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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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अष्टमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यके पराक्रम और वधका संक्षिप्त समाचार

संजय उवाच

तथा द्रोणमभिघ्नन्तं साश्वसूतरथद्विपान् ।
व्यथिताः पाण्डवा दृष्ट्वा न चैनं पर्यवारयन् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! द्रोणाचार्यको इस प्रकार घोड़े, सारथि, रथ और हाथियोंका संहार करते देखकर भी व्यथित हुए पाण्डव-सैनिक उन्हें रोक न सके ॥ १ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नधनंजयौ ।
अब्रवीत् सर्वतो यत्तैः कुम्भयोनिर्निवार्यताम् ॥ २ ॥
तब राजा युधिष्ठिरने धृष्टद्युम्न और अर्जुनसे कहा—‘वीरो! मेरे सैनिकोंको सब ओरसे प्रयत्नशील होकर द्रोणाचार्यको रोकना चाहिये’ ॥ २ ॥

तत्रैनमर्जुनश्चैव पार्षतश्च सहानुगः ।
प्रत्यगृह्णात् ततः सर्वे समापेतुर्महारथाः ॥ ३ ॥
यह सुनकर वहाँ अर्जुन और सेवकोंसहित धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यको रोका। फिर तो सभी महारथी उनपर टूट पड़े ॥

केकया भीमसेनश्च सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ।
युधिष्ठिरो यमौ मत्स्या द्रुपदस्यात्मजास्तथा ॥ ४ ॥
द्रौपदेयाश्च संहृष्टा धृष्टकेतुः ससात्यकिः ।
चेकितानश्च संक्रुद्धो युयुत्सुश्च महारथः ॥ ५ ॥
ये चान्ये पार्थिवा राजन् पाण्डवस्यानुयायिनः ।
कुलवीर्यानुरूपाणि चक्रुः कर्माण्यनेकशः ॥ ६ ॥
राजन्! केकयराजकुमार, भीमसेन, अभिमन्यु, घटोत्कच, युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव, मत्स्यदेशीय सैनिक, द्रुपदके सभी पुत्र, हर्ष और उत्साहमें भरे हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टकेतु, सात्यकि, कुपित चेकितान और महारथी युयुत्सु—ये तथा और भी जो भूमिपाल पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अनुयायी थे, वे सब अपने कुल और पराक्रमके अनुकूल अनेक प्रकारके वीरोचित कार्य करने लगे ॥ ४—६ ॥

संरक्ष्यमाणां तां दृष्ट्वा पाण्डवैर्वाहिनीं रणे ।
व्यावृत्य चक्षुषी कोपाद् भारद्वाजोऽन्ववैक्षत ॥ ७ ॥
उस रणक्षेत्रमें पाण्डवोंद्वारा सुरक्षित हुई उनकी सेनाकी ओर द्रोणाचार्यने क्रोधपूर्वक आँखें फाड़-फाड़कर देखा ॥ ७ ॥

स तीव्रं कोपमास्थाय रथे समरदुर्जयः ।

व्यधमत् पाण्डवानीकमभ्राणीव सदागतिः ॥ ८ ॥
जैसे वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार रथपर बैठे हुए रणदुर्जय वीर द्रोणाचार्य प्रचण्ड कोप धारण करके पाण्डव-सेनाका संहार करने लगे ॥ ८ ॥

रथानश्वान् नरान् नागानभिधावन्नितस्ततः ।
चचारोन्मत्तवद् द्रोणो वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥ ९ ॥
वे बूढ़े होकर भी जवानके समान फुर्तीले थे। द्रोणाचार्य उन्मत्तकी भाँति युद्धस्थलमें इधर-उधर चारों ओर विचरते और रथों, घोड़ों, पैदल मनुष्यों तथा हाथियोंपर धावा करते थे ॥ ९ ॥

तस्य शोणितदिग्धाङ्गाः शोणास्ते वातरंहसः ।
आजानेया हया राजन्नविश्रान्ता ध्रुवं ययुः ॥ १० ॥
उनके घोड़े स्वभावतः लाल रंगके थे। उसपर भी उनके सारे अंग खूनसे लथपथ होनेके कारण वे और भी लाल दिखायी देते थे। उनका वेग वायुके समान तीव्र था। राजन्! उन घोड़ोंकी नस्ल अच्छी थी और वे बिना विश्राम किये निरन्तर दौड़ लगाते रहते थे ॥ १० ॥

तमन्तकमिव क्रुद्धमापतन्तं यतव्रतम् ।
दृष्ट्वा सम्प्राद्रवन् योधाः पाण्डवस्य ततस्ततः ॥ ११ ॥
नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले द्रोणाचार्यको क्रोधमें भरे हुए कालके समान आते देख पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके सारे सैनिक इधर-उधर भाग चले ॥ ११ ॥

तेषां प्राद्रवतां भीमः पुनरावर्ततामपि ।
पश्यतां तिष्ठतां चासीच्छब्दः परमदारुणः ॥ १२ ॥
वे कभी भागते, कभी पुनः लौटते और कभी चुपचाप खड़े होकर युद्ध देखते थे; इस प्रकारकी हलचलमें पड़े हुए उन योद्धाओंका अत्यन्त दारुण भयंकर कोलाहल चारों ओर गूँज उठा ॥ १२ ॥

शूराणां हर्षजननो भीरूणां भयवर्धनः ।
द्यावापृथिव्योर्विवरं पूरयामास सर्वतः ॥ १३ ॥
वह कोलाहल शूरवीरोंका हर्ष और कायरोंका भय बढ़ानेवाला था। वह आकाश और पृथ्वीके बीचमें सब ओर व्याप्त हो गया ॥ १३ ॥

ततः पुनरपि द्रोणो नाम विश्रावयन् युधि ।
अकरोद् रौद्रमात्मानं किरञ्छरशतैः परान् ॥ १४ ॥
तब द्रोणाचार्यने पुनः रणभूमिमें अपना नाम सुना-सुनाकर शत्रुओंपर सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करते हुए अपने भयंकर स्वरूपको प्रकट किया ॥ १४ ॥

स तथा तेष्वनीकेषु पाण्डुपुत्रस्य मारिष ।
कालवद् व्यचरद् द्रोणो युवेव स्थविरो बली ॥ १५ ॥

आर्य! बलवान् द्रोणाचार्य वृद्ध होकर भी तरुणके समान फुर्ती दिखाते हुए पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी सेनाओंमें कालके समान विचरने लगे ।। १५ ।।

उत्कृत्य च शिरांस्युग्रान् बाहूनपि सुभूषणान् ।
कृत्वा शून्यान् रथोपास्थानुदक्रोशन्महारथान् ।। १६ ।।

वे योद्धाओंके मस्तकों और आभूषणोंसे भूषित भयंकर भुजाओंको भी काटकर रथकी बैठकोंको सूनी कर देते और महारथियोंकी ओर देख-देखकर दहाड़ते थे ।।

तस्य हर्षप्रणादेन बाणवेगेन वा विभो ।
प्राकम्पन्त रणे योधा गावः शीतार्दिता इव ।। १७ ।।

प्रभो! उनके हर्षपूर्वक किये हुए सिंहनाद अथवा बाणोंके वेगसे उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा सर्दीसे पीड़ित हुई गायोंकी भाँति थर-थर काँपने लगे ।। १७ ।।

