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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

यच्च तन्महदाश्चर्यं सभायां मम संजय । कृतवान् पुण्डरीकाक्षः कस्तदन्य इहार्हति ॥ २४ ॥ संजय! उस दिन मेरी सभामें कमलनयन श्रीकृष्णने जो महान् आश्चर्य प्रकट किया था, उसे इस संसारमें उनके सिवा दूसरा कौन कर सकता है? ॥ २४ ॥

यच्च भक्त्या प्रसन्नोऽहमद्राक्षं कृष्णमीश्वरम् । तन्मे सुविदितं सर्वं प्रत्यक्षमिव चागमम् ॥ २५ ॥ मैंने प्रसन्न होकर भक्तिभावसे भगवान् श्रीकृष्णके उस ईश्वरीय रूपका जो दर्शन किया, वह सब मुझे आज भी अच्छी तरह स्मरण है। मैंने उन्हें प्रत्यक्षकी भाँति जान लिया था ॥ २५ ॥

नान्तो विक्रमयुक्तस्य बुद्ध्या युक्तस्य वा पुनः । कर्मणां शक्यते गन्तुं हृषीकेशस्य संजय ॥ २६ ॥ संजय! बुद्धि और पराक्रमसे युक्त भगवान् हृषीकेशके कर्मोंका अन्त नहीं जाना जा सकता ॥ २६ ॥

तथा गदश्च साम्बश्च प्रद्युम्नोऽथ विदूरथः । अगावहोऽनिरुद्धश्च चारुदेष्णः ससारणः ॥ २७ ॥ उल्मुको निशठश्चैव झिल्ली बभ्रुश्च वीर्यवान् । पृथुश्च विपृथुश्चैव शमीकोऽथारिमेजयः ॥ २८ ॥ एतेऽन्ये बलवन्तश्च वृष्णिवीराः प्रहारिणः । कथंचित् पाण्डवानीकं श्रयेयुः समरे स्थिताः ॥ २९ ॥ आहूता वृष्णिवीरेण केशवेन महात्मना । ततः संशयितं सर्वं भवेदिति मतिर्मम ॥ ३० ॥ यदि गद, साम्ब, प्रद्युम्न, विदूरथ, अगावह, अनिरुद्ध, चारुदेष्ण, सारण, उल्मुक, निशठ, झिल्ली, पराक्रमी बभ्रु, पृथु, विपृथु, शमीक तथा अरिमेजय—ये तथा दूसरे भी बलवान् एवं प्रहारकुशल वृष्णिवंशी योद्धा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर महात्मा केशवके बुलानेपर पाण्डव-सेनामें आ जायँ और समरभूमिमें खड़े हो जायँ तो हमारा सारा उद्योग संशयमें पड़ जाय; ऐसा मेरा विश्वास है ॥

नागायुतबलो वीरः कैलासशिखरोपमः । वनमाली हली रामस्तत्र यत्र जनार्दनः ॥ ३१ ॥ वनमाला और हल धारण करनेवाले वीर बलराम कैलास-शिखरके समान गौरवर्ण हैं। उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। वे भी उसी पक्षमें रहेंगे, जहाँ श्रीकृष्ण हैं ॥ ३१ ॥

यमाहुः सर्वपितरं वासुदेवं द्विजातयः । अपि वा ह्येष पाण्डूनां योत्स्यतेऽर्थाय संजय ॥ ३२ ॥

संजय! जिन भगवान् वासुदेवको द्विजगण सबका पिता बताते हैं, क्या वे पाण्डवोंके लिये स्वयं युद्ध करेंगे? ।।

स यदा तात संनह्येत् पाण्डवार्थाय संजय ।
न तदा प्रतिसंयोद्धा भविता तत्र कश्चन ॥ ३३ ॥
तात! संजय! जब पाण्डवोंके लिये श्रीकृष्ण कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो जायँ, उस समय वहाँ कोई भी योद्धा उनका सामना करनेको तैयार न होगा ।। ३३ ।।

यदि स्म कुरवः सर्वे जयेयुर्नाम पाण्डवान् ।
वार्ष्णेयोऽर्थाय तेषां वै गृह्णीयाच्छस्त्रमुत्तमम् ॥ ३४ ॥
यदि सब कौरव पाण्डवोंको जीत लें तो वृष्णिवंशभूषण भगवान् श्रीकृष्ण उनके हितके लिये अवश्य उत्तम शस्त्र ग्रहण कर लेंगे ।। ३४ ।।

