महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अनाधृष्टिरदीनात्मा कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ५५ ॥ वृद्धक्षेमके पुत्र उदारचित्त अनाधृष्टिने युद्धस्थलमें कलिंगराजकी कन्याका अपहरण किया था। उन्हें द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५५ ।। भ्रातरः पञ्च कैकेया धार्मिकाः सत्यविक्रमाः । इन्द्रगोपकसंकाशा रक्तवर्मायुधध्वजाः ॥ ५६ ॥ मातृष्वसुः सुता वीराः पाण्डवानां जयार्थिनः । तान् द्रोणं हन्तुमायातान् के वीराः पर्यवारयन् ॥ ५७ ॥ केकय देशके सत्यपराक्रमी, धर्मात्मा पाँच वीर राजकुमार लाल रंगके कवच, आयुध और ध्वज धारण करनेवाले हैं तथा उनके शरीरकी कान्ति भी इन्द्रगोपके समान लाल रंगकी ही है; वे पाण्डवोंकी मौसीके बेटे हैं। वे जब पाण्डवोंकी विजयके लिये द्रोणाचार्यको मारनेके लिये उनपर चढ़ आये, उस समय किन वीरोंने उन्हें रोका था? ।। ५६-५७ ।। यं योधयन्तो राजानो नाजयन् वारणावते । षण्मासानपि संरब्धा जिघांसन्तो युधाम्पतिम् ॥ ५८ ॥ धनुष्मतां वरं शूरं सत्यसंधं महाबलम् । द्रोणात् कस्तं नरव्याघ्रं युयुत्सुं पर्यवारयत् ॥ ५९ ॥ वारणावत नगरमें सब राजालोग मार डालनेकी इच्छासे क्रोधमें भरकर छः महीनोंतक युद्ध करते रहनेपर भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ जिस वीरको परास्त न कर सके, धनुर्धरोंमें उत्तम, शौर्यसम्पन्न, सत्यप्रतिज्ञ, महाबली, उस पुरुषसिंह युयुत्सुको द्रोणाचार्यके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५८-५९ ।। यः पुत्रं काशिराजस्य वाराणस्यां महारथम् । समरे स्त्रीषु गृध्यन्तं भल्लेनापाहरद् रथात् ॥ ६० ॥ धृष्टद्युम्नं महेष्वासं पार्थानां मन्त्रधारिणम् । युक्तं दुर्योधनानर्थे सृष्टं द्रोणवधाय च ॥ ६१ ॥ निर्दहन्तं रणे योधान् दारयन्तं च सर्वतः । द्रोणाभिमुखमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ६२ ॥ जिसने काशीपुरीमें काशिराजके महारथी पुत्रको, जो स्त्रियोंके प्रति आसक्त था, समरभूमिमें भल्ल नामक बाणद्वारा रथसे मार गिराया; जो कुन्तीकुमारोंकी गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाला तथा दुर्योधनका अनर्थ करनेके लिये उद्यत रहनेवाला है तथा जिसकी उत्पत्ति द्रोणाचार्यके वधके लिये हुई है; वह महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न जब रणक्षेत्रमें योद्धाओंको अपने बाणोंकी अग्निसे जलाता और सब ओरसे सारी सेनाको विदीर्ण करता हुआ द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ।। ६०—६२ ।। उत्सङ्ग इव संवृद्धं द्रुपदस्यास्त्रवित्तमम् । शैखण्डिनं शस्त्रगुप्तं के च द्रोणादवारयन् ॥ ६३ ॥
जो द्रुपदकी गोदमें पला हुआ था और शस्त्रोंद्वारा सुरक्षित था, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उस शिखण्डीपुत्रको द्रोणाचार्यके पास आनेसे किन वीरोंने रोका? ॥ ६३ ॥
य इमां पृथिवीं कृत्स्नां चर्मवत् समवेष्टयत् । महता रथघोषेण मुख्यारिघ्नो महारथः ॥ ६४ ॥ दशाश्वमेधानाजह्रे स्वन्नपानाप्तदक्षिणान् । निरर्गलान् सर्वमेधान् पुत्रवत् पालयन् प्रजाः ॥ ६५ ॥ गङ्गास्रोतसि यावत्यः सिकता अप्यशेषतः । तावतीर्गा ददौ वीर उशीनरसुतोऽध्वरे ॥ ६६ ॥ जैसे चमड़ेको अंगोंमें लपेट लिया जाता है, उसी प्रकार जिन्होंने अपने रथके महान् घोषद्वारा इस सारी पृथिवीको व्याप्त कर लिया था, जो प्रधान-प्रधान शत्रुओंका वध करनेवाले और महारथी वीर थे, जिन्होंने प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते हुए सुन्दर अन्न, पान तथा प्रचुर दक्षिणासे युक्त एवं विघ्नरहित दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया और कितने ही सर्वमेध-यज्ञ सम्पन्न किये, वे राजा उशीनरके वीर पुत्र सर्वत्र विख्यात हैं, गङ्गाजीके स्रोतमें जितने सिकताकण बहते हैं, उतनी ही अर्थात् असंख्य गौएँ उशीनरकुमारने अपने यज्ञमें ब्राह्मणोंको दी थीं ॥ ६४—६६ ॥
न पूर्वे नापरे चक्रुरिदं केचन मानवाः । इतीदं चुक्रुशुर्देवाः कृते कर्मणि दुष्करे ॥ ६७ ॥ राजा जब उस दुष्कर यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण कर चुके, तब सम्पूर्ण देवताओंने यह पुकार-पुकारकर कहा कि ‘ऐसा यज्ञ पहलेके और बादके भी मनुष्योंने कभी नहीं किया था’ ॥ ६७ ॥
पश्यामस्त्रिषु लोकेषु न तं संस्थास्नुचारिषु । जातं चापि जनिष्यन्तं द्वितीयं चापि साम्प्रतम् ॥ ६८ ॥ अन्यमौशीनराच्छैब्याद् धुरो वोढारमित्युत । गतिं यस्य न यास्यन्ति मानुषा लोकवासिनः ॥ ६९ ॥ स्थावर-जंगमरूप तीनों लोकोंमें एकमात्र उशीनरपौत्र शैब्यको छोड़कर दूसरे किसी ऐसे राजाको न तो हम इस समय उत्पन्न हुआ देखते हैं और न भविष्यमें किसीके उत्पन्न होनेका लक्षण ही देख पाते हैं, जो इस महान् भारको वहन करनेवाला हो। इस मर्त्यलोकके निवासी मनुष्य उनकी गतिको नहीं पा सकेंगे ॥ ६८-६९ ॥
तस्य नप्तारमायान्तं शैब्यं कः समवारयत् । द्रोणायाभिमुखं यत्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ ७० ॥ उन्हीं उशीनरका पौत्र शैब्य सावधान हो जब द्रोणाचार्यके सम्मुख आ रहा था, उस समय मुँह फैलाये हुए कालके समान उस वीरको किसने रोका? ॥ ७० ॥
विराटस्य रथानीकं मत्स्यस्यामित्रघातिनः ।