द्रोणस्य रथघोषेण मौर्वीनिष्पेषणेन च ।
धनुःशब्देन चाकाशे शब्दः समभवन्महान् ।। १८ ।।

द्रोणाचार्यके रथकी घरघराहट, प्रत्यंचाको दबा-दबाकर खींचनेके शब्द और धनुषकी टंकारसे आकाशमें महान् कोलाहल होने लगा ।। १८ ।।

अथास्य धनुषो बाणा निश्चरन्तः सहस्रशः ।
व्याप्य सर्वा दिशः पेतुर्नागाश्वरथपत्तिषु ।। १९ ।।

द्रोणाचार्यके धनुषसे सहस्रों बाण निकलकर सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंपर बड़े वेगसे गिरने लगे ।। १९ ।।

तं कार्मुकमहावेगमस्त्रज्वलितपावकम् ।
द्रोणमासादयांचक्रुः पञ्चालाः पाण्डवैः सह ।। २० ।।

द्रोणाचार्यके धनुषका वेग महान् था। उन्होंने अस्त्रोंद्वारा आग-सी प्रज्वलित कर दी थी। पाण्डव और पांचाल सैनिक उनके पास पहुँचकर उन्हें रोकनेकी चेष्टा करने लगे ।। २० ।।

तान् सकुञ्जरपत्त्यश्वान् प्राहिणोद् यमसादनम् ।
चक्रेऽचिरेण च द्रोणो महीं शोणितकर्दमाम् ।। २१ ।।

द्रोणाचार्यने हाथी, घोड़े और पैदलोंसहित उन समस्त योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया और थोड़ी ही देरमें भूतलपर रक्तकी कीच मचा दी ।। २१ ।।

तन्वता परमास्त्राणि शरान् सततमस्यता ।
द्रोणेन विहितं दिक्षु शरजालमदृश्यत ।। २२ ।।

द्रोणाचार्यने निरन्तर बाणोंकी वर्षा और उत्तम अस्त्रोंका विस्तार करके सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणोंका जाल-सा बुन दिया, जो स्पष्ट दिखलायी दे रहा था ।। २२ ।।

पदातिषु रथाश्वेषु वारणेषु च सर्वशः ।
तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चरन् केतुरदृश्यत ।। २३ ।।

पैदल सैनिकों, रथियों, घुड़सवारों तथा हाथीसवारोंमें सब ओर विचरता हुआ उनका ध्वज बादलोंमें विद्युत्-सा दृष्टिगोचर हो रहा था॥ २३॥

स केकयानां प्रवरांश्च पञ्च पञ्चालराजं च शरैः प्रमथ्य। युधिष्ठिरानीकमदीनसत्त्वो द्रोणोऽभ्ययात् कार्मुकबाणपाणिः॥ २४॥

पाँचों श्रेष्ठ केकयराजकुमारों तथा पांचालराज द्रुपदको अपने बाणोंसे मथकर उदार हृदयवाले द्रोणाचार्यने हाथोंमें धनुष-बाण लेकर युधिष्ठिरकी सेनापर आक्रमण किया॥ २४॥

तं भीमसेनश्च धनंजयश्च शिनेश्च नप्ता द्रुपदात्मजश्च। शैब्यात्मजः काशिपतिः शिबिश्च दृष्ट्वा नदन्तो व्यकिरञ्छरौघैः॥ २५॥

यह देख भीमसेन, अर्जुन, सात्यकि, धृष्टद्युम्न, शैव्यकुमार, काशिराज तथा शिबि गर्जना करते हुए उनके ऊपर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे॥ २५॥

(तेषां शरा द्रोणशरैर्निकृत्ता भूमावदृश्यन्त विवर्तमानाः। श्रेणीकृताः संयति मोघवेगा द्वीपे नदीनामिव काशरोहाः॥)

इन सबके बाण द्रोणाचार्यके सायकोंद्वारा छिन्न-भिन्न एवं निष्फल हो युद्धस्थलमें धरतीपर लोटते दिखायी देने लगे, मानो नदियोंके द्वीपमें ढेर-के-ढेर कास अथवा सरकण्डे काटकर बिछा दिये गये हों।

तेषामथ द्रोणधनुर्विमुक्ताः पत्रिणः काञ्चनचित्रपुङ्खाः। भित्त्वा शरीराणि गजाश्वयूनां जग्मुर्महीं शोणितदिग्धवाजाः॥ २६॥

द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णमय विचित्र पंखोंसे युक्त बाण हाथी, घोड़े और युवकोंके शरीरोंको छेदकर धरतीमें घुस गये। उस समय उनके पंख रक्तसे रँग गये थे॥ २६॥

सा योधसंघैश्च रथैश्च भूमिः शरैर्विभिन्नैर्गजवाजिभिश्च। प्रच्छाद्यमाना पतितैर्बभूव समावृता द्यौरिव कालमेघैः॥ २७॥

जैसे वर्षाकालके मेघोंकी घटासे आकाश आच्छादित हो जाता है, उसी प्रकार वहाँ बाणोंसे विदीर्ण होकर गिरे हुए योद्धाओंके समूहों, रथों, हाथियों और घोड़ोंसे सारी रणभूमि पट गयी थी ॥ २७ ॥

शैनेयभीमार्जुनवाहिनीशं सौभद्रपाञ्चालसकाशिराजम् । अन्यांश्च वीरान् समरे ममर्द द्रोणः सुतानां तव भूतिकामः ॥ २८ ॥ सात्यकि, भीमसेन और अर्जुन जिसमें सेनापति थे तथा जिसके भीतर अभिमन्यु, द्रुपद एवं काशिराज-जैसे योद्धा मौजूद थे, उस सेनाको तथा अन्यान्य महावीरोंको भी द्रोणाचार्यने समरांगणमें रौंद डाला; क्योंकि वे आपके पुत्रोंको ऐश्वर्यकी प्राप्ति कराना चाहते थे ॥ २८ ॥

एतानि चान्यानि च कौरवेन्द्र कर्माणि कृत्वा समरे महात्मा । प्रताप्य लोकानिव कालसूर्यो द्रोणो गतः स्वर्गमितो हि राजन् ॥ २९ ॥ राजन्! कौरवेन्द्र! युद्धस्थलमें ये तथा और भी बहुत-से वीरोचित कर्म करके महात्मा द्रोणाचार्य प्रलयकालके सूर्यकी भाँति सम्पूर्ण लोकोंको तपाकर यहाँसे स्वर्गमें चले गये ॥ २९ ॥

एवं रुक्मरथः शूरो हत्वा शतसहस्रशः । पाण्डवानां रणे योधान् पार्षतेन निपातितः ॥ ३० ॥ इस प्रकार सुवर्णमय रथवाले शूरवीर द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें पाण्डवपक्षके लाखों योद्धाओंका संहार करके अन्तमें धृष्टद्युम्नके द्वारा मार गिराये गये ॥ ३० ॥

अक्षौहिणीमभ्यधिकां शूराणामनिवर्तिनाम् । निहत्य पश्चाद् धृतिमानगच्छत् परमां गतिम् ॥ ३१ ॥ धैर्यशाली द्रोणाचार्यने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंकी एक अक्षौहिणीसे भी अधिक सेनाका संहार करके पीछे स्वयं भी परमगति प्राप्त कर ली ॥ ३१ ॥