ततः सर्वान् नरव्याघ्रो हत्वा नरपतीन् रणे ।
कौरवांश्च महाबाहुः कुन्त्यै दद्यात् स मेदिनीम् ॥ ३५ ॥
उस दशामें पुरुषसिंह महाबाहु श्रीकृष्ण सब राजाओं तथा कौरवोंको रणभूमिमें मारकर सारी पृथ्वी कुन्तीको दे देंगे ।। ३५ ।।

यस्य यन्ता हृषीकेशो योद्धा यस्य धनंजयः ।
रथस्य तस्य कः संख्ये प्रत्यनीको भवेद् रथः ॥ ३६ ॥
जिसके सारथि सम्पूर्ण इन्द्रियोंके नियन्ता श्रीकृष्ण तथा योद्धा अर्जुन हैं, रणभूमिमें उस रथका सामना करनेवाला दूसरा कौन रथ होगा? ।। ३६ ।।

न केनचिदुपायेन कुरूणां दृश्यते जयः ।
तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यथा युद्धमवर्तत ॥ ३७ ॥
किसी भी उपायसे कौरवोंकी जय होती नहीं दिखायी देती। इसलिये तुम मुझसे सब समाचार कहो। वह युद्ध किस प्रकार हुआ? ।। ३७ ।।

अर्जुनः केशवस्यात्मा कृष्णोऽप्यात्मा किरीटिनः ।
अर्जुने विजयो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ॥ ३८ ॥
अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं और श्रीकृष्ण किरीटधारी अर्जुनके आत्मा हैं। अर्जुनमें विजय नित्य विद्यमान है और श्रीकृष्णमें कीर्तिका सनातन निवास है ।। ३८ ।।

सर्वेष्वपि च लोकेषु बीभत्सुरपराजितः ।
प्राधान्येनैव भूयिष्ठममेयाः केशवे गुणाः ॥ ३९ ॥
अर्जुन सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कहीं भी पराजित नहीं हुए हैं। श्रीकृष्णमें असंख्य गुण हैं। यहाँ प्रायः प्रधान गुणके नाम लिये गये हैं ।। ३९ ।।

मोहाद् दुर्योधनः कृष्णं यो न वेत्तीह केशवम् ।
मोहितो दैवयोगेन मृत्युपाशपुरस्कृतः ॥ ४० ॥

दुर्योधन मोहवश सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् केशवको नहीं जानता है, वह दैवयोगसे मोहित हो मौतके फंदेमें फँस गया ॥ ४० ॥ न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् । पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ॥ ४१ ॥ यह दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनको नहीं जानता है, वे दोनों पूर्वदेवता महात्मा नर और नारायण हैं ॥ एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसाऽपि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ ॥ ४२ ॥ नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छतः । उनकी आत्मा तो एक है; परंतु इस भूतलके मनुष्योंको वे शरीरसे दो होकर दिखायी देते हैं। उन्हें मनसे भी पराजित नहीं किया जा सकता। वे यशस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन यदि इच्छा करें तो मेरी सेनाको तत्काल नष्ट कर सकते हैं; परंतु मानवभावका अनुसरण करनेके कारण ये वैसी इच्छा नहीं करते हैं ॥ ४२ १/२ ॥ युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् ॥ ४३ ॥ भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मनः । तात! भीष्म तथा महात्मा द्रोणका वध युगके उलट जानेकी-सी बात है। सम्पूर्ण लोकोंको यह घटना मानो मोहमें डालनेवाली है ॥ ४३ १/२ ॥ न ह्येव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च ॥ ४४ ॥ न क्रियाभिर्न चास्त्रेण मृत्योः कश्चिन्निवार्यते । जान पड़ता है, कोई भी न तो ब्रह्मचर्यके पालनसे, न वेदोंके स्वाध्यायसे, न कर्मोंके अनुष्ठानसे और न अस्त्रोंके प्रयोगसे ही अपनेको मृत्युसे बचा सकता है ॥ ४४ १/२ ॥ लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ॥ ४५ ॥ भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा किं नु जीवामि संजय । संजय! लोकसम्मानित, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा युद्धदुर्मद वीरवर भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ ४५ १/२ ॥ यां तां श्रियमसूयामः पुरा दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ॥ ४६ ॥ अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिरके पास जिस प्रसिद्ध राजलक्ष्मीको देखकर हमलोग उनसे डाह करने लगे थे, आज भीष्म और द्रोणाचार्यके वधसे हम उसके कटु फलका अनुभव कर रहे हैं ॥ ४६ १/२ ॥ मत्कृते चाप्यनुप्राप्तः कुरूणामेष संक्षयः ॥ ४७ ॥ पक्वानां हि वधे सूत वज्रायन्ते तृणान्युत ।

