महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो द्रुपदकी गोदमें पला हुआ था और शस्त्रोंद्वारा सुरक्षित था, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उस शिखण्डीपुत्रको द्रोणाचार्यके पास आनेसे किन वीरोंने रोका? ॥ ६३ ॥
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां चर्मवत् समवेष्टयत् । महता रथघोषेण मुख्यारिघ्नो महारथः ॥ ६४ ॥ दशाश्वमेधानाजह्रे स्वन्नपानाप्तदक्षिणान् । निरर्गलान् सर्वमेधान् पुत्रवत् पालयन् प्रजाः ॥ ६५ ॥ गङ्गास्रोतसि यावत्यः सिकता अप्यशेषतः । तावतीर्गा ददौ वीर उशीनरसुतोऽध्वरे ॥ ६६ ॥ जैसे चमड़ेको अंगोंमें लपेट लिया जाता है, उसी प्रकार जिन्होंने अपने रथके महान् घोषद्वारा इस सारी पृथिवीको व्याप्त कर लिया था, जो प्रधान-प्रधान शत्रुओंका वध करनेवाले और महारथी वीर थे, जिन्होंने प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते हुए सुन्दर अन्न, पान तथा प्रचुर दक्षिणासे युक्त एवं विघ्नरहित दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया और कितने ही सर्वमेध-यज्ञ सम्पन्न किये, वे राजा उशीनरके वीर पुत्र सर्वत्र विख्यात हैं, गङ्गाजीके स्रोतमें जितने सिकताकण बहते हैं, उतनी ही अर्थात् असंख्य गौएँ उशीनरकुमारने अपने यज्ञमें ब्राह्मणोंको दी थीं ॥ ६४—६६ ॥
न पूर्वे नापरे चक्रुरिदं केचन मानवाः । इतीदं चुक्रुशुर्देवाः कृते कर्मणि दुष्करे ॥ ६७ ॥ राजा जब उस दुष्कर यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण कर चुके, तब सम्पूर्ण देवताओंने यह पुकार-पुकारकर कहा कि ‘ऐसा यज्ञ पहलेके और बादके भी मनुष्योंने कभी नहीं किया था’ ॥ ६७ ॥
पश्यामस्त्रिषु लोकेषु न तं संस्थास्नुचारिषु । जातं चापि जनिष्यन्तं द्वितीयं चापि साम्प्रतम् ॥ ६८ ॥ अन्यमौशीनराच्छैब्याद् धुरो वोढारमित्युत । गतिं यस्य न यास्यन्ति मानुषा लोकवासिनः ॥ ६९ ॥ स्थावर-जंगमरूप तीनों लोकोंमें एकमात्र उशीनरपौत्र शैब्यको छोड़कर दूसरे किसी ऐसे राजाको न तो हम इस समय उत्पन्न हुआ देखते हैं और न भविष्यमें किसीके उत्पन्न होनेका लक्षण ही देख पाते हैं, जो इस महान् भारको वहन करनेवाला हो। इस मर्त्यलोकके निवासी मनुष्य उनकी गतिको नहीं पा सकेंगे ॥ ६८-६९ ॥
तस्य नप्तारमायान्तं शैब्यं कः समवारयत् । द्रोणायाभिमुखं यत्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ७० ॥ उन्हीं उशीनरका पौत्र शैब्य सावधान हो जब द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था, उस समय मुँह फैलाये हुए कालके समान उस वीरको किसने रोका? ॥ ७० ॥
विराटस्य रथानीकं मत्स्यस्यामित्रघातिनः ।