पाण्डवैः सह पञ्चालैरशिवैः क्रूरकर्मभिः । हतो रुक्मरथो राजन् कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ३२ ॥ राजन्! सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके अन्तमें पाण्डवोंसहित अमंगलकारी क्रूरकर्मा पांचालोंके हाथसे मारे गये ॥ ३२ ॥

ततो निनादो भूतानामाकाशे समजायत । सैन्यानां च ततो राजन्नाचार्ये निहते युधि ॥ ३३ ॥

नरेश्वर! युद्धस्थलमें आचार्य द्रोणके मारे जानेपर आकाशमें स्थित अदृश्य भूतोंका तथा कौरव-सैनिकोंका आर्तनाद सुनायी देने लगा ।। ३३ ।।

द्यां धरां खं दिशो वापि प्रदिशश्चानुनादयन् ।
अहो धिगिति भूतानां शब्दः समभवद् भृशम् ।। ३४ ।।

उस समय स्वर्गलोक, भूलोक, अन्तरिक्षलोक, दिशाओं तथा विदिशाओंको भी प्रतिध्वनित करता हुआ समस्त प्राणियोंका 'अहो! धिक्कार है!' यह शब्द वहाँ जोर-जोरसे गूँजने लगा ।। ३४ ।।

देवताः पितरश्चैव पूर्वे ये चास्य बान्धवाः ।
ददृशुर्निहतं तत्र भारद्वाजं महारथम् ।। ३५ ।।

देवता, पितर तथा जो इनके पूर्ववर्ती भाई-बन्धु थे, उन्होंने भी वहाँ भरद्वाजनन्दन महारथी द्रोणाचार्यको मारा गया देखा ।। ३५ ।।

पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा सिंहनादान् प्रचक्रिरे ।
सिंहनादेन महता समकम्पत मेदिनी ।। ३६ ।।

पाण्डव विजय पाकर सिंहनाद करने लगे। उनके उस महान् सिंहनादसे पृथ्वी काँप उठी ।। ३६ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणवधश्रवणे अष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणवधश्रवणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३७ श्लोक हैं।)

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नवमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना

धृतराष्ट्र उवाच

किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृंजयाः ।
तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ॥ १ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्य क्या कर रहे थे कि पाण्डव तथा सृंजय उनपर चोट कर सके? वे तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और अस्त्र-विद्यामें निपुण थे ॥ १ ॥

रथभङ्गो बभूवास्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः ।
प्रमत्तो वाभवद् द्रोणस्ततो मृत्युमुपेयिवान् ॥ २ ॥

उनका रथ टूट गया था या बाणोंका प्रहार करते समय धनुष ही खण्डित हो गया था अथवा द्रोणाचार्य असावधान थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी? ॥ २ ॥

कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् ।
किरन्तमिषुसंघातान् रुक्मपुङ्खाननेकणः ॥ ३ ॥
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रयोधिनम् ।
दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम् ॥ ४ ॥
पाञ्चालपुत्रो न्यवधीद् दिव्यास्त्रधरमच्युतम् ।
कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ॥ ५ ॥

तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे। वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे। उनके हाथोंमें फुर्ती थी। वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान् थे। दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र-युद्धमें पारंगत थे। फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे ॥ ३—५ ॥

व्यक्तं हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मतिः ।
यद् द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ॥ ६ ॥

निश्चय ही पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव ही प्रबल है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि द्रोणाचार्य-जैसे शूरवीर महामना धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ ६ ॥

अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत् प्रतिष्ठितम् ।

तमिष्वस्त्रधराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ॥ ७ ॥ जिन वीर सेनापतियोंमें चार प्रकारके अस्त्र प्रतिष्ठित थे, उन धनुर्धरोंके आचार्य द्रोणको तुम मुझे मारा गया बता रहे हो ॥ ७ ॥

श्रुत्वा हतं रुक्मरथं वैयाघ्रपरिवारितम् । जातरूपशिरस्त्राणं नाद्य शोकमपानुदे ॥ ८ ॥ व्याघ्रचर्मसे आच्छादित सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सुनहरा शिरस्त्राण (टोप या पगड़ी) धारण करनेवाले द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर आज मैं अपने शोकको किसी प्रकार दूर नहीं कर पाता हूँ ॥ ८ ॥

न नूनं परदुःखेन म्रियते कोऽपि संजय । यत्र द्रोणमहं श्रुत्वा हतं जीवामि मन्दधीः ॥ ९ ॥ संजय! निश्चय ही कोई भी दूसरेके दुःखसे नहीं मरता है, तभी तो मैं मन्दबुद्धि मनुष्य द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी जी रहा हूँ ॥ ९ ॥

दैवमेव परं मन्ये नन्वर्थं हि पौरुषम् । अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ॥ १० ॥ यच्छ्रुत्वा निहतं द्रोणं शतधा न विदीर्यते । मैं तो दैवको ही श्रेष्ठ मानता हूँ। पुरुषार्थ तो अनर्थका ही कारण है। निश्चय ही मेरा यह अत्यन्त सुदृढ़ हृदय लोहेका बना हुआ है, जिससे द्रोणाचार्यको मारा गया सुनकर भी इसके सौ टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १० १/२ ॥

ब्राह्मे दैवे तथैष्वस्त्रे यमुपासन् गुणार्थिनः ॥ ११ ॥ ब्राह्मणा राजपुत्राश्च स कथं मृत्युना हतः । गुणार्थी ब्राह्मण तथा राजकुमार ब्राह्म और दैव अस्त्रोंके लिये जिनकी उपासना करते थे, उन्हें मृत्यु कैसे हर ले गयी? ॥ ११ १/२ ॥

शोषणं सागरस्येव मेरोरिव विसर्पणम् ॥ १२ ॥ पतनं भास्करस्येव न मृष्ये द्रोणपातनम् । द्रोणका रणभूमिमें गिराया जाना समुद्रके सूखने, मेरु पर्वतके चलने-फिरने और सूर्यके आकाशसे टूटकर गिरनेके समान है। मैं इसे किसी प्रकार सहन नहीं कर पाता ॥ १२ १/२ ॥

दुष्टानां प्रतिषेद्धाऽऽसीद् धार्मिकाणां च रक्षिता ॥ १३ ॥ योऽहासीत् कृपणस्यार्थे प्राणानपि परंतपः । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाले और धार्मिकोंके रक्षक थे। उन्होंने मुझ कृपणके लिये अपने प्राणतक दे दिये ॥ १३ १/२ ॥

मन्दानां मम पुत्राणां जयाशा यस्य विक्रमे ॥ १४ ॥ बृहस्पत्युशनस्तुल्यो बुद्ध्या स निहतः कथम् ।