सूत! मेरे ही कारण यह कौरवोंका विनाश प्राप्त हुआ है। जो कालसे परिपक्व हो गये हैं, उनके वधके लिये तिनके भी वज्रका काम करते हैं ॥ ४७१/२ ॥
अनन्तमिदमैश्वर्यं लोके प्राप्तो युधिष्ठिरः ॥ ४८ ॥
यस्य कोपान्महात्मानौ भीष्मद्रोणौ निपातितौ ।
युधिष्ठिर इस संसारमें अनन्त ऐश्वर्यके भागी हुए हैं। जिनके कोपसे महात्मा भीष्म और द्रोण मार गिराये गये ॥
प्राप्तः प्रकृतितो धर्मो न धर्मो मामकान् प्रति ॥ ४९ ॥
क्रूरः सर्वविनाशाय कालोऽसौ नातिवर्तते ।
युधिष्ठिरको धर्मका स्वाभाविक फल प्राप्त हुआ है, किंतु मेरे पुत्रोंको उसका फल नहीं मिल रहा है। सबका विनाश करनेके लिये प्राप्त हुआ यह क्रूर काल बीत नहीं रहा है ॥
अन्यथा चिन्तिता ह्यर्था नरैस्तात मनस्विभिः ॥ ५० ॥
अन्यथैव प्रपद्यन्ते दैवादिति मतिर्मम ।
तात! मनस्वी पुरुषोंद्वारा अन्य प्रकारसे सोचे हुए कार्य भी दैवयोगसे कुछ और ही प्रकारके हो जाते हैं; ऐसा मेरा अनुभव है ॥ ५०१/२ ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे सम्प्राप्ते कृच्छ्र उत्तमे ।
अपारणीये दुश्चिन्त्ये यथाभूतं प्रचक्ष्व मे ॥ ५१ ॥
अतः इस अनिवार्य, अपार, दुश्चिन्त्य एवं महान् संकटके प्राप्त होनेपर जो घटना जिस प्रकार हुई हो, वह मुझे बताओ ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

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द्वादशोऽध्यायः

दुर्योधनका वर माँगना और द्रोणाचार्यका युधिष्ठिरको अर्जुनकी अनुपस्थितिमें जीवित पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा करना

संजय उवाच

हन्त ते कथयिष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ।
यथा स न्यपतद् द्रोणः सूदितः पाण्डुसृञ्जयैः ॥ १ ॥

संजयने कहा—महाराज! मैं बड़े दुःखके साथ आपसे उन सब घटनाओंका वर्णन करूँगा। द्रोणाचार्य किस प्रकार गिरे हैं और पाण्डवों तथा सृञ्जयोंने कैसे उनका वध किया है? इन सब बातोंको मैंने प्रत्यक्ष देखा था ॥ १ ॥

सेनापतित्वं सम्प्राप्य भारद्वाजो महारथः ।
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य पुत्रं ते वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥

सेनापतिका पद प्राप्त करके महारथी द्रोणाचार्यने सारी सेनाके बीचमें आपके पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

यत् कौरवाणामृषभादापगेयादनन्तरम् ।
सैनापत्येन यद् राजन् मामद्य कृतवानसि ॥ ३ ॥
सदृशं कर्मणस्तस्य फलं प्राप्नुहि भारत ।
करोमि कामं कं तेऽद्य प्रवृणीष्व यमिच्छसि ॥ ४ ॥