प्रेप्सन्तं समरे द्रोणं के वीराः पर्यवारयन् ॥ ७१ ॥ शत्रुघाती मत्स्यराज विराटकी रथसेनाको, जो द्रोणाचार्यको नष्ट करनेकी इच्छासे खोजती हुई आ रही थी, किन वीरोंने रोका था? ॥ ७१ ॥ सद्यो वृकोदराज्जातो महाबलपराक्रमः । मायावी राक्षसो वीरो यस्मान्मम महत् भयम् ॥ ७२ ॥ पार्थानां जयकामं तं पुत्राणां मम कण्टकम् । घटोत्कचं महात्मानं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ७३ ॥ जो भीमसेनसे तत्काल प्रकट हुआ तथा जिससे मुझे महान् भय बना रहता है, वह महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न मायावी राक्षस वीर घटोत्कच कुन्तीकुमारोंकी विजय चाहता है और मेरे पुत्रोंके लिये कंटक बना हुआ है, उस महाकाय घटोत्कचको द्रोणाचार्यके पास आनेसे किसने रोका? ॥ ७२-७३ ॥ एते चान्ये च बहवो येषामर्थाय संजय । त्यक्तारः संयुगे प्राणान् किं तेषामजितं युधि ॥ ७४ ॥ संजय! ये तथा और भी बहुत-से वीर जिनके लिये युद्धमें प्राण त्याग करनेको तैयार हैं, उनके लिये कौन-सी ऐसी वस्तु होगी, जो जीती न जा सके ॥ ७४ ॥ येषां च पुरुषव्याघ्रः शार्ङ्गधन्वा व्यपाश्रयः । हितार्थी चापि पार्थानां कथं तेषां पराजयः ॥ ७५ ॥ शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले पुरुषसिंह भगवान् श्रीकृष्ण जिनके आश्रय तथा हित चाहनेवाले हैं, उन कुन्तीकुमारोंकी पराजय कैसे हो सकती है? ॥ ७५ ॥ लोकानां गुरुरत्यर्थं लोकनाथः सनातनः । नारायणो रणे नाथो दिव्यो दिव्यात्मकः प्रभुः ॥ ७६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के परम गुरु हैं, समस्त लोकोंके सनातन स्वामी हैं, संग्रामभूमिमें सबकी रक्षा करनेवाले दिव्य स्वरूप, सामर्थ्यशाली, दिव्य नारायण हैं ॥ ७६ ॥ यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः । तान्यहं कीर्तयिष्यामि भक्त्या स्थैर्यार्थमात्मनः ॥ ७७ ॥ मनीषी पुरुष जिनके दिव्य कर्मोंका वर्णन करते हैं, मैं उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका अपने मनकी स्थिरताके लिये भक्तिपूर्वक वर्णन करूँगा ॥ ७७ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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एकादशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका भगवान् श्रीकृष्णकी संक्षिप्त लीलाओंका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना
धृतराष्ट्र उवाच
शृणु दिव्यानि कर्माणि वासुदेवस्य संजय ।
कृतवान् यानि गोविन्दो यथा नान्यः पुमान् क्वचित् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके दिव्य कर्मोंका वर्णन सुनो। भगवान् गोविन्दने जो-जो कार्य किये हैं, वैसा दूसरा कोई पुरुष कदापि नहीं कर सकता ॥ १ ॥
संवर्धता गोपकुले बालेनैव महात्मना ।
विख्यापितं बलं बाह्वोस्त्रिषु लोकेषु संजय ॥ २ ॥
संजय! बाल्यावस्थामें ही जब कि वे गोपकुलमें पल रहे थे, महात्मा श्रीकृष्णने अपनी भुजाओंके बल और पराक्रमको तीनों लोकोंमें विख्यात कर दिया ॥ २ ॥
उच्चैःश्रवस्तुल्यबलं वायुवेगसमं जवे ।
जघान हयराजं तं यमुनावनवासिनम् ॥ ३ ॥
यमुनाके तटवर्ती वनमें उच्चैःश्रवाके समान बलशाली और वायुके समान वेगवान् अश्वराज केशी रहता था। उसे श्रीकृष्णने मार डाला ॥ ३ ॥
दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम् ।
वृषरूपधरं बाल्ये भुजाभ्यां निजघान ह ॥ ४ ॥
इसी प्रकार एक भयंकर कर्म करनेवाला दानव वहाँ बैलका रूप धारण करके रहता था, जो गौओंके लिये मृत्युके समान प्रकट हुआ था। उसे भी श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें अपने हाथोंसे ही मार डाला ॥ ४ ॥
प्रलम्बं नरकं जम्भं पीठं चापि महासुरम् ।
मुरं चान्तकसंकाशमवधीत् पुष्करेक्षणः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् कमलनयन श्रीकृष्णने प्रलम्ब, नरकासुर, जम्भासुर, पीठ नामक महान् असुर और यमराजसदृश मुरका भी संहार किया ॥ ५ ॥
तथा कंसो महातेजा जरासंधेन पालितः ।
विक्रमेणैव कृष्णेन सगणः पातितो रणे ॥ ६ ॥
इसी प्रकार श्रीकृष्णने पराक्रम करके ही जरासंधके द्वारा सुरक्षित महातेजस्वी कंसको उसके गणोंसहित रणभूमिमें मार गिराया ॥ ६ ॥
सुनामा रणविक्रान्तः समग्राक्षौहिणीपतिः । भोजराजस्य मध्यस्थो भ्राता कंसस्य वीर्यवान् ॥ ७ ॥ बलदेवद्वितीयेन कृष्णेनामित्रघातिना । तरस्वी समरे दग्धः ससैन्यः शूरसेनराट् ॥ ८ ॥ शत्रुहन्ता श्रीकृष्णने बलरामजीके साथ जाकर युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले, बलवान्, वेगवान्, सम्पूर्ण अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति, भोजराज कंसके मझले भाई शूरसेन देशके राजा सुनामाको समरमें सेनासहित दग्ध कर डाला ॥ दुर्वासा नाम विप्रर्षिस्तथा परमकोपनः । आराधितः सदारेण स चास्मै प्रददौ वरान् ॥ ९ ॥ पत्नीसहित श्रीकृष्णने परम क्रोधी ब्रह्मर्षि दुर्वासाकी आराधना की। अतः उन्होंने प्रसन्न होकर उन्हें बहुत-से वर दिये ॥ ९ ॥ तथा गान्धारराजस्य सुतां वीरः स्वयंवरे । निर्जित्य पृथिवीपामानावहत् पुष्करेक्षणः ॥ १० ॥ अमृष्यमाणा राजानो यस्य जात्या हया इव । रथे वैवाहिके युक्ताः प्रतोदेन कृतव्रणाः ॥ ११ ॥ कमलनयन वीर श्रीकृष्णने स्वयंवरमें गान्धारराजकी पुत्रीको प्राप्त करके समस्त राजाओंको जीतकर उसके साथ विवाह किया। उस समय अच्छी जातिके घोड़ोंकी भाँति श्रीकृष्णके वैवाहिक रथमें जुते हुए वे असहिष्णु राजालोग कोड़ोंकी मारसे घायल कर दिये गये थे ॥ १०-११ ॥ जरासंधं महाबाहुमुपायेन जनार्दनः । परेण घातयामास समग्राक्षौहिणीपतिम् ॥ १२ ॥ जनार्दन श्रीकृष्णने समस्त अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति महाबाहु जरासंधको उपायपूर्वक दूसरे योद्धा (भीमसेन)-के द्वारा मरवा दिया ॥ १२ ॥ चेदिराजं च विक्रान्तं राजसेनापतिं बली । अर्घ्ये विवदमानं च जघान पशुवत् तदा ॥ १३ ॥ बलवान् श्रीकृष्णने राजाओंकी सेनाके अधिपति पराक्रमी चेदिराज शिशुपालको अग्रपूजनके समय विवाद करनेके कारण पशुकी भाँति मार डाला ॥ १३ ॥ सौभं दैत्यपुरं खस्थं शाल्वगुप्तं दुरासदम् । समुद्रकुक्षौ विक्रम्य पातयामास माधवः ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् माधवने आकाशमें स्थित रहनेवाले सौभ नामक दुर्धर्ष दैत्य-नगरको, जो राजा शाल्वद्वारा सुरक्षित था, समुद्रके बीच पराक्रम करके मार गिराया ॥ अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश्च मागधान् काशिकोसलान् । वात्स्यगार्ग्यकरूषांश्च पौण्ड्रांश्चाप्यजयद् रणे ॥ १५ ॥
उन्होंने रणक्षेत्रमें अंग, वंग, कलिंग, मगध, काशि, कोसल, वत्स, गर्ग, करूष तथा पौण्ड्र आदि देशोंपर विजय पायी थी ॥ १५ ॥ आवन्त्यान् दाक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्च समुद्गलान् ॥ १६ ॥ काम्बोजान् वाटधानांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च संजय । त्रिगर्तान् मालवांश्चैव दरदांश्च सुदुर्जयान् ॥ १७ ॥ नानादिग्भ्यश्च सम्प्राप्तान् खशांश्चैव शकांस्तथा । जितवान् पुण्डरीकाक्षो यवनं च सहानुगम् ॥ १८ ॥ संजय! इसी प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने अवन्ती, दक्षिण प्रान्त, पर्वतीय देश, दशेरक, काश्मीर, औरसिक, पिशाच, मुद्गल, काम्बोज, वाटधान, चोल, पाण्ड्य, त्रिगर्त, मालव, अत्यन्त दुर्जय दरद आदि देशोंके योद्धाओंको तथा नाना दिशाओंसे आये हुए खशों, शकों और अनुयायियों-सहित कालयवनको भी जीत लिया ॥ १६—१८ ॥ प्रविश्य मकरावासं यादोगणनिषेवितम् । जिगाय वरुणं संख्ये सलिलान्तर्गतं पुरा ॥ १९ ॥ पूर्वकालमें श्रीकृष्णने जल-जन्तुओंसे भरे हुए समुद्रमें प्रवेश करके जलके भीतर निवास करनेवाले वरुण देवताको युद्धमें परास्त किया ॥ १९ ॥ युधि पञ्चजनं हत्वा दैत्यं पातालवासिनम् । पाञ्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शङ्खमवाप्तवान् ॥ २० ॥ इसी प्रकार हृषीकेशने पाताल-निवासी पंचजन नामक दैत्यको युद्धमें मारकर दिव्य पाञ्चजन्य शंख प्राप्त किया ॥ खाण्डवे पार्थसहितस्तोषयित्वा हुताशनम् । आग्नेयमस्त्रं दुर्धर्षं चक्रं लेभे महाबलः ॥ २१ ॥ खाण्डव वनमें अर्जुनके साथ अग्निदेवको संतुष्ट करके महाबली श्रीकृष्णने दुर्धर्ष आग्नेय अस्त्र चक्रको प्राप्त किया था ॥ २१ ॥ वैनतेयं समारुह्य त्रासयित्वामरावतीम् । महेन्द्रभवनाद् वीरः पारिजातमुपानयत् ॥ २२ ॥ वीर श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो अमरावती पुरीमें जाकर वहाँके निवासियोंको भयभीत करके महेन्द्रभवनसे पारिजात वृक्ष उठा ले आये ॥ २२ ॥ तच्च मर्षितवान् शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् । राज्ञां चाप्यजितं कञ्चित् कृष्णेनेह न शुश्रुम ॥ २३ ॥ उनके पराक्रमको इन्द्र अच्छी तरह जानते थे, इसलिये उन्होंने वह सब चुपचाप सह लिया। राजाओंमेंसे किसीको भी मैंने ऐसा नहीं सुना है, जिसे श्रीकृष्णने जीत न लिया हो ॥ २३ ॥
यच्च तन्महदाश्चर्यं सभायां मम संजय । कृतवान् पुण्डरीकाक्षः कस्तदन्य इहार्हति ॥ २४ ॥ संजय! उस दिन मेरी सभामें कमलनयन श्रीकृष्णने जो महान् आश्चर्य प्रकट किया था, उसे इस संसारमें उनके सिवा दूसरा कौन कर सकता है? ॥ २४ ॥
यच्च भक्त्या प्रसन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् । तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमम् ॥ २५ ॥ मैंने प्रसन्न होकर भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्णके उस ईश्वरीय रूपका जो दर्शन किया, वह सब मुझे आज भी अच्छी तरह स्मरण है। मैंने उन्हें प्रत्यक्षकी भाँति जान लिया था ॥ २५ ॥
नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य संजय ॥ २६ ॥ संजय! बुद्धि और पराक्रमसे युक्त भगवान् हृषीकेशके कर्मोंका अन्त नहीं जाना जा सकता ॥ २६ ॥
तथा गदश्च साम्बश्च प्रद्युम्नोऽथ विदूरथः । अगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णः ससारणः ॥ २७ ॥ उल्मुको निशठश्चैव झिल्ली बभ्रुश्च वीर्यवान् । पृथुश्च विपृथुश्चैव शमीकोऽथारिमेजयः ॥ २८ ॥ एतेऽन्ये बलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः । कथंचित् पाण्डवानीकं श्रयेयुः समरे स्थिताः ॥ २९ ॥ आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना । ततः संशयितं सर्वं भवेदिति मतिर्मम ॥ ३० ॥ यदि गद, साम्ब, प्रद्युम्न, विदूरथ, अगावह, अनिरुद्ध, चारुदेष्ण, सारण, उल्मुक, निशठ, झिल्ली, पराक्रमी बभ्रु, पृथु, विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय—ये तथा दूसरे भी बलवान् एवं प्रहारकुशल वृष्णिवंशी योद्धा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर महात्मा केशवके बुलानेपर पाण्डव-सेनामें आ जायँ और समरभूमिमें खड़े हो जायँ तो हमारा सारा उद्योग संशयमें पड़ जाय; ऐसा मेरा विश्वास है ॥
नागायुतबलो वीरः कैलासशिखरोपमः । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ॥ ३१ ॥ वनमाला और हल धारण करनेवाले वीर बलराम कैलास-शिखरके समान गौरवर्ण हैं। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे भी उसी पक्षमें रहेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण हैं ॥ ३१ ॥
यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातयः । अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय संजय ॥ ३२ ॥
संजय! जिन भगवान् वासुदेवको द्विजगण सबका पिता बताते हैं, क्या वे पाण्डवोंके लिये स्वयं युद्ध करेंगे? ।।
स यदा तात संनह्येत् पाण्डवार्थाय संजय ।
न तदा प्रतिसंयोद्धा भविता तत्र कश्चन ॥ ३३ ॥
तात! संजय! जब पाण्डवोंके लिये श्रीकृष्ण कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो जायँ, उस समय वहाँ कोई भी योद्धा उनका सामना करनेको तैयार न होगा ।। ३३ ।।
यदि स्म कुरवः सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान् ।
वार्ष्णेयोऽर्थाय तेषां वै गृह्णीयाच्छस्त्रमुत्तमम् ॥ ३४ ॥
यदि सब कौरव पाण्डवोंको जीत लें तो वृष्णिवंशभूषण भगवान् श्रीकृष्ण उनके हितके लिये अवश्य उत्तम शस्त्र ग्रहण कर लेंगे ।। ३४ ।।
ततः सर्वान् नरव्याघ्रो हत्वा नरपतीन् रणे ।
कौरवांश्च महाबाहुः कुन्त्यै दद्यात् स मेदिनीम् ॥ ३५ ॥
उस दशामें पुरुषसिंह महाबाहु श्रीकृष्ण सब राजाओं तथा कौरवोंको रणभूमिमें मारकर सारी पृथ्वी कुन्तीको दे देंगे ।। ३५ ।।
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजयः ।
रथस्य तस्य कः संख्ये प्रत्यनीको भवेद् रथः ॥ ३६ ॥
जिसके सारथि सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता श्रीकृष्ण तथा योद्धा अर्जुन हैं, रणभूमिमें उस रथका सामना करनेवाला दूसरा कौन रथ होगा? ।। ३६ ।।
न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जयः ।
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ॥ ३७ ॥
किसी भी उपायसे कौरवोंकी जय होती नहीं दिखायी देती। इसलिये तुम मुझसे सब समाचार कहो। वह युद्ध किस प्रकार हुआ? ।। ३७ ।।
अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः ।
अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ॥ ३८ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं और श्रीकृष्ण किरीटधारी अर्जुनके आत्मा हैं। अर्जुनमें विजय नित्य विद्यमान है और श्रीकृष्णमें कीर्तिका सनातन निवास है ।। ३८ ।।
सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजितः ।
प्राधान्येनैव भूयिष्ठममेयाः केशवे गुणाः ॥ ३९ ॥
अर्जुन सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कहीं भी पराजित नहीं हुए हैं। श्रीकृष्णमें असंख्य गुण हैं। यहाँ प्रायः प्रधान गुणके नाम लिये गये हैं ।। ३९ ।।
मोहाद् दुर्योधनः कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम् ।
मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृतः ॥ ४० ॥
दुर्योधन मोहवश सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् केशवको नहीं जानता है, वह दैवयोगसे मोहित हो मौतके फंदेमें फँस गया ॥ ४० ॥ न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् । पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ॥ ४१ ॥ यह दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनको नहीं जानता है, वे दोनों पूर्वदेवता महात्मा नर और नारायण हैं ॥ एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसाऽपि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ ॥ ४२ ॥ नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छतः । उनकी आत्मा तो एक है; परंतु इस भूतलके मनुष्योंको वे शरीरसे दो होकर दिखायी देते हैं। उन्हें मनसे भी पराजित नहीं किया जा सकता। वे यशस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन यदि इच्छा करें तो मेरी सेनाको तत्काल नष्ट कर सकते हैं; परंतु मानवभावका अनुसरण करनेके कारण ये वैसी इच्छा नहीं करते हैं ॥ ४२ १/२ ॥ युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् ॥ ४३ ॥ भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मनः । तात! भीष्म तथा महात्मा द्रोणका वध युगके उलट जानेकी-सी बात है। सम्पूर्ण लोकोंको यह घटना मानो मोहमें डालनेवाली है ॥ ४३ १/२ ॥ न ह्येव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च ॥ ४४ ॥ न क्रियाभिर्न चास्त्रेण मृत्योः कश्चिन्निवार्यते । जान पड़ता है, कोई भी न तो ब्रह्मचर्यके पालनसे, न वेदोंके स्वाध्यायसे, न कर्मोंके अनुष्ठानसे और न अस्त्रोंके प्रयोगसे ही अपनेको मृत्युसे बचा सकता है ॥ ४४ १/२ ॥ लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ॥ ४५ ॥ भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा किं नु जीवामि संजय । संजय! लोकसम्मानित, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा युद्धदुर्मद वीरवर भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ ४५ १/२ ॥ यां तां श्रियमसूयामः पुरा दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ॥ ४६ ॥ अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिरके पास जिस प्रसिद्ध राजलक्ष्मीको देखकर हमलोग उनसे डाह करने लगे थे, आज भीष्म और द्रोणाचार्यके वधसे हम उसके कटु फलका अनुभव कर रहे हैं ॥ ४६ १/२ ॥ मत्कृते चाप्यनुप्राप्तः कुरूणामेष संक्षयः ॥ ४७ ॥ पक्वानां हि वधे सूत वज्रायन्ते तृणान्युत ।
सूत! मेरे ही कारण यह कौरवोंका विनाश प्राप्त हुआ है। जो कालसे परिपक्व हो गये हैं, उनके वधके लिये तिनके भी वज्रका काम करते हैं ॥ ४७१/२ ॥
