महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंजय! जिन भगवान् वासुदेवको द्विजगण सबका पिता बताते हैं, क्या वे पाण्डवोंके लिये स्वयं युद्ध करेंगे? ।।
स यदा तात संनह्येत् पाण्डवार्थाय संजय ।
न तदा प्रतिसंयोद्धा भविता तत्र कश्चन ॥ ३३ ॥
तात! संजय! जब पाण्डवोंके लिये श्रीकृष्ण कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो जायँ, उस समय वहाँ कोई भी योद्धा उनका सामना करनेको तैयार न होगा ।। ३३ ।।
यदि स्म कुरवः सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान् ।
वार्ष्णेयोऽर्थाय तेषां वै गृह्णीयाच्छस्त्रमुत्तमम् ॥ ३४ ॥
यदि सब कौरव पाण्डवोंको जीत लें तो वृष्णिवंशभूषण भगवान् श्रीकृष्ण उनके हितके लिये अवश्य उत्तम शस्त्र ग्रहण कर लेंगे ।। ३४ ।।
ततः सर्वान् नरव्याघ्रो हत्वा नरपतीन् रणे ।
कौरवांश्च महाबाहुः कुन्त्यै दद्यात् स मेदिनीम् ॥ ३५ ॥
उस दशामें पुरुषसिंह महाबाहु श्रीकृष्ण सब राजाओं तथा कौरवोंको रणभूमिमें मारकर सारी पृथ्वी कुन्तीको दे देंगे ।। ३५ ।।
यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजयः ।
रथस्य तस्य कः संख्ये प्रत्यनीको भवेद् रथः ॥ ३६ ॥
जिसके सारथि सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता श्रीकृष्ण तथा योद्धा अर्जुन हैं, रणभूमिमें उस रथका सामना करनेवाला दूसरा कौन रथ होगा? ।। ३६ ।।
न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जयः ।
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ॥ ३७ ॥
किसी भी उपायसे कौरवोंकी जय होती नहीं दिखायी देती। इसलिये तुम मुझसे सब समाचार कहो। वह युद्ध किस प्रकार हुआ? ।। ३७ ।।
अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः ।
अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ॥ ३८ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं और श्रीकृष्ण किरीटधारी अर्जुनके आत्मा हैं। अर्जुनमें विजय नित्य विद्यमान है और श्रीकृष्णमें कीर्तिका सनातन निवास है ।। ३८ ।।
सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजितः ।
प्राधान्येनैव भूयिष्ठममेयाः केशवे गुणाः ॥ ३९ ॥
अर्जुन सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कहीं भी पराजित नहीं हुए हैं। श्रीकृष्णमें असंख्य गुण हैं। यहाँ प्रायः प्रधान गुणके नाम लिये गये हैं ।। ३९ ।।
मोहाद् दुर्योधनः कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम् ।
मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृतः ॥ ४० ॥