‘राजन्! तुमने कौरवश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मके बाद जो आज मुझे सेनापति बनाया है, भरतनन्दन! इस कार्यके अनुरूप कोई फल मुझसे प्राप्त करो। आज तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करूँ? तुम्हें जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसे ही माँग लो’ ॥ ३-४ ॥

ततो दुर्योधनो राजा कर्णदुःशासनादिभिः ।
सम्मन्त्र्योवाच दुर्धर्षमाचार्यं जयतां वरम् ॥ ५ ॥

तब राजा दुर्योधनने कर्ण, दुःशासन आदिके साथ सलाह करके विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं दुर्जय आचार्य द्रोणसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

ददासि चेद् वरं मह्यं जीवग्राहं युधिष्ठिरम् ।
गृहीत्वा रथिनां श्रेष्ठं मत्समीपमिहानय ॥ ६ ॥

‘आचार्य! यदि आप मुझे वर दे रहे हैं तो रथियोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको जीवित पकड़कर यहाँ मेरे पास ले आइये’ ॥ ६ ॥

ततः कुरूणामाचार्यः श्रुत्वा पुत्रस्य ते वचः ।

सेनां प्रहर्षयन् सर्वामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥
आपके पुत्रकी वह बात सुनकर कुरुकुलके आचार्य द्रोण सारी सेनाको प्रसन्न करते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
धन्यः कुन्तीसुतो राजन् यस्य ग्रहणमिच्छसि ।
न वधार्थं सुदुर्धर्षं वरमद्य प्रयाचसे ॥ ८ ॥
‘राजन्! कुन्तीकुमार युधिष्ठिर धन्य हैं, जिन्हें तुम जीवित पकड़ना चाहते हो। उन दुर्धर्ष वीरके वधके लिये आज तुम मुझसे याचना नहीं कर रहे हो ॥ ८ ॥
किमर्थं च नरव्याघ्र न वधं तस्य काङ्क्षसे ।
नाशंससि क्रियामेतां मत्तो दुर्योधन ध्रुवम् ॥ ९ ॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हें उनके वधकी इच्छा क्यों नहीं हो रही है? दुर्योधन! तुम मेरे द्वारा निश्चितरूपसे युधिष्ठिरका वध कराना क्यों नहीं चाहते हो? ॥ ९ ॥
आहोस्विद् धर्मराजस्य द्वेष्टा तस्य न विद्यते ।
यदीच्छसि त्वं जीवन्तं कुलं रक्षसि चात्मनः ॥ १० ॥
‘अथवा इसका कारण यह तो नहीं है कि धर्मराज युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला इस संसारमें कोई है ही नहीं। इसीलिये तुम उन्हें जीवित देखना और अपने कुलकी रक्षा करना चाहते हो ॥ १० ॥
अथवा भरतश्रेष्ठ निर्जित्य युधि पाण्डवान् ।
राज्यं सम्प्रति दत्त्वा च सौभ्रात्रं कर्तुमिच्छसि ॥ ११ ॥
‘अथवा भरतश्रेष्ठ! तुम युद्धमें पाण्डवोंको जीतकर इस समय उनका राज्य वापस दे सुन्दर भ्रातृभावका आदर्श उपस्थित करना चाहते हो ॥ ११ ॥
धन्यः कुन्तीसुतो राजा सुजातं चास्य धीमतः ।
अजातशत्रुता सत्या तस्य यत् स्निह्यते भवान् ॥ १२ ॥
‘कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर धन्य हैं। उन बुद्धिमान् नरेशका जन्म बहुत ही उत्तम है और वे जो अजातशत्रु कहलाते हैं, वह भी ठीक है; क्योंकि तुम भी उनपर स्नेह रखते हो' ॥ १२ ॥
द्रोणेन चैवमुक्तस्य तव पुत्रस्य भारत ।
सहसा निःसृतो भावो योऽस्य नित्यं हृदि स्थितः ॥ १३ ॥
भारत! द्रोणाचार्यके ऐसा कहनेपर तुम्हारे पुत्रके मनका भाव जो सदा उसके हृदयमें बना रहता था, सहसा प्रकट हो गया ॥ १३ ॥
नाकारो गूहितुं शक्यो बृहस्पतिसमैरपि ।
तस्मात्तव सुतो राजन् प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ १४ ॥
बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् पुरुष भी अपने आकारको छिपा नहीं सकते। राजन्! इसीलिये आपका पुत्र अत्यन्त प्रसन्न होकर इस प्रकार बोला— ॥ १४ ॥