मेरे मूर्ख पुत्रोंको जिनके ही पराक्रमके भरोसे विजयकी आशा बनी हुई थी तथा जो बुद्धिमें बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान थे, वे द्रोणाचार्य कैसे मारे गये? ॥ १४ १/२ ॥ ते च शोणा बृहन्तोऽश्वाश्छन्ना जालैर्हिरण्मयैः ॥ १५ ॥ रथे वातजवा युक्ताः सर्वशस्त्रातिगा रणे । बलिनो हेषिणो दान्ताः सैन्धवाः साधुवाहिनः ॥ १६ ॥ दृढाः संग्राममध्येषु कच्चिदासन्नविह्वलाः । करिणां बृंहतां युद्धे शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनैः ॥ १७ ॥ ज्याक्षेपशरवर्षाणां शस्त्राणां च सहिष्णवः । आशंसन्तः पराज्जेतुं जितश्वासा जितव्यथाः ॥ १८ ॥ जिनके रंग लाल थे, जो विशाल एवं दृढ़ शरीरवाले थे, जिन्हें सोनेकी जालियोंसे आच्छादित किया जाता था, जो रथमें जोते जानेपर वायुके समान वेगसे चलते थे, संग्राममें सब प्रकारके शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले प्रहारको बचा जाते थे, जो बलवान्, सुशिक्षित और रथको अच्छी तरह वहन करनेवाले थे, रणभूमिमें जो दृढ़तापूर्वक डटे रहते और जोर-जोरसे हिनहिनाते थे, धनुषोंकी टंकारके साथ होनेवाली बाणवर्षा तथा अस्त्र-शस्त्रोंके आघातको सहन करनेमें समर्थ एवं शत्रुओंको जीतनेका उत्साह रखनेवाले थे, जो पीड़ा तथा श्वासको जीत चुके थे, वे सिन्धुदेशीय घोड़े युद्ध-स्थलमें चिग्घाड़ते हुए हाथियों और शंखों एवं नगाड़ोंकी आवाजसे घबराये तो नहीं थे? ॥ १५—१८ ॥ हयाः पराजिताः शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहाः । ते स्म रुक्मरथे युक्ता नरवीरसमाश्रिताः ॥ १९ ॥ कथं नाभ्यतरंस्तात पाण्डवानामनीकिनीम् । क्या द्रोणाचार्यके रथको वहन करनेवाले वे शीघ्रगामी अश्व पराजित हो गये थे? तात! द्रोणाचार्यके सुवर्णमय रथमें जुते हुए और उन्हीं नरवीर आचार्यकी सवारीमें काम आनेवाले वे घोड़े पाण्डव-सेनाको पार कैसे नहीं कर सके? ॥ १९ १/२ ॥ जातरूपपरिष्कारमास्थाय रथमुत्तमम् ॥ २० ॥ भारद्वाजः किमकरोद् युधि सत्यपराक्रमः । उस सुवर्णभूषित उत्तम रथपर आरूढ़ हो सत्यपराक्रमी द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें क्या किया? ॥ २० १/२ ॥ विद्यां यस्योपजीवन्ति सर्वलोकधनुर्धराः ॥ २१ ॥ स सत्यसंधो बलवान् द्रोणः किमकरोद् युधि । समस्त जगत्के धनुर्धर जिनकी विद्याका आश्रय लेकर जीवननिर्वाह करते हैं, उन सत्यपराक्रमी बलवान् द्रोणाचार्यने युद्धमें क्या किया? ॥ २१ १/२ ॥ दिवि शक्रमिव श्रेष्ठं महामात्रं धनुर्भृताम् ॥ २२ ॥ के नु तं रौद्रकर्माणं युद्धे प्रत्युद्ययु रथाः ।

स्वर्गमें देवराज इन्द्रके समान जो इस लोकमें श्रेष्ठ और समस्त धनुर्धरोंमें महान् थे, उन भयंकर कर्म करनेवाले द्रोणाचार्यका सामना करनेके लिये उस रणक्षेत्रमें कौन-कौनसे रथी गये थे? ।। २२ १/२ ।।

ननु रुक्मरथं दृष्ट्वा प्राद्रवन्ति स्म पाण्डवाः ।। २३ ।। दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं रणे तस्मिन् महाबलम् । उस समरांगणमें दिव्य अस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले तथा सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हुए महाबली द्रोणाचार्यको देखकर तो समस्त पाण्डव-योद्धा भाग खड़े होते थे ।।

उताहो सर्वसैन्येन धर्मराजः सहानुजः ।। २४ ।। पाञ्चाल्यप्रग्रहो द्रोणं सर्वतः समवारयत् । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने अपनी सारी सेनाके साथ जाकर धृष्टद्युम्नरूपी डोरीकी सहायतासे द्रोणाचार्यको घेर तो नहीं लिया था? ।। २४ १/२ ।।

नूनमावारयत् पार्थो रथिनोऽन्यानजिह्मगैः ।। २५ ।। ततो द्रोणं समारोहत् पार्षतः पापकर्मकृत् । निश्चय ही अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंके द्वारा अन्य रथियोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया था। इसीलिये पापकर्मा धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यपर चढ़ाई कर सका ।। २५ १/२ ।।

न ह्यहं परिपश्यामि वधे कञ्चन शुष्मिणः ।। २६ ।। धृष्टद्युम्नादृते रौद्रात् पाल्यमानात् किरीटिना । किरीटधारी अर्जुनके द्वारा सुरक्षित भयंकर स्वभाववाले धृष्टद्युम्नको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो अत्यन्त तेजस्वी द्रोणाचार्यके वधमें समर्थ हो ।। २६ १/२ ।।

तैर्वृतः सर्वतः शूरः पाञ्चाल्यापसदस्ततः ।। २७ ।। केकयैश्चेदिकारूषैर्मत्स्यैरन्यैश्च भूमिपैः । व्याकुलीकृतमाचार्यं पिपीलैरुरगं यथा ।। २८ ।। कर्मण्यसुकरे सक्तं जघानेति मतिर्मम । केकय, चेदि, कारूष, मत्स्यदेशीय सैनिकों तथा अन्य भूमिपालोंने आचार्यको उसी प्रकार व्याकुल कर दिया होगा, जैसे बहुत-सी चींटियाँ सर्पको विह्वल कर देती हैं; उसी अवस्थामें उन पाण्डव सैनिकोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए नीच धृष्टद्युम्नने दुष्कर कर्ममें लगे हुए द्रोणाचार्यको मार डाला होगा, यही बात मेरे मनमें आती है ।। २७-२८ १/२ ।।

योऽधीत्य चतुरो वेदान् साङ्गानाख्यानपञ्चमान् ।। २९ ।। ब्राह्मणानां प्रतिष्ठाऽऽसीत् स्रोतसामिव सागरः । क्षात्रं च ब्रह्म चैवेह योऽभ्यतिष्ठत् परंतपः ।। ३० ।। स कथं ब्राह्मणो वृद्धः शस्त्रेण वधमाप्तवान् ।

जो छहों अंगों तथा पंचम वेदस्थानीय इतिहास-पुराणोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करके ब्राह्मणोंके लिये उसी प्रकार आश्रय बने हुए थे, जैसे नदियोंके लिये समुद्र हैं। जो शत्रुओंको संताप देनेवाले तथा ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनोंके धर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले थे, वे वृद्ध ब्राह्मण द्रोणाचार्य शस्त्रद्वारा कैसे मारे गये? ।।

अमर्षिणा मर्षितवान् क्लिश्यमानान् सदा मया ॥ ३१ ॥
अनर्हमाणान् कौन्तेयान् कर्मणस्तस्य तत् फलम् ।
मैंने अमर्षमें भरकर सदा कष्ट भोगनेके अयोग्य कुन्तीकुमारोंको क्लेश ही दिया है; परंतु मेरे इस बर्तावको द्रोणाचार्यने चुपचाप सह लिया था। उनके उसी कर्मका यह वधरूपी फल प्राप्त हुआ है ।। ३१ १/२ ।।

