महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनाधृष्टिरदीनात्मा कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ५५ ॥ वृद्धक्षेमके पुत्र उदारचित्त अनाधृष्टिने युद्धस्थलमें कलिंगराजकी कन्याका अपहरण किया था। उन्हें द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५५ ।। भ्रातरः पञ्च कैकेया धार्मिकाः सत्यविक्रमाः । इन्द्रगोपकसंकाशा रक्तवर्मायुधध्वजाः ॥ ५६ ॥ मातृष्वसुः सुता वीराः पाण्डवानां जयार्थिनः । तान् द्रोणं हन्तुमायातान् के वीराः पर्यवारयन् ॥ ५७ ॥ केकय देशके सत्यपराक्रमी, धर्मात्मा पाँच वीर राजकुमार लाल रंगके कवच, आयुध और ध्वज धारण करनेवाले हैं तथा उनके शरीरकी कान्ति भी इन्द्रगोपके समान लाल रंगकी ही है; वे पाण्डवोंकी मौसीके बेटे हैं। वे जब पाण्डवोंकी विजयके लिये द्रोणाचार्यको मारनेके लिये उनपर चढ़ आये, उस समय किन वीरोंने उन्हें रोका था? ।। ५६-५७ ।। यं योधयन्तो राजानो नाजयन् वारणावते । षण्मासानपि संरब्धा जिघांसन्तो युधाम्पतिम् ॥ ५८ ॥ धनुष्मतां वरं शूरं सत्यसंधं महाबलम् । द्रोणात् कस्तं नरव्याघ्रं युयुत्सुं पर्यवारयत् ॥ ५९ ॥ वारणावत नगरमें सब राजालोग मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरकर छः महीनोंतक युद्ध करते रहनेपर भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ जिस वीरको परास्त न कर सके, धनुर्धरोंमें उत्तम, शौर्यसम्पन्न, सत्यप्रतिज्ञ, महाबली, उस पुरुषसिंह युयुत्सुको द्रोणाचार्यके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५८-५९ ।। यः पुत्रं काशिराजस्य वाराणस्यां महारथम् । समरे स्त्रीषु गृध्यन्तं भल्लेनापाहरद् रथात् ॥ ६० ॥ धृष्टद्युम्नं महेष्वासं पार्थानां मन्त्रधारिणम् । युक्तं दुर्योधनानर्थे सृष्टं द्रोणवधाय च ॥ ६१ ॥ निर्दहन्तं रणे योधान् दारयन्तं च सर्वतः । द्रोणाभिमुखमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ६२ ॥ जिसने काशीपुरीमें काशिराजके महारथी पुत्रको, जो स्त्रियोंके प्रति आसक्त था, समरभूमिमें भल्ल नामक बाणद्वारा रथसे मार गिराया; जो कुन्तीकुमारोंकी गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाला तथा दुर्योधनका अनर्थ करनेके लिये उद्यत रहनेवाला है तथा जिसकी उत्पत्ति द्रोणाचार्यके वधके लिये हुई है; वह महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न जब रणक्षेत्रमें योद्धाओंको अपने बाणोंकी अग्निसे जलाता और सब ओरसे सारी सेनाको विदीर्ण करता हुआ द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ।। ६०—६२ ।। उत्सङ्ग इव संवृद्धं द्रुपदस्यास्त्रवित्तमम् । शैखण्डिनं शस्त्रगुप्तं के च द्रोणादवारयन् ॥ ६३ ॥