वधे कुन्तिसुतस्याजौ नाचार्य विजयो मम । हते युधिष्ठिरे पार्था हन्युः सर्वान् हि नो ध्रुवम् ॥ १५ ॥ ‘आचार्य! युद्धके मैदानमें कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके मारे जानेसे मेरी विजय नहीं हो सकती; क्योंकि युधिष्ठिरका वध होनेपर कुन्तीके पुत्र हम सब लोगोंको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १५ ॥

न च शक्या रणे सर्वे निहन्तुममरैरपि । (यदि सर्वे हनिष्यन्ते पाण्डवाः ससुता मृधे । ततः कृत्स्नं वशे कृत्वा निःशेषं नृपमण्डलम् ॥ ससागरवनां स्फीतां विजित्य वसुधामिमाम् । विष्णुर्दास्यति कृष्णायै कुन्त्यै वा पुरुषोत्तमः ॥) य एव तेषां शेषः स्यात् स एवास्मान् न शेषयेत् ॥ १६ ॥ ‘सम्पूर्ण देवता भी समस्त पाण्डवोंको रणक्षेत्रमें नहीं मार सकते। यदि सारे पाण्डव अपने पुत्रोंसहित युद्धमें मार डाले जायँगे तो भी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण नरेशमण्डलको अपने वशमें करके समुद्र और वनोंसहित इस सारी समृद्धिशालिनी वसुधाको जीतकर द्रौपदी अथवा कुन्तीको दे डालेंगे। अथवा पाण्डवोंमेंसे जो भी शेष रह जायगा, वही हमलोगोंको शेष नहीं रहने देगा ॥ १६ ॥

सत्यप्रतिज्ञे त्वानीते पुनर्धूतेन निर्जिते । पुनर्यास्यन्त्यरण्याय पाण्डवास्तमनुव्रताः ॥ १७ ॥ ‘सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरको जीते-जी पकड़ ले आनेपर यदि उन्हें पुनः जूएमें जीत लिया जाय तो उनमें भक्ति रखनेवाले पाण्डव पुनः वनमें चले जायँगे ॥ १७ ॥

सोऽयं मम जयो व्यक्तं दीर्घकालं भविष्यति । अतो न वधमिच्छामि धर्मराजस्य कर्हिचित् ॥ १८ ॥ ‘इस प्रकार निश्चय ही मेरी विजय दीर्घकालतक बनी रहेगी। इसीलिये मैं कभी धर्मराज युधिष्ठिरका वध करना नहीं चाहता’ ॥ १८ ॥

तस्य जिह्ममभिप्रायं ज्ञात्वा द्रोणोऽथ तत्त्ववित् । तं वरं सान्तरं तस्मै ददौ संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥ १९ ॥ राजन्! द्रोणाचार्य प्रत्येक बातके वास्तविक तात्पर्यको तत्काल समझ लेनेवाले थे। दुर्योधनके उस कुटिल मनोभावको जानकर बुद्धिमान् द्रोणने मन-ही-मन कुछ विचार किया और अन्तर रखकर उसे वर दिया ॥ १९ ॥

द्रोण उवाच न चेद् युधिष्ठिरं वीरः पालयत्यर्जुनो युधि । मन्यस्व पाण्डवश्रेष्ठमानीतं वशमात्मनः ॥ २० ॥

