भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 3237 में से

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उन्होंने रणक्षेत्रमें अंग, वंग, कलिंग, मगध, काशि, कोसल, वत्स, गर्ग, करूष तथा पौण्ड्र आदि देशोंपर विजय पायी थी ॥ १५ ॥ आवन्त्यान् दाक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्च समुद्गलान् ॥ १६ ॥ काम्बोजान् वाटधानांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च संजय । त्रिगर्तान् मालवांश्चैव दरदांश्च सुदुर्जयान् ॥ १७ ॥ नानादिग्भ्यश्च सम्प्राप्तान् खशांश्चैव शकांस्तथा । जितवान् पुण्डरीकाक्षो यवनं च सहानुगम् ॥ १८ ॥ संजय! इसी प्रकार कमलनयन श्रीकृष्णने अवन्ती, दक्षिण प्रान्त, पर्वतीय देश, दशेरक, काश्मीर, औरसिक, पिशाच, मुद्गल, काम्बोज, वाटधान, चोल, पाण्ड्य, त्रिगर्त, मालव, अत्यन्त दुर्जय दरद आदि देशोंके योद्धाओंको तथा नाना दिशाओंसे आये हुए खशों, शकों और अनुयायियों-सहित कालयवनको भी जीत लिया ॥ १६—१८ ॥ प्रविश्य मकरावासं यादोगणनिषेवितम् । जिगाय वरुणं संख्ये सलिलान्तर्गतं पुरा ॥ १९ ॥ पूर्वकालमें श्रीकृष्णने जल-जन्तुओंसे भरे हुए समुद्रमें प्रवेश करके जलके भीतर निवास करनेवाले वरुण देवताको युद्धमें परास्त किया ॥ १९ ॥ युधि पञ्चजनं हत्वा दैत्यं पातालवासिनम् । पाञ्चजन्यं हृषीकेशो दिव्यं शङ्खमवाप्तवान् ॥ २० ॥ इसी प्रकार हृषीकेशने पाताल-निवासी पंचजन नामक दैत्यको युद्धमें मारकर दिव्य पाञ्चजन्य शंख प्राप्त किया ॥ खाण्डवे पार्थसहितस्तोषयित्वा हुताशनम् । आग्नेयमस्त्रं दुर्धर्षं चक्रं लेभे महाबलः ॥ २१ ॥ खाण्डव वनमें अर्जुनके साथ अग्निदेवको संतुष्ट करके महाबली श्रीकृष्णने दुर्धर्ष आग्नेय अस्त्र चक्रको प्राप्त किया था ॥ २१ ॥ वैनतेयं समारुह्य त्रासयित्वामरावतीम् । महेन्द्रभवनाद् वीरः पारिजातमुपानयत् ॥ २२ ॥ वीर श्रीकृष्ण गरुड़पर आरूढ़ हो अमरावती पुरीमें जाकर वहाँके निवासियोंको भयभीत करके महेन्द्रभवनसे पारिजात वृक्ष उठा ले आये ॥ २२ ॥ तच्च मर्षितवान् शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् । राज्ञां चाप्यजितं कञ्चित् कृष्णेनेह न शुश्रुम ॥ २३ ॥ उनके पराक्रमको इन्द्र अच्छी तरह जानते थे, इसलिये उन्होंने वह सब चुपचाप सह लिया। राजाओंमेंसे किसीको भी मैंने ऐसा नहीं सुना है, जिसे श्रीकृष्णने जीत न लिया हो ॥ २३ ॥

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