यस्य कर्मानुजीवन्ति लोके सर्वधनुर्भृतः ॥ ३२ ॥
स सत्यसंधः सुकृती श्रीकामैर्निहतः कथम् ।
जगत्के सम्पूर्ण धनुर्धर जिनके शिक्षणरूपी कर्मका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सत्यप्रतिज्ञ पुण्यात्मा द्रोणाचार्यको राजलक्ष्मीके लोभियोंने कैसे मार डाला? ।। ३२ १/२ ।।

दिवि शक्र इव श्रेष्ठो महासत्त्वो महाबलः ॥ ३३ ॥
स कथं निहतः पार्थैः क्षुद्रमत्स्यैर्यथा तिमिः ।
स्वर्गलोकमें इन्द्रके समान जो इस लोकमें सबसे श्रेष्ठ थे, उन महान् सत्त्वशाली, महाबली द्रोणाचार्यको कुन्तीके पुत्रोंने उसी प्रकार मार डाला, जैसे छोटे मत्स्योंने मिलकर तिमि नामक महामत्स्यको मार डाला हो। यह कैसे सम्भव हुआ? ।। ३३ १/२ ।।

क्षिप्रहस्तश्च बलवान् दृढधन्वारिमर्दनः ॥ ३४ ॥
न यस्य विजयाकाङ्क्षी विषयं प्राप्य जीवति ।
यं द्वौ न जहतः शब्दौ जीवमानं कदाचन ॥ ३५ ॥
ब्राह्मश्च वेदकामानां ज्याघोषश्च धनुष्मताम् ।
जो शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले, बलवान्, दृढधन्वा तथा शत्रुओंका मर्दन करनेवाले थे, कोई भी विजयाभिलाषी वीर जिनके बाणोंका लक्ष्य बन जानेपर जीवित नहीं रह सकता था, जिन्हें जीते-जी दो शब्दोंने कभी नहीं छोड़ा था—एक तो वेदाध्ययनकी इच्छावाले लोगोंके समक्ष वेदध्वनिका शब्द और दूसरा धनुर्धारियोंके बीचमें प्रत्यंचाकी टंकारका शब्द ।। ३४-३५ १/२ ।।

अदीनं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् ॥ ३६ ॥
नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् ।
सिंह और हाथीके समान पराक्रमी, उदार, लज्जाशील और किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणका वध मैं नहीं सहन कर सकता ।। ३६ १/२ ।।

कथं संजय दुर्धर्षमनाधृष्यशोबलम् ॥ ३७ ॥ पश्यतां पुरुषेन्द्राणां समरे पार्षतोऽवधीत् । संजय! जिनके यश और बलका तिरस्कार होना असम्भव था, उन दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यको समरभूमिमें सम्पूर्ण नरेशोंके देखते-देखते धृष्टद्युम्नने कैसे मार डाला? ॥

के पुरस्तादयुध्यन्त रक्षन्तो द्रोणमन्तिकात् ॥ ३८ ॥ के नु पश्चादवर्तन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् । कौन-कौनसे वीर उस समय निकटसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करते हुए उनके आगे रहकर युद्ध करते थे और कौन-कौन योद्धा दुर्गम मार्गपर पैर बढ़ाते हुए उनके पीछे रहकर रक्षा करते थे? ॥ ३८ १/२ ॥

केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं सव्यं के च महात्मनः ॥ ३९ ॥ पुरस्तात् के च वीरस्य युध्यमानस्य संयुगे । के च तस्मिंस्तनूंस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् ॥ ४० ॥ कौन वीर उन महात्माके दाहिने पहियेकी और कौन बायें पहियेकी रक्षा करते थे? कौन उस युद्धस्थलमें युद्धपरायण वीरवर द्रोणाचार्यके आगे थे और किन लोगोंने अपने शरीरका मोह छोड़कर विपक्षियोंका सामना करते हुए उस रणक्षेत्रमें मृत्युका वरण किया था ॥ ३९-४० ॥

द्रोणस्य समरे वीराः केऽकुर्वन्त परां धृतिम् । कच्चिन्नैनं भयान्मन्दाः क्षत्रिया व्यजहन् रणे ॥ ४१ ॥ रक्षितारस्ततः शून्ये कच्चित् तैर्न हतः परैः । किन वीरोंने युद्धमें द्रोणाचार्यको उत्तम धैर्य प्रदान किया? उनकी रक्षा करनेवाले मूर्ख क्षत्रियोंने भयभीत होकर युद्धस्थलमें उन्हें अकेला तो नहीं छोड़ दिया? और इस प्रकार शत्रुओंने सूनेमें तो उन्हें नहीं मार डाला? ॥ ४१ १/२ ॥

न स पृष्ठमरेस्त्रासाद् रणे शौर्यात् प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥ परामप्यापदं प्राप्य स कथं निहतः परैः । जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति पड़नेपर भी रणमें अपने शौर्यके कारण शत्रुको भयवश पीठ नहीं दिखा सकते थे, वे विपक्षियोंद्वारा किस प्रकार मारे गये? ॥ ४२ १/२ ॥

एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु संजय ॥ ४३ ॥ पराक्रमेद् यथाशक्त्या तच्च तस्मिन् प्रतिष्ठितम् । संजय! बड़े भारी संकटमें पड़नेपर श्रेष्ठ पुरुषको यही करना चाहिये कि वह यथाशक्ति पराक्रम दिखावे; यह बात द्रोणाचार्यमें पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित थी ॥ ४३ १/२ ॥

मुह्यते मे मनस्तात कथा तावन्निवार्यताम् । भूयस्तु लब्धसंज्ञस्त्वां परिपृच्छामि संजय ॥ ४४ ॥

तात! इस समय मेरा मन मोहित हो रहा है; अतः तुम यह कथा बंद करो! संजय! फिर होशमें आनेपर तुमसे यह समाचार पूछूँगा ।। ४४ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रशोके नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रका शोकविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।

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दशमोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रका शोकसे व्याकुल होना और संजयसे युद्धविषयक प्रश्न

वैशम्पायन उवाच

एतत् पृष्ट्वा सूतपुत्रं हृच्छोकेनार्दितो भृशम् ।
जये निराशः पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽपतत् क्षितौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! सूतपुत्र संजयसे इस प्रकार प्रश्न करते-करते हार्दिक शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा टूट जानेके कारण राजा धृतराष्ट्र अचेत-से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ॥

तं विसंज्ञं निपतितं सिषिचुः परिचारिकाः ।
जलेनात्यर्थशीतेन वीजन्त्यः पुण्यगन्धिना ॥ २ ॥
उस समय अचेत पड़े हुए राजा धृतराष्ट्रको उनकी दासियाँ पंखा झलने लगीं और उनके ऊपर परम सुगन्धित एवं अत्यन्त शीतल जल छिड़कने लगीं ॥ २ ॥

पतितं चैनमालोक्य समन्ताद् भरतस्त्रियः ।
परिवव्रुर्महाराजमस्पृशंश्चैव पाणिभिः ॥ ३ ॥
महाराजको गिरा देख धृतराष्ट्रकी बहुत-सी स्त्रियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं और उन्हें हाथोंसे सहलाने लगीं ॥ ३ ॥

उत्थाप्य चैनं शनकै राजानं पृथिवीतलात् ।
आसनं प्रापयामासुर्बाष्पकण्ठ्यो वराननाः ॥ ४ ॥
फिर उन सुमुखी स्त्रियोंने राजाको धीरे-धीरे धरतीसे उठाकर सिंहासनपर बिठाया। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे और कण्ठ गद्गद हो रहे थे ॥ ४ ॥