द्रोणाचार्य बोले— राजन्! यदि वीरवर अर्जुन युद्धमें युधिष्ठिरकी रक्षा न करते हों, तब तुम पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको अपने वशमें आया हुआ ही समझो॥ २०॥
न हि शक्यो रणे पार्थः सेन्द्रैर्देवासुरैरपि।
प्रत्युद्द्यातुमदस्तत्तात नैतदामर्षयाम्यहम्॥ २१॥
तात! रणक्षेत्रमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी अर्जुनका सामना नहीं कर सकते हैं। अतः मुझमें भी उन्हें जीतनेका उत्साह नहीं है॥ २१॥
असंशयं स मे शिष्यो मत्पूर्वश्वास्त्रकर्मणि।
तरुणः सुकृतैर्युक्त एकायनगतश्च ह॥ २२॥
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च भूयः स समवाप्तवान्।
अमर्षितश्च ते राजंस्ततो नामर्षयाम्यहम्॥ २३॥
इसमें संदेह नहीं कि अर्जुन मेरा शिष्य है और उसने पहले मुझसे ही अस्त्रविद्या सीखी है, तथापि वह तरुण है। अनेक प्रकारके पुण्य कर्मोंसे युक्त है। विजय अथवा मृत्यु—इन दोनोंमेंसे एकका वरण करनेका दृढ़ निश्चय कर चुका है। इन्द्र और रुद्र आदि देवताओंसे पुनः बहुत-से दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा पा चुका है और तुम्हारे प्रति उसका अमर्ष बढ़ा हुआ है। इसलिये राजन्! मैं अर्जुनसे लड़नेका उत्साह नहीं रखता हूँ॥ २२-२३॥
स चापक्रम्यतां युद्धाद् येनोपायेन शक्यते।
अपनीते ततः पार्थे धर्मराजो जितस्त्वया॥ २४॥
अतः जिस उपायसे भी सम्भव हो, तुम उन्हें युद्धसे दूर हटा दो। कुन्तीकुमार अर्जुनके रणक्षेत्रसे हट जानेपर समझ लो कि तुमने धर्मराजको जीत लिया॥ २४॥
ग्रहणे हि जयस्तस्य न वधे पुरुषर्षभ।
एतेन चाप्युपायेन ग्रहणं समुपैष्यसि॥ २५॥
नरश्रेष्ठ! उनको पकड़ लेनेमें ही तुम्हारी विजय है, उनके वधमें नहीं; परंतु इसी उपायसे तुम उन्हें पकड़ पाओगे॥ २५॥
अहं गृहीत्वा राजानं सत्यधर्मपरायणम्।
आनयिष्यामि ते राजन् वशमद्य न संशयः॥ २६॥
यदि स्थास्यति संग्रामे मुहूर्तमपि मेऽग्रतः।
अपनीते नरव्याघ्रे कुन्तीपुत्रे धनंजये॥ २७॥
राजन्! पुरुषसिंह कुन्तीपुत्र अर्जुनके युद्धसे हट जानेपर यदि वे दो घड़ी भी मेरे सामने संग्राममें खड़े रहेंगे तो मैं आज सत्यधर्मपरायण राजा युधिष्ठिरको पकड़कर तुम्हारे वशमें ला दूँगा, इसमें संशय नहीं है॥
फाल्गुनस्य समीपे तु न हि शक्यो युधिष्ठिरः।
ग्रहीतुं समरे राजन् सेन्द्रैरपि सुरासुरैः॥ २८॥

राजन्! अर्जुनके समीप तो समरभूमिमें इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता और असुर भी युधिष्ठिरको नहीं पकड़ सकते हैं॥ २८॥

संजय उवाच

सान्तरं तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे।
गृहीतं तममन्यन्त तव पुत्राः सुबालिशाः॥ २९॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर जब राजा युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके मूर्ख पुत्र उन्हें कैद हुआ ही मानने लगे॥ २९॥

पाण्डवेयेषु सापेक्षं द्रोणं जानाति ते सुतः।
ततः प्रतिज्ञास्थैर्यार्थं स मन्त्रो बहुलीकृतः॥ ३०॥
आपका पुत्र दुर्योधन यह जानता था कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके प्रति पक्षपात रखते हैं, अतः उसने उनकी प्रतिज्ञाको स्थिर रखनेके लिये उस गुप्त बातको भी बहुत लोगोंमें फैला दिया॥ ३०॥

ततो दुर्योधनेनापि ग्रहणं पाण्डवस्य तत्।
(स्कन्धावारेषु सर्वेषु यथास्थानेषु मारिष।)
सैन्यस्थानेषु सर्वेषु सुघोषितमरिंदम॥ ३१॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले आर्य धृतराष्ट्र! तदनन्तर दुर्योधनने युद्धकी सारी छावनियोंमें तथा सेनाके विश्राम करनेके प्रायः सभी स्थानोंपर द्रोणाचार्यकी युधिष्ठिरको पकड़ लानेकी उस प्रतिज्ञाको घोषित करवा दिया॥ ३१॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि द्रोणप्रतिज्ञायां द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें द्रोणप्रतिज्ञाविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं।)

