश्रवणादित्यमहेन्द्रवरुणोपमम् ॥ ४१ ॥ महारथं समाख्यातं द्रोणायोद्यतमाहवे । त्यजन्तं तुमुले प्राणान् के शूराः समवारयन् ॥ ४२ ॥ पांचालोंमें उत्तम, श्रेष्ठ कुल एवं ख्यातिके प्रेमी, सदा सत्कर्म करनेवाले, संग्राममें उत्तम आत्मबलका परिचय देनेवाले, अर्जुनके हितसाधनमें तत्पर, मेरा अनर्थ करनेके लिये उद्यत रहनेवाले, यमराज, कुबेर, सूर्य, इन्द्र और वरुणके समान तेजस्वी, विख्यात महारथी तथा भयंकर युद्धमें अपने प्राणोंको निछावर करके द्रोणाचार्यसे भिड़नेके लिये सदा तैयार रहनेवाले वीर धृष्टद्युम्नको किन शूरवीरोंने रोका? ॥ ४०—४२ ॥

एकोऽपसृत्य चेदिभ्यः पाण्डवान् यः समाश्रितः । धृष्टकेतुं समायान्तं द्रोणं कस्तं न्यवारयत् ॥ ४३ ॥ जिसने अकेले ही चेदिदेशसे आकर पाण्डव-पक्षका आश्रय लिया है, उस धृष्टकेतुको द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ॥ ४३ ॥

योऽवधीत् केतुमान् वीरो राजपुत्रं दुरासदम् । अपरान्तगिरिद्वारे द्रोणात् कस्तं न्यवारयत् ॥ ४४ ॥ जिस वीरने अपरान्त पर्वतके द्वारदेशमें स्थित दुर्जय राजकुमारका वध किया, उस केतुमान्को द्रोणाचार्यके पास आनेसे किसने रोका? ॥ ४४ ॥

स्त्रीपुंसयोर्नरव्याघ्रो यः स वेद गुणागुणान् । शिखण्डिनं याज्ञसेनिमम्लानमनसं युधि ॥ ४५ ॥ देवव्रतस्य समरे हेतुं मृत्योर्महात्मनः । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ४६ ॥ जो पुरुषसिंह स्त्री और पुरुष दोनों शरीरोंके गुण-अवगुणको अपने अनुभवद्वारा जानता है, युद्धस्थलमें जिसका मन कभी म्लान (उत्साहशून्य) नहीं होता, जो समरांगणमें