आसनं प्राप्य राजा तु मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ।
निश्चेष्टोऽतिष्ठत तदा वीज्यमानः समन्ततः ॥ ५ ॥
सिंहासनपर पहुँचकर भी राजा धृतराष्ट्र मूर्च्छासे पीड़ित हो निश्चेष्ट हो गये। उस समय सब ओरसे उनके ऊपर व्यजन डुलाया जा रहा था ॥ ५ ॥

स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां वेपमानो महीपतिः ।
पुनर्गावलगणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम् ॥ ६ ॥
फिर धीरे-धीरे होशमें आनेपर काँपते हुए राजा धृतराष्ट्रने पुनः सूतजातीय संजयसे युद्धका यथावत् समाचार पूछा ॥ ६ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

यः स उद्यन्निवादित्यो ज्योतिषा प्रणदंस्तमः । अजातशत्रुमायान्तं कस्तं द्रोणादवारयत् ॥ ७ ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**जो उगते हुए सूर्यकी भाँति अपनी प्रभासे अन्धकार दूर कर देते हैं, उन अजातशत्रु युधिष्ठिरको द्रोणके समीप आनेसे किसने रोका था? ॥ ७ ॥

प्रभिन्नमिव मातङ्गं यथा क्रुद्धं तरस्विनम् । प्रसन्नवदनं दृष्ट्वा प्रतिद्विरदगामिनम् ॥ ८ ॥ वासितासंगमे यद्वदजय्यं प्रति यूथपैः । निजघान रणे वीरान् वीरः पुरुषसत्तमः ॥ ९ ॥ यो ह्येको हि महावीर्यो निर्दहेद् घोरचक्षुषा । कृत्स्नं दुर्योधनबलं धृतिमान् सत्यसंगरः ॥ १० ॥ चक्षुर्हणं जये सक्तमिष्वासधरमच्युतम् । दान्तं बहुमतं लोके के शूराः पर्यवारयन् ॥ ११ ॥ जो मदकी धारा बहानेवाले, हथिनीके साथ समागमके समय आये हुए विपक्षी हाथीपर आक्रमण करनेवाले तथा गजयूथपतियोंके लिये अजेय मतवाले गजराजके समान वेगशाली और पराक्रमी हैं, कौरवोंके प्रति जिनका क्रोध बढ़ा हुआ है, जिन पुरुषप्रवर वीरने रणक्षेत्रमें बहुत-से वीरोंका संहार किया है, जो महापराक्रमी, धैर्यवान् एवं सत्यप्रतिज्ञ हैं और अपनी भयंकर दृष्टिसे अकेले ही दुर्योधनकी सम्पूर्ण सेनाको भस्म कर सकते हैं, जो क्रोधभरी दृष्टिसे ही शत्रुा संहार करनेमें समर्थ हैं, विजयके लिये प्रयत्नशील, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले, जितेन्द्रिय तथा लोकमें विशेष सम्मानित हैं, उन प्रसन्नवदन धनुर्धर युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके सामने आते देख मेरे पक्षके किन शूरवीरोंने रोका था? ॥ ८—११ ॥

के दुष्प्रधर्षं राजानमिष्वासधरमच्युतम् । समासेदुर्नरव्याघ्रं कौन्तेयं तत्र मामकाः ॥ १२ ॥ जो धर्मसे कभी विचलित नहीं होते हैं, उन महाधनुर्धर दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरपर मेरे किन योद्धाओंने आक्रमण किया था? ॥ १२ ॥

तरसैवाभिपद्याथ यो वै द्रोणमुपाद्रवत् । यः करोति महत् कर्म शत्रूणां वै महाबलः ॥ १३ ॥ महाकायो महोत्साहो नागायुतसमो बले । तं भीमसेनमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ १४ ॥ जिन्होंने वेगसे ही पहुँचकर द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया था, जो शत्रुके समक्ष महान् पराक्रम प्रकट करते हैं, जो महाबली, महाकाय और महान् उत्साही हैं तथा जिनमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उन भीमसेनको आते देख किन वीरोंने रोका था? ॥ १३-१४ ॥

यदाऽऽयाज्जलदप्रख्यो रथः परमवीर्यवान् । पर्जन्य इव बीभत्सुस्तुमुलामशनीं सृजन् ॥ १५ ॥ विसृजञ्छरजालानि वर्षाणि मघवानिव । अवस्फूर्जन् दिशः सर्वास्तलनेमिस्वनेन च ॥ १६ ॥ चापविद्युत्प्रभो घोरो रथगुल्मबलाहकः । स नेमिघोषस्तनितः शरशब्दातिबन्धुरः ॥ १७ ॥ रोषानिलसमुद्भूतो मनोऽभिप्रायशीघ्रगः । मर्मातिगो बाणधरस्तुमुलः शोणितोदकैः ॥ १८ ॥ सम्प्लावयन् दिशः सर्वा मानवैरास्तरन् महीम् । जो मेघके समान श्यामवर्णवाले परम पराक्रमी महारथी अर्जुन विद्युत्की उत्पत्ति करते हुए बादलोंके समान भयंकर वज्रास्त्रका प्रयोग करते हैं, जो जलकी वर्षा करनेवाले इन्द्रके समान बाणसमूहोंकी वृष्टि करते हैं तथा जो अपने धनुषकी टंकार और रथके पहियेकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको शब्दायमान कर देते हैं, वे स्वयं भयंकर मेघस्वरूप जान पड़ते हैं। धनुष ही उनके समीप विद्युतप्रभाके समान प्रकाशित होता है। रथियोंकी सेना उनकी फैली हुई घटाएँ जान पड़ती हैं। रथके पहियोंकी घरघराहट मेघ-गर्जनाके समान प्रतीत होती है। उनके बाणोंकी सनसनाहट वर्षाके शब्दकी भाँति अत्यन्त मनोहर लगती है। क्रोधरूपी वायु उन्हें आगे बढ़नेकी प्रेरणा देती है। वे मनोरथकी भाँति शीघ्रगामी और विपक्षियोंके मर्मस्थलोंको विदीर्ण कर डालनेवाले हैं। बाण धारण करके वे बड़े भयानक प्रतीत होते और रक्तरूपी जलसे सम्पूर्ण दिशाओंको आप्लावित करते हुए मनुष्योंकी लाशोंसे धरतीको पाट देते हैं ॥ १५—१८ १/२ ॥

भीमनिःस्वनितो रौद्रो दुर्योधनपुरोगमान् ॥ १९ ॥ युद्धेऽभ्यषिञ्चद् विजयो गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः । गाण्डीवं धारयन् धीमान् कीदृशं वो मनस्तदा ॥ २० ॥ जिस समय भयंकर गर्जना करनेवाले रौद्ररूपधारी बुद्धिमान् अर्जुनने युद्धमें गाण्डीव धारण करके सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए गृध्रपंखयुक्त बाणोंद्वारा दुर्योधन आदि मेरे पुत्रों और सैनिकोंको घायल करना आरम्भ किया, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई थी? ॥ १९-२० ॥

इषुसम्बाधमाकाशं कुर्वन् कपिवरध्वजः । यदाऽऽयात् कथमासीत् तु तदा पार्थं समीक्षताम् ॥ २१ ॥ वानरके चिह्नसे युक्त श्रेष्ठ ध्वजावाले अर्जुन जब आकाशको अपने बाणोंसे ठसाठस भरते हुए तुमलोगोंपर चढ़ आये थे, उस समय उन्हें देखकर तुम्हारे मनकी कैसी दशा हुई थी? ॥ २१ ॥