अनन्तमिदमैश्वर्यं लोके प्राप्तो युधिष्ठिरः ॥ ४८ ॥
यस्य कोपान्महात्मानौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ ।
युधिष्ठिर इस संसारमें अनन्त ऐश्वर्यके भागी हुए हैं। जिनके कोपसे महात्मा भीष्म और द्रोण मार गिराये गये ॥
प्राप्तः प्रकृतितो धर्मो न धर्मो मामकान् प्रति ॥ ४९ ॥
क्रूरः सर्वविनाशाय कालोऽसौ नातिवर्तते ।
युधिष्ठिरको धर्मका स्वाभाविक फल प्राप्त हुआ है, किंतु मेरे पुत्रोंको उसका फल नहीं मिल रहा है। सबका विनाश करनेके लिये प्राप्त हुआ यह क्रूर काल बीत नहीं रहा है ॥
अन्यथा चिन्तिता ह्यर्था नरैस्तात मनस्विभिः ॥ ५० ॥
अन्यथैव प्रपद्यन्ते दैवादिति मतिर्मम ।
तात! मनस्वी पुरुषोंद्वारा अन्य प्रकारसे सोचे हुए कार्य भी दैवयोगसे कुछ और ही प्रकारके हो जाते हैं; ऐसा मेरा अनुभव है ॥ ५०१/२ ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे सम्प्राप्ते कृच्छ्र उत्तमे ।
अपारणीये दुश्चिन्त्ये यथाभूतं प्रचक्ष्व मे ॥ ५१ ॥
अतः इस अनिवार्य, अपार, दुश्चिन्त्य एवं महान् संकटके प्राप्त होनेपर जो घटना जिस प्रकार हुई हो, वह मुझे बताओ ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
द्वादशोऽध्यायः
दुर्योधनका वर माँगना और द्रोणाचार्यका युधिष्ठिरको अर्जुनकी अनुपस्थितिमें जीवित पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा करना
संजय उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ।
यथा स न्यपतद् द्रोणः सूदितः पाण्डुसृञ्जयैः ॥ १ ॥
संजयने कहा—महाराज! मैं बड़े दुःखके साथ आपसे उन सब घटनाओंका वर्णन करूँगा। द्रोणाचार्य किस प्रकार गिरे हैं और पाण्डवों तथा सृञ्जयोंने कैसे उनका वध किया है? इन सब बातोंको मैंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ १ ॥
सेनापतित्वं सम्प्राप्य भारद्वाजो महारथः ।
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य पुत्रं ते वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
सेनापतिका पद प्राप्त करके महारथी द्रोणाचार्यने सारी सेनाके बीचमें आपके पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
यत् कौरवाणामृषभादापगेयादनन्तरम् ।
सैनापत्येन यद् राजन् मामद्य कृतवानसि ॥ ३ ॥
सदृशं कर्मणस्तस्य फलं प्राप्नुहि भारत ।
करोमि कामं कं तेऽद्य प्रवृणीष्व यमिच्छसि ॥ ४ ॥
‘राजन्! तुमने कौरवश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मके बाद जो आज मुझे सेनापति बनाया है, भरतनन्दन! इस कार्यके अनुरूप कोई फल मुझसे प्राप्त करो। आज तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? तुम्हें जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे ही माँग लो’ ॥ ३-४ ॥
ततो दुर्योधनो राजा कर्णदुःशासनादिभिः ।
सम्मन्त्र्योवाच दुर्धर्षमाचार्यं जयतां वरम् ॥ ५ ॥
तब राजा दुर्योधनने कर्ण, दुःशासन आदिके साथ सलाह करके विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं दुर्जय आचार्य द्रोणसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
ददासि चेद् वरं मह्यं जीवग्राहं युधिष्ठिरम् ।
गृहीत्वा रथिनां श्रेष्ठं मत्समीपमिहानय ॥ ६ ॥
‘आचार्य! यदि आप मुझे वर दे रहे हैं तो रथियोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको जीवित पकड़कर यहाँ मेरे पास ले आइये’ ॥ ६ ॥
ततः कुरूणामाचार्यः श्रुत्वा पुत्रस्य ते वचः ।
सेनां प्रहर्षयन् सर्वामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥
आपके पुत्रकी वह बात सुनकर कुरुकुलके आचार्य द्रोण सारी सेनाको प्रसन्न करते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
धन्यः कुन्तीसुतो राजन् यस्य ग्रहणमिच्छसि ।
न वधार्थं सुदुर्धर्षं वरमद्य प्रयाचसे ॥ ८ ॥
‘राजन्! कुन्तीकुमार युधिष्ठिर धन्य हैं, जिन्हें तुम जीवित पकड़ना चाहते हो। उन दुर्धर्ष वीरके वधके लिये आज तुम मुझसे याचना नहीं कर रहे हो ॥ ८ ॥
किमर्थं च नरव्याघ्र न वधं तस्य काङ्क्षसे ।
नाशंससि क्रियामेतां मत्तो दुर्योधन ध्रुवम् ॥ ९ ॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हें उनके वधकी इच्छा क्यों नहीं हो रही है? दुर्योधन! तुम मेरे द्वारा निश्चितरूपसे युधिष्ठिरका वध कराना क्यों नहीं चाहते हो? ॥ ९ ॥
आहोस्विद् धर्मराजस्य द्वेष्टा तस्य न विद्यते ।
यदीच्छसि त्वं जीवन्तं कुलं रक्षसि चात्मनः ॥ १० ॥
‘अथवा इसका कारण यह तो नहीं है कि धर्मराज युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला इस संसारमें कोई है ही नहीं। इसीलिये तुम उन्हें जीवित देखना और अपने कुलकी रक्षा करना चाहते हो ॥ १० ॥
अथवा भरतश्रेष्ठ निर्जित्य युधि पाण्डवान् ।
राज्यं सम्प्रति दत्त्वा च सौभ्रात्रं कर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥
‘अथवा भरतश्रेष्ठ! तुम युद्धमें पाण्डवोंको जीतकर इस समय उनका राज्य वापस दे सुन्दर भ्रातृभावका आदर्श उपस्थित करना चाहते हो ॥ ११ ॥
धन्यः कुन्तीसुतो राजा सुजातं चास्य धीमतः ।
अजातशत्रुता सत्या तस्य यत् स्निह्यते भवान् ॥ १२ ॥
‘कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर धन्य हैं। उन बुद्धिमान् नरेशका जन्म बहुत ही उत्तम है और वे जो अजातशत्रु कहलाते हैं, वह भी ठीक है; क्योंकि तुम भी उनपर स्नेह रखते हो' ॥ १२ ॥
द्रोणेन चैवमुक्तस्य तव पुत्रस्य भारत ।
