भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

महात्मा भीष्मकी मृत्युमें हेतु बन चुका है, उस द्रुपदपुत्र शिखण्डीको द्रोणाचार्यके सम्मुख आनेसे किन वीरोंने रोका था? ।। ४५-४६ ।। यस्मिन्नभ्यधिका वीरे गुणाः सर्वे धनंजयात् । यस्मिन्नस्त्राणि सत्यं च ब्रह्मचर्यं च सर्वदा ।। ४७ ।। वासुदेवसमं वीर्ये धनंजयसमं बले । तेजसाऽऽदित्यसदृशं बृहस्पतिसमं मतौ ।। ४८ ।। अभिमन्युं महात्मानं व्यात्ताननमिवान्तकम् । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः समवारयन् ।। ४९ ।। जिस वीरमें अर्जुनसे भी अधिक मात्रामें समस्त गुण मौजूद हैं, जिसमें अस्त्र, सत्य तथा ब्रह्मचर्य सदा प्रतिष्ठित हैं, जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्ण, बलमें अर्जुन, तेजमें सूर्य और बुद्धिमें बृहस्पतिके समान है, वह महामना अभिमन्यु जब मुँह फैलाये हुए कालके समान द्रोणाचार्यके सम्मुख जा रहा था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ।। ४७—४९ ।। तरुणस्तरुणप्रज्ञः सौभद्रः परवीरहा । यदाभ्यधावद् वै द्रोणं तदाऽऽसीद् वो मनः कथम् ।। ५० ।। तरुण अवस्था और तरुण बुद्धिवाले शत्रुवीरोंके हन्ता सुभद्राकुमारने जब द्रोणाचार्यपर धावा किया था, उस समय तुमलोगोंका मन कैसा हो रहा था? ।। ५० ।। द्रौपदेया नरव्याघ्राः समुद्रमिव सिन्धवः । यद् द्रोणमाद्रवन् संख्ये के शूरास्तान् न्यवारयन् ।। ५१ ।। पुरुषसिंह द्रौपदीकुमार समुद्रकी ओर जानेवाली नदियोंकी भाँति जब द्रोणाचार्यपर धावा कर रहे थे, उस समय युद्धमें किन शूरवीरोंने उनको रोका था? ।। ५१ ।। एते द्वादश वर्षाणि क्रीडामुत्सृज्य बालकाः । अस्त्रार्थमवसन् भीष्मे बिभ्रतो व्रतमुत्तमम् ।। ५२ ।। इन द्रौपदीकुमारोंने बारह वर्षोंतक खेल-कूद छोड़कर अस्त्रोंकी शिक्षा पानेके लिये उत्तम ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए भीष्मके समीप निवास किया था ।। ५२ ।। क्षत्रंजयः क्षत्रदेवः क्षत्रवर्मा च मानदः । धृष्टद्युम्नात्मजा वीराः के तान् द्रोणादवारयन् ।। ५३ ।। क्षत्रंजय, क्षत्रदेव तथा दूसरोंको मान देनेवाले क्षत्रवर्मा—ये धृष्टद्युम्नके तीन वीर पुत्र हैं। उन्हें द्रोणके पास आनेसे किन वीरोंने रोका था? ।। ५३ ।। शताद् विशिष्टं यं युद्धे सममन्यन्त वृष्णयः । चेकितानं महेष्वासं कस्तं द्रोणादवारयत् ।। ५४ ।। जिन्हें युद्धके मैदानमें वृष्णिवंशियोंने सौ वीरोंसे भी अधिक माना है, उन महाधनुर्धर चेकितानको द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५४ ।। वार्धक्षेमिः कलिङ्गानां यः कन्यामाहरद् युधि ।