भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 3237 में से

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यच्च तन्महदाश्चर्यं सभायां मम संजय । कृतवान् पुण्डरीकाक्षः कस्तदन्य इहार्हति ॥ २४ ॥ संजय! उस दिन मेरी सभामें कमलनयन श्रीकृष्णने जो महान् आश्चर्य प्रकट किया था, उसे इस संसारमें उनके सिवा दूसरा कौन कर सकता है? ॥ २४ ॥

यच्च भक्त्या प्रसन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् । तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमम् ॥ २५ ॥ मैंने प्रसन्न होकर भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्णके उस ईश्वरीय रूपका जो दर्शन किया, वह सब मुझे आज भी अच्छी तरह स्मरण है। मैंने उन्हें प्रत्यक्षकी भाँति जान लिया था ॥ २५ ॥

नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य संजय ॥ २६ ॥ संजय! बुद्धि और पराक्रमसे युक्त भगवान् हृषीकेशके कर्मोंका अन्त नहीं जाना जा सकता ॥ २६ ॥

तथा गदश्च साम्बश्च प्रद्युम्नोऽथ विदूरथः । अगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णः ससारणः ॥ २७ ॥ उल्मुको निशठश्चैव झिल्ली बभ्रुश्च वीर्यवान् । पृथुश्च विपृथुश्चैव शमीकोऽथारिमेजयः ॥ २८ ॥ एतेऽन्ये बलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः । कथंचित् पाण्डवानीकं श्रयेयुः समरे स्थिताः ॥ २९ ॥ आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना । ततः संशयितं सर्वं भवेदिति मतिर्मम ॥ ३० ॥ यदि गद, साम्ब, प्रद्युम्न, विदूरथ, अगावह, अनिरुद्ध, चारुदेष्ण, सारण, उल्मुक, निशठ, झिल्ली, पराक्रमी बभ्रु, पृथु, विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय—ये तथा दूसरे भी बलवान् एवं प्रहारकुशल वृष्णिवंशी योद्धा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर महात्मा केशवके बुलानेपर पाण्डव-सेनामें आ जायँ और समरभूमिमें खड़े हो जायँ तो हमारा सारा उद्योग संशयमें पड़ जाय; ऐसा मेरा विश्वास है ॥

नागायुतबलो वीरः कैलासशिखरोपमः । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ॥ ३१ ॥ वनमाला और हल धारण करनेवाले वीर बलराम कैलास-शिखरके समान गौरवर्ण हैं। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे भी उसी पक्षमें रहेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण हैं ॥ ३१ ॥

यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातयः । अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय संजय ॥ ३२ ॥

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