सहसा निःसृतो भावो योऽस्य नित्यं हृदि स्थितः ॥ १३ ॥
भारत! द्रोणाचार्यके ऐसा कहनेपर तुम्हारे पुत्रके मनका भाव जो सदा उसके हृदयमें बना रहता था, सहसा प्रकट हो गया ॥ १३ ॥
नाकारो गूहितुं शक्यो बृहस्पतिसमैरपि ।
तस्मात्तव सुतो राजन् प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥
बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् पुरुष भी अपने आकारको छिपा नहीं सकते। राजन्! इसीलिये आपका पुत्र अत्यन्त प्रसन्न होकर इस प्रकार बोला— ॥ १४ ॥
वधे कुन्तिसुतस्याजौ नाचार्य विजयो मम । हते युधिष्ठिरे पार्था हन्युः सर्वान् हि नो ध्रुवम् ॥ १५ ॥ ‘आचार्य! युद्धके मैदानमें कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके मारे जानेसे मेरी विजय नहीं हो सकती; क्योंकि युधिष्ठिरका वध होनेपर कुन्तीके पुत्र हम सब लोगोंको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १५ ॥
न च शक्या रणे सर्वे निहन्तुममरैरपि । (यदि सर्वे हनिष्यन्ते पाण्डवाः ससुता मृधे । ततः कृत्स्नं वशे कृत्वा निःशेषं नृपमण्डलम् ॥ ससागरवनां स्फीतां विजित्य वसुधामिमाम् । विष्णुर्दास्यति कृष्णायै कुन्त्यै वा पुरुषोत्तमः ॥) य एव तेषां शेषः स्यात् स एवास्मान् न शेषयेत् ॥ १६ ॥ ‘सम्पूर्ण देवता भी समस्त पाण्डवोंको रणक्षेत्रमें नहीं मार सकते। यदि सारे पाण्डव अपने पुत्रोंसहित युद्धमें मार डाले जायँगे तो भी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण नरेशमण्डलको अपने वशमें करके समुद्र और वनोंसहित इस सारी समृद्धिशालिनी वसुधाको जीतकर द्रौपदी अथवा कुन्तीको दे डालेंगे। अथवा पाण्डवोंमेंसे जो भी शेष रह जायगा, वही हमलोगोंको शेष नहीं रहने देगा ॥ १६ ॥
सत्यप्रतिज्ञे त्वानीते पुनर्धूतेन निर्जिते । पुनर्यास्यन्त्यरण्याय पाण्डवास्तमनुव्रताः ॥ १७ ॥ ‘सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरको जीते-जी पकड़ ले आनेपर यदि उन्हें पुनः जूएमें जीत लिया जाय तो उनमें भक्ति रखनेवाले पाण्डव पुनः वनमें चले जायँगे ॥ १७ ॥
सोऽयं मम जयो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति । अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ॥ १८ ॥ ‘इस प्रकार निश्चय ही मेरी विजय दीर्घकालतक बनी रहेगी। इसीलिये मैं कभी धर्मराज युधिष्ठिरका वध करना नहीं चाहता’ ॥ १८ ॥
तस्य जिह्ममभिप्रायं ज्ञात्वा द्रोणोऽथ तत्त्ववित् । तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥ १९ ॥ राजन्! द्रोणाचार्य प्रत्येक बातके वास्तविक तात्पर्यको तत्काल समझ लेनेवाले थे। दुर्योधनके उस कुटिल मनोभावको जानकर बुद्धिमान् द्रोणने मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तर रखकर उसे वर दिया ॥ १९ ॥
द्रोण उवाच न चेद् युधिष्ठिरं वीरः पालयत्यर्जुनो युधि । मन्यस्व पाण्डवश्रेष्ठमानीतं वशमात्मनः ॥ २० ॥
द्रोणाचार्य बोले— राजन्! यदि वीरवर अर्जुन युद्धमें युधिष्ठिरकी रक्षा न करते हों, तब तुम पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको अपने वशमें आया हुआ ही समझो॥ २०॥
न हि शक्यो रणे पार्थः सेन्द्रैर्देवासुरैरपि।
प्रत्युद्द्यातुमदस्तत्तात नैतदामर्षयाम्यहम्॥ २१॥
तात! रणक्षेत्रमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी अर्जुनका सामना नहीं कर सकते हैं। अतः मुझमें भी उन्हें जीतनेका उत्साह नहीं है॥ २१॥
असंशयं स मे शिष्यो मत्पूर्वश्वास्त्रकर्मणि।
तरुणः सुकृतैर्युक्त एकायनगतश्च ह॥ २२॥
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च भूयः स समवाप्तवान्।
अमर्षितश्च ते राजंस्ततो नामर्षयाम्यहम्॥ २३॥
इसमें संदेह नहीं कि अर्जुन मेरा शिष्य है और उसने पहले मुझसे ही अस्त्रविद्या सीखी है, तथापि वह तरुण है। अनेक प्रकारके पुण्य कर्मोंसे युक्त है। विजय अथवा मृत्यु—इन दोनोंमेंसे एकका वरण करनेका दृढ़ निश्चय कर चुका है। इन्द्र और रुद्र आदि देवताओंसे पुनः बहुत-से दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा पा चुका है और तुम्हारे प्रति उसका अमर्ष बढ़ा हुआ है। इसलिये राजन्! मैं अर्जुनसे लड़नेका उत्साह नहीं रखता हूँ॥ २२-२३॥
स चापक्रम्यतां युद्धाद् येनोपायेन शक्यते।
अपनीते ततः पार्थे धर्मराजो जितस्त्वया॥ २४॥
अतः जिस उपायसे भी सम्भव हो, तुम उन्हें युद्धसे दूर हटा दो। कुन्तीकुमार अर्जुनके रणक्षेत्रसे हट जानेपर समझ लो कि तुमने धर्मराजको जीत लिया॥ २४॥
ग्रहणे हि जयस्तस्य न वधे पुरुषर्षभ।
एतेन चाप्युपायेन ग्रहणं समुपैष्यसि॥ २५॥
नरश्रेष्ठ! उनको पकड़ लेनेमें ही तुम्हारी विजय है, उनके वधमें नहीं; परंतु इसी उपायसे तुम उन्हें पकड़ पाओगे॥ २५॥
अहं गृहीत्वा राजानं सत्यधर्मपरायणम्।
आनयिष्यामि ते राजन् वशमद्य न संशयः॥ २६॥
यदि स्थास्यति संग्रामे मुहूर्तमपि मेऽग्रतः।
अपनीते नरव्याघ्रे कुन्तीपुत्रे धनंजये॥ २७॥
राजन्! पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र अर्जुनके युद्धसे हट जानेपर यदि वे दो घड़ी भी मेरे सामने संग्राममें खड़े रहेंगे तो मैं आज सत्यधर्मपरायण राजा युधिष्ठिरको पकड़कर तुम्हारे वशमें ला दूँगा, इसमें संशय नहीं है॥
फाल्गुनस्य समीपे तु न हि शक्यो युधिष्ठिरः।
ग्रहीतुं समरे राजन् सेन्द्रैरपि सुरासुरैः॥ २८॥
राजन्! अर्जुनके समीप तो समरभूमिमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता और असुर भी युधिष्ठिरको नहीं पकड़ सकते हैं॥ २८॥