कच्चिद् गाण्डीवशब्देन न प्रणश्यति वै बलम् ।

यद्धः सभैरवं कुर्वन्नर्जुनो भृशमन्वयात् ॥ २२ ॥
जिस समय अर्जुनने अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करते हुए तुमलोगोंका पीछा किया था, उस समय गाण्डीवकी टंकार सुनकर हमारी सेना भाग तो नहीं गयी थी? ॥ २२ ॥
कच्चिन्नापानुदत् प्राणानिषुभिर्वो धनंजयः ।
वातो वेगादिवाविध्यन्मेघान् शरगणैर्नृपान् ॥ २३ ॥

उस अवसरपर पार्थने अपने बाणोंद्वारा तुम्हारे सैनिकोंके प्राण तो नहीं ले लिये थे? जैसे वायु वेगपूर्वक चलकर मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने वेगसे चलाये हुए बाण-समूहोंद्वारा विपक्षी नरेशोंको घायल कर दिया होगा ॥ २३ ॥
को हि गाण्डीवधन्वानं रणे सोढुं नरोऽर्हति ।
यमुपश्रुत्य सेनाग्रे जनः सर्वो विदीर्यते ॥ २४ ॥

सेनाके प्रमुख भागमें जिनका नाम सुनकर ही सारे सैनिक विदीर्ण हो जाते (भाग निकलते) हैं, उन्हीं गाण्डीवधारी अर्जुनका वेग रणक्षेत्रमें कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ २४ ॥
यत्सेनाः समकम्पन्त यद्वीरानस्पृशद् भयम् ।
के तत्र नाजहुर्द्रोणं के क्षुद्राः प्राद्रवन् भयात् ॥ २५ ॥

जहाँ सारी सेनाएँ काँप उठीं, समस्त वीरोंके मनमें भय समा गया, वहाँ किन वीरोंने द्रोणाचार्यका साथ नहीं छोड़ा और कौन-कौनसे अधम सैनिक भयके मारे मैदान छोड़कर भाग गये? ॥ २५ ॥
के वा तत्र तनूंस्त्यक्त्वा प्रतीपं मृत्युमाव्रजन् ।
अमानुषाणां जेतारं युद्धेष्वपि धनंजयम् ॥ २६ ॥

मानवेतर प्राणियों (देवताओं और दैत्यों)-पर भी विजय पानेवाले वीर अर्जुनको युद्धमें अपने प्रतिकूल पाकर किन वीरोंने वहाँ अपने शरीरोंको निछावर करके मृत्युको स्वीकार किया? ॥ २६ ॥
न च वेगं सिताश्वस्य विसहिष्यन्ति मामकाः ।
गाण्डीवस्य च निर्घोषं प्रावृड्जलदनिःस्वनम् ॥ २७ ॥

मेरे सैनिक श्वेतवाहन अर्जुनके वेग और वर्षाकालके मेघकी गम्भीर गर्जनाकी भाँति गाण्डीव धनुषकी टंकारध्वनिको नहीं सह सकेंगे ॥ २७ ॥
विष्वक्सेनो यस्य यन्ता यस्य योद्धा धनंजयः ।
अशक्यः स रथो जेतुं मन्ये देवासुरैरपि ॥ २८ ॥

जिसके सारथि भगवान् श्रीकृष्ण और योद्धा वीर धनंजय हैं, उस रथको जीतना मैं देवताओं तथा असुरोंके लिये भी असम्भव मानता हूँ ॥ २८ ॥
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीयश्च पाण्डवः ।
मेधावी निपुणो धीमान् युधि सत्यपराक्रमः ॥ २९ ॥

आरावं विपुलं कुर्वन् व्यथयन् सर्वसैनिकान् । यदाऽऽयान्नकुलो द्रोणं के शूराः पर्यवारयन् ।। ३० ।। सुकुमार, तरुण, शूरवीर, दर्शनीय (सुन्दर), मेधावी, युद्धकुशल, बुद्धिमान् और सत्यपराक्रमी पाण्डुपुत्र नकुल जब युद्धमें जोर-जोरसे गर्जना करके समस्त सैनिकोंको पीड़ित करते हुए द्रोणाचार्यपर चढ़ आये, उस समय किन वीरोंने उन्हें रोका था? ।। २९-३० ।। आशीविष इव क्रुद्धः सहदेवो यदाभ्ययात् । कदनं करिष्यञ्छत्रूणां तेजसा दुर्जयो युधि ।। ३१ ।। आर्यव्रतममोघेषुं ह्रीमन्तमपराजितम् । सहदेवं तमायान्तं के शूराः पर्यवारयन् ।। ३२ ।। विषधर सर्पके समान क्रोधमें भरे हुए तथा तेजसे दुर्जय सहदेव जब युद्धमें शत्रुओंका संहार करते हुए द्रोणाचार्यके सामने आये, उस समय श्रेष्ठ व्रतधारी अमोघ बाणोंवाले लज्जाशील और अपराजित वीर सहदेवको आते देख किन शूरवीरोंने उन्हें रोका था? ।। ३१-३२ ।। यस्तु सौवीरराजस्य प्रमथ्य महतीं चमूम् । आदत्त महिषीं भोजां काम्यां सर्वाङ्गशोभनाम् ।। ३३ ।। सत्यं धृतिश्च शौर्यं च ब्रह्मचर्यं च केवलम् । सर्वाणि युयुधानेऽस्मिन् नित्यानि पुरुषर्षभे ।। ३४ ।। जिन्होंने सौवीरराजकी विशाल सेनाको मथकर उनकी सर्वांगसुन्दरी कमनीय कन्या भोजाको अपनी रानी बनानेके लिये हर लिया था, उन पुरुषशिरोमणि सात्यकिमें सत्य, धैर्य, शौर्य और विशुद्ध ब्रह्मचर्य आदि सारे सद्गुण सदा विद्यमान रहते हैं ।। ३३-३४ ।। बलिनं सत्यकर्माणमदीनमपराजितम् । वासुदेवसमं युद्धे वासुदेवादनन्तरम् ।। ३५ ।। धनंजयोपदेशेन श्रेष्ठमिष्वस्त्रकर्मणि । पार्थेन सममस्त्रेषु कस्तं द्रोणादवारयत् ।। ३६ ।। वे सात्यकि बलवान्, सत्यपराक्रमी, उदार, अपराजित, युद्धमें वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके समान शक्तिशाली, अवस्थामें उनसे कुछ छोटे, अर्जुनसे ही शिक्षा पाकर बाणविद्यामें श्रेष्ठ तथा अस्त्रोंके संचालनमें कुन्तीकुमार अर्जुनके तुल्य यशस्वी हैं। उन वीरवर सात्यकिको किसने द्रोणाचार्यके पास आनेसे रोका? ।। ३५-३६ ।। वृष्णीनां प्रवरं वीरं शूरं सर्वधनुष्मताम् । रामेण सममस्त्रेषु यशसा विक्रमेण च ।। ३७ ।। वृष्णिवंशके श्रेष्ठ शूरवीर सात्यकि सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें उत्तम हैं। वे अस्त्र-विद्या, यश तथा पराक्रममें परशुरामजीके समान हैं ।। ३७ ।।

सत्यं धृतिर्मतिः शौर्यं ब्राह्मं चास्त्रमनुत्तमम् । सात्वते तानि सर्वाणि त्रैलोक्यमिव केशवे ॥ ३८ ॥ जैसे भगवान् श्रीकृष्णमें तीनों लोक स्थित हैं, उसी प्रकार सात्वतवंशी सात्यकिमें सत्य, धैर्य, बुद्धि, शौर्य तथा परम उत्तम ब्रह्मास्त्र विद्यमान हैं ॥ ३८ ॥

तमेवंगुणसम्पन्नं दुर्वारमपि दैवतैः । समासाद्य महेष्वासं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ३९ ॥ इस प्रकार सर्वसद्गुणसम्पन्न महाधनुर्धर सात्यकिको रोकना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। उनके पास पहुँचकर किन शूरवीरोंने उन्हें आगे बढ़नेसे रोका? ॥ ३९ ॥

पञ्चालेषूत्तमं वीरमुत्तमाभिजनप्रियम् । नित्यमुत्तमकर्माणमुत्तमौजसमाहवे ॥ ४० ॥ युक्तं धनंजयहिते समानर्थार्थमुत्थितम् । यमवैश्रवणादित्यमहेन्द्रवरुणोपमम् ॥ ४१ ॥ महारथं समाख्यातं द्रोणायोद्यतमाहवे । त्यजन्तं तुमुले प्राणान् के शूराः समवारयन् ॥ ४२ ॥ पांचालोंमें उत्तम, श्रेष्ठ कुल एवं ख्यातिके प्रेमी, सदा सत्कर्म करनेवाले, संग्राममें उत्तम आत्मबलका परिचय देनेवाले, अर्जुनके हितसाधनमें तत्पर, मेरा अनर्थ करनेके लिये उद्यत रहनेवाले, यमराज, कुबेर, सूर्य, इन्द्र और वरुणके समान तेजस्वी, विख्यात महारथी तथा भयंकर युद्धमें अपने प्राणोंको निछावर करके द्रोणाचार्यसे भिड़नेके लिये सदा तैयार रहनेवाले वीर धृष्टद्युम्नको किन शूरवीरोंने रोका? ॥ ४०—४२ ॥

एकोऽपसृत्य चेदिभ्यः पाण्डवान् यः समाश्रितः । धृष्टकेतुं समायान्तं द्रोणं कस्तं न्यवारयत् ॥ ४३ ॥ जिसने अकेले ही चेदिदेशसे आकर पाण्डव-पक्षका आश्रय लिया है, उस धृष्टकेतुको द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ॥ ४३ ॥

योऽवधीत् केतुमान् वीरो राजपुत्रं दुरासदम् । अपरान्तगिरिद्वारे द्रोणात् कस्तं न्यवारयत् ॥ ४४ ॥ जिस वीरने अपरान्त पर्वतके द्वारदेशमें स्थित दुर्जय राजकुमारका वध किया, उस केतुमान्को द्रोणाचार्यके पास आनेसे किसने रोका? ॥ ४४ ॥

स्त्रीपुंसयोर्नरव्याघ्रो यः स वेद गुणागुणान् । शिखण्डिनं याज्ञसेनिमम्लानमनसं युधि ॥ ४५ ॥ देवव्रतस्य समरे हेतुं मृत्योर्महात्मनः । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः पर्यवारयन् ॥ ४६ ॥ जो पुरुषसिंह स्त्री और पुरुष दोनों शरीरोंके गुण-अवगुणको अपने अनुभवद्वारा जानता है, युद्धस्थलमें जिसका मन कभी म्लान (उत्साहशून्य) नहीं होता, जो समरांगणमें

महात्मा भीष्मकी मृत्युमें हेतु बन चुका है, उस द्रुपदपुत्र शिखण्डीको द्रोणाचार्यके सम्मुख आनेसे किन वीरोंने रोका था? ।। ४५-४६ ।। यस्मिन्नभ्यधिका वीरे गुणाः सर्वे धनंजयात् । यस्मिन्नस्त्राणि सत्यं च ब्रह्मचर्यं च सर्वदा ।। ४७ ।। वासुदेवसमं वीर्ये धनंजयसमं बले । तेजसाऽऽदित्यसदृशं बृहस्पतिसमं मतौ ।। ४८ ।। अभिमन्युं महात्मानं व्यात्ताननमिवान्तकम् । द्रोणायाभिमुखं यान्तं के शूराः समवारयन् ।। ४९ ।। जिस वीरमें अर्जुनसे भी अधिक मात्रामें समस्त गुण मौजूद हैं, जिसमें अस्त्र, सत्य तथा ब्रह्मचर्य सदा प्रतिष्ठित हैं, जो पराक्रममें भगवान् श्रीकृष्ण, बलमें अर्जुन, तेजमें सूर्य और बुद्धिमें बृहस्पतिके समान है, वह महामना अभिमन्यु जब मुँह फैलाये हुए कालके समान द्रोणाचार्यके सम्मुख जा रहा था, उस समय किन शूरवीरोंने उसे रोका था? ।। ४७—४९ ।। तरुणस्तरुणप्रज्ञः सौभद्रः परवीरहा । यदाभ्यधावद् वै द्रोणं तदाऽऽसीद् वो मनः कथम् ।। ५० ।। तरुण अवस्था और तरुण बुद्धिवाले शत्रुवीरोंके हन्ता सुभद्राकुमारने जब द्रोणाचार्यपर धावा किया था, उस समय तुमलोगोंका मन कैसा हो रहा था? ।। ५० ।। द्रौपदेया नरव्याघ्राः समुद्रमिव सिन्धवः । यद् द्रोणमाद्रवन् संख्ये के शूरास्तान् न्यवारयन् ।। ५१ ।। पुरुषसिंह द्रौपदीकुमार समुद्रकी ओर जानेवाली नदियोंकी भाँति जब द्रोणाचार्यपर धावा कर रहे थे, उस समय युद्धमें किन शूरवीरोंने उनको रोका था? ।। ५१ ।। एते द्वादश वर्षाणि क्रीडामुत्सृज्य बालकाः । अस्त्रार्थमवसन् भीष्मे बिभ्रतो व्रतमुत्तमम् ।। ५२ ।। इन द्रौपदीकुमारोंने बारह वर्षोंतक खेल-कूद छोड़कर अस्त्रोंकी शिक्षा पानेके लिये उत्तम ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए भीष्मके समीप निवास किया था ।। ५२ ।। क्षत्रंजयः क्षत्रदेवः क्षत्रवर्मा च मानदः । धृष्टद्युम्नात्मजा वीराः के तान् द्रोणादवारयन् ।। ५३ ।। क्षत्रंजय, क्षत्रदेव तथा दूसरोंको मान देनेवाले क्षत्रवर्मा—ये धृष्टद्युम्नके तीन वीर पुत्र हैं। उन्हें द्रोणके पास आनेसे किन वीरोंने रोका था? ।। ५३ ।। शताद् विशिष्टं यं युद्धे सममन्यन्त वृष्णयः । चेकितानं महेष्वासं कस्तं द्रोणादवारयत् ।। ५४ ।। जिन्हें युद्धके मैदानमें वृष्णिवंशियोंने सौ वीरोंसे भी अधिक माना है, उन महाधनुर्धर चेकितानको द्रोणके पास आनेसे किसने रोका? ।। ५४ ।। वार्धक्षेमिः कलिङ्गानां यः कन्यामाहरद् युधि ।