संजय उवाच
सान्तरं तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे।
गृहीतं तममन्यन्त तव पुत्राः सुबालिशाः॥ २९॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर जब राजा युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके मूर्ख पुत्र उन्हें कैद हुआ ही मानने लगे॥ २९॥
पाण्डवेयेषु सापेक्षं द्रोणं जानाति ते सुतः।
ततः प्रतिज्ञास्थैर्यार्थं स मन्त्रो बहुलीकृतः॥ ३०॥
आपका पुत्र दुर्योधन यह जानता था कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके प्रति पक्षपात रखते हैं, अतः उसने उनकी प्रतिज्ञाको स्थिर रखनेके लिये उस गुप्त बातको भी बहुत लोगोंमें फैला दिया॥ ३०॥
ततो दुर्योधनेनापि ग्रहणं पाण्डवस्य तत्।
(स्कन्धावारेषु सर्वेषु यथास्थानेषु मारिष।)
सैन्यस्थानेषु सर्वेषु सुघोषितमरिंदम॥ ३१॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले आर्य धृतराष्ट्र! तदनन्तर दुर्योधनने युद्धकी सारी छावनियोंमें तथा सेनाके विश्राम करनेके प्रायः सभी स्थानोंपर द्रोणाचार्यकी युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी उस प्रतिज्ञाको घोषित करवा दिया॥ ३१॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणप्रतिज्ञायां द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणप्रतिज्ञाविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं।)
त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम
संजय उवाच
सान्तरे तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे ।
ततस्ते सैनिकाः श्रुत्वा तं युधिष्ठिरनिग्रहम् ॥ १ ॥
सिंहनादरवांश्चक्रुर्बाहुशब्दांश्च कृत्स्नशः ।
तच्च सर्वं यथान्यायं धर्मराजेन भारत ॥ २ ॥
आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! जब द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर राजा युधिष्ठिरको कैद करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके सैनिकोंने युधिष्ठिरके पकड़े जानेका उद्योग सुनकर जोर-जोरसे सिंहनाद करना और भुजाओंपर ताल ठोंकना आरम्भ किया। भरतनन्दन! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्र ही अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यथायोग्य सारी बातें पूर्णरूपसे जान लीं कि द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं ।। १-२ १/२ ।।
ततः सर्वान् समानाय्य भ्रातॄनन्यांश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अब्रवीद् धर्मराजस्तु धनंजयमिदं वचः ।
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र द्रोणस्याद्य चिकीर्षितम् ॥ ४ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको और दूसरे राजाओंको सब ओरसे बुलवाकर धनंजय अर्जुनसे कहा—‘पुरुषसिंह! आज द्रोण क्या करना चाहते हैं, यह तुमने सुना ही होगा? ।। ३-४ ।।
यथा तन्न भवेत् सत्यं तथा नीतिर्विधीयताम् ।
सान्तरं हि प्रतिज्ञातं द्रोणेनामित्रकर्षिणा ॥ ५ ॥
‘अतः तुम ऐसी नीति बताओ, जिससे उनकी इच्छा सफल न हो। शत्रुसूदन द्रोणने कुछ अन्तर रखकर प्रतिज्ञा की है ।। ५ ।।
तच्चान्तरं महेष्वास त्वयि तेन समाहितम् ।
स त्वमद्य महाबाहो युध्यस्व मदनन्तरम् ॥ ६ ॥
यथा दुर्योधनः कामं नेमं द्रोणादवाप्नुयात् ।
‘महाधनुर्धर अर्जुन! वह अन्तर उन्होंने तुम्हींपर डाल रखा है। अतः महाबाहो! आज तुम मेरे समीप रहकर ही युद्ध करो, जिससे दुर्योधन द्रोणाचार्यसे अपने इस मनोरथको पूर्ण न करा सके’ ।। ६ १/२ ।।
अर्जुन उवाच
यथा मे न वधः कार्य आचार्यस्य कदाचन ॥ ७ ॥ तथा तव परित्यागो न मे राजंश्चिकीर्षितः । **अर्जुन बोले—**राजन्! जिस प्रकार मेरे लिये आचार्यका कभी वध न करना कर्तव्य है, उसी प्रकार किसी भी दशामें आपका परित्याग करना मुझे अभीष्ट नहीं है ॥
अप्येवं पाण्डव प्राणानुत्सृजेयमहं युधि ॥ ८ ॥ प्रतीपो नाहमाचार्ये भवेयं वै कथंचन । पाण्डुनन्दन! इस नीतिके अनुसार बर्ताव करते हुए मैं युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा; परंतु किसी प्रकार भी आचार्यका शत्रु नहीं बनूँगा ॥ ८ १/२ ॥
त्वां निगृह्याहवे राज्यं धार्तराष्ट्रोऽयमिच्छति ॥ ९ ॥ न स तं जीवलोकेऽस्मिन् कामं प्राप्स्येत् कथंचन । महाराज! यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जो आपको युद्धमें कैद करके सारा राज्य हथिया लेना चाहता है, वह इस जगत्में अपने उस मनोरथको किसी प्रकार पूर्ण नहीं कर सकता ॥ ९ १/२ ॥
प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १० ॥ न त्वां द्रोणो निगृह्णीयाज्जीवमाने मयि ध्रुवम् । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े और पृथ्वीके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, तो भी मेरे जीते-जी द्रोणाचार्य आपको पकड़ नहीं सकते; यह ध्रुव सत्य है ॥ १० १/२ ॥
यदि तस्य रणे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ११ ॥ विष्णुर्वा सहितो देवैर्न त्वां प्राप्स्यत्यसौ मृधे । मयि जीवति राजेन्द्र न भयं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ द्रोणादस्त्रभृतां श्रेष्ठात् सर्वशस्त्रभृतामपि । राजेन्द्र! यदि रणक्षेत्रमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र अथवा भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर दुर्योधनकी सहायता करें, तो भी मेरे जीते-जी वह आपको पकड़ नहीं सकेगा; अतः आपको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे भय नहीं करना चाहिये ॥ ११-१२ १/२ ॥
अन्यच्च ब्रूयां राजेन्द्र प्रतिज्ञां मम निश्चलाम् ॥ १३ ॥ न स्मराम्यनृतं तावन्न स्मरामि पराजयम् । न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किंचिदप्यनृतं कृतम् ॥ १४ ॥ महाराज! मैं अपनी दूसरी भी निश्चल प्रतिज्ञा आपको सुनाता हूँ। मैंने कभी झूठ कहा हो, इसका स्मरण नहीं है। मेरी कहीं पराजय हुई हो, इसकी भी याद नहीं है और मैंने
प्रतिज्ञा करके उसे तनिक भी झूठी कर दिया हो, इसका भी मुझे स्मरण नहीं है॥ १३-१४॥
संजय उवाच
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
प्रावाद्यन्त महाराज पाण्डवानां निवेशने ॥ १५ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् ।
धनुर्ज्यातालशब्दश्च गगनस्पृक् सुभैरवः ॥ १६ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर पाण्डवोंके शिविरमें शंख, भेरी, मृदंग और आनक आदि बाजे बजने लगे। महात्मा पाण्डवोंका सिंहनाद सहसा प्रकट हुआ। धनुषकी टंकारका भयंकर शब्द आकाशमें गूँजने लगा ॥ १५-१६ ॥
श्रुत्वा शङ्खस्य निर्घोषं पाण्डवस्य महौजसः ।
त्वदीयेष्वप्यनीकेषु वादित्राण्यभिजघ्निरे ॥ १७ ॥
महातेजस्वी पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनामें वह शंखध्वनि सुनकर आपकी सेनाओंमें भी भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे ॥ १७ ॥
ततो व्यूढान्यनीकानि तव तेषां च भारत ।
शनैरुपेयुरन्योन्यं योध्यमानानि संयुगे ॥ १८ ॥
भारत! तदनन्तर आपकी और उनकी भी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर धीरे-धीरे युद्धके लिये एक-दूसरीके समीप आने लगीं ॥ १८ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
पाण्डवानां कुरूणां च द्रोणपाञ्चाल्ययोरपि ॥ १९ ॥
तदनन्तर कौरवों तथा पाण्डवोंमें और द्रोणाचार्य तथा धृष्टद्युम्नमें रोमांचकारी भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १९ ॥
यत्नमानाः प्रयत्नेन द्रोणानीकविशातने ।
न शेकुः सृञ्जया युद्धे तद्धि द्रोणेन पालितम् ॥ २० ॥
सृंजय योद्धा उस युद्धमें द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश करनेके लिये बड़े यत्नके साथ चेष्टा करने लगे, परंतु सफल न हो सके; क्योंकि वह सेना आचार्य द्रोणके द्वारा भली-भाँति सुरक्षित थी ॥ २० ॥
तथैव तव पुत्रस्य रथोदाराः प्रहारिणः ।
न शेकुः पाण्डवीं सेनां पाल्यमानां किरीटिना ॥ २१ ॥
इसी प्रकार आपके पुत्रकी सेनाके उदार महारथी, जो प्रहार करनेमें कुशल थे, पाण्डव-सेनाको परास्त न कर सके; क्योंकि किरीटधारी अर्जुन उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ २१ ॥
आस्तां ते स्तिमिते सेने रक्ष्यमाणे परस्परम् ।
सम्प्रसुप्ते यथा नक्तं वनराज्यौ सुपुष्पिते ॥ २२ ॥
जैसे रातमें सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित दो वनश्रेणियाँ प्रसुप्त (सिकुड़े हुए पत्तोंसे युक्त) देखी जाती हैं, उसी प्रकार वे सुरक्षित हुई दोनों सेनाएँ आमने-सामने निश्चलभावसे खड़ी थीं ॥ २२ ॥
ततो रुक्मरथो राजन्नर्केणेव विराजता ।
वरूथिना विनिष्पत्य व्यचरत् पृतनामुखे ॥ २३ ॥
राजन्! तदनन्तर सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य सूर्यके समान प्रकाशमान आवरणयुक्त रथके द्वारा आगे बढ़कर सेनाके प्रमुख भागमें विचरने लगे ॥ २३ ॥
तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।
अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे पाण्डुसृञ्जयाः ॥ २४ ॥
द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें केवल रथके द्वारा उद्यत होकर अकेले ही शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग कर रहे थे। उस समय पाण्डव तथा सृंजय भयके मारे उन्हें अनेक-सा मान रहे थे ॥ २४ ॥
तेन मुक्ताः शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम् ।
त्रासयन्तो महाराज पाण्डवेयस्य वाहिनीम् ॥ २५ ॥
महाराज! उनके द्वारा छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनाको भयभीत करते हुए चारों ओर विचर रहे थे ॥ २५ ॥
मध्यंदिनमनुप्राप्तो गभस्तिशतसंवृतः ।
यथा दृश्येत धर्मांशुस्तथा द्रोणोऽप्यदृश्यत ॥ २६ ॥
दोपहरके समय सहस्रों किरणोंसे व्याप्त प्रचण्ड तेजवाले भगवान् सूर्य जैसे दिखायी देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥
न चैनं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति भारत ।
वीक्षितुं समरे क्रुद्धं महेन्द्रमिव दानवाः ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! जैसे दानवदल क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रकी ओर देखनेका साहस नहीं करता है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका कोई भी वीर समरभूमिमें द्रोणाचार्यकी ओर आँख उठाकर देख न सका ॥ २७ ॥
मोहयित्वा ततः सैन्यं भारद्वाजः प्रतापवान् ।
धृष्टद्युम्नबलं तूर्णं व्यधमन्निशितैः शरैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार प्रतापी द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनाको मोहित करके पैने बाणोंद्वारा तुरंत ही धृष्टद्युम्नकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २८ ॥
स दिशः सर्वतो रुद्ध्वा संवृत्य खमजिह्मगैः ।
पार्षतो यत्र तत्रैव ममृदे पाण्डुवाहिनीम् ॥ २९ ॥