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त्रयोदशोऽध्यायः

अर्जुनका युधिष्ठिरको आश्वासन देना तथा युद्धमें द्रोणाचार्यका पराक्रम

संजय उवाच

सान्तरे तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे ।
ततस्ते सैनिकाः श्रुत्वा तं युधिष्ठिरनिग्रहम् ॥ १ ॥
सिंहनादरवांश्चक्रुर्बाहुशब्दांश्च कृत्स्नशः ।
तच्च सर्वं यथान्यायं धर्मराजेन भारत ॥ २ ॥
आप्तैराशु परिज्ञातं भारद्वाजचिकीर्षितम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! जब द्रोणाचार्यने कुछ अन्तर रखकर राजा युधिष्ठिरको कैद करनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब आपके सैनिकोंने युधिष्ठिरके पकड़े जानेका उद्योग सुनकर जोर-जोरसे सिंहनाद करना और भुजाओंपर ताल ठोंकना आरम्भ किया। भरतनन्दन! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्र ही अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यथायोग्य सारी बातें पूर्णरूपसे जान लीं कि द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं ।। १-२ १/२ ।।

ततः सर्वान् समानाय्य भ्रातॄनन्यांश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अब्रवीद् धर्मराजस्तु धनंजयमिदं वचः ।
श्रुतं ते पुरुषव्याघ्र द्रोणस्याद्य चिकीर्षितम् ॥ ४ ॥
तब धर्मराज युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको और दूसरे राजाओंको सब ओरसे बुलवाकर धनंजय अर्जुनसे कहा—‘पुरुषसिंह! आज द्रोण क्या करना चाहते हैं, यह तुमने सुना ही होगा? ।। ३-४ ।।

यथा तन्न भवेत् सत्यं तथा नीतिर्विधीयताम् ।
सान्तरं हि प्रतिज्ञातं द्रोणेनामित्रकर्षिणा ॥ ५ ॥
‘अतः तुम ऐसी नीति बताओ, जिससे उनकी इच्छा सफल न हो। शत्रुसूदन द्रोणने कुछ अन्तर रखकर प्रतिज्ञा की है ।। ५ ।।

तच्चान्तरं महेष्वास त्वयि तेन समाहितम् ।
स त्वमद्य महाबाहो युध्यस्व मदनन्तरम् ॥ ६ ॥
यथा दुर्योधनः कामं नेमं द्रोणादवाप्नुयात् ।
‘महाधनुर्धर अर्जुन! वह अन्तर उन्होंने तुम्हींपर डाल रखा है। अतः महाबाहो! आज तुम मेरे समीप रहकर ही युद्ध करो, जिससे दुर्योधन द्रोणाचार्यसे अपने इस मनोरथको पूर्ण न करा सके’ ।। ६ १/२ ।।

अर्जुन उवाच

यथा मे न वधः कार्य आचार्यस्य कदाचन ॥ ७ ॥ तथा तव परित्यागो न मे राजंश्चिकीर्षितः । **अर्जुन बोले—**राजन्! जिस प्रकार मेरे लिये आचार्यका कभी वध न करना कर्तव्य है, उसी प्रकार किसी भी दशामें आपका परित्याग करना मुझे अभीष्ट नहीं है ॥

अप्येवं पाण्डव प्राणानुत्सृजेयमहं युधि ॥ ८ ॥ प्रतीपो नाहमाचार्ये भवेयं वै कथंचन । पाण्डुनन्दन! इस नीतिके अनुसार बर्ताव करते हुए मैं युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा; परंतु किसी प्रकार भी आचार्यका शत्रु नहीं बनूँगा ॥ ८ १/२ ॥

त्वां निगृह्याहवे राज्यं धार्तराष्ट्रोऽयमिच्छति ॥ ९ ॥ न स तं जीवलोकेऽस्मिन् कामं प्राप्स्येत् कथंचन । महाराज! यह धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जो आपको युद्धमें कैद करके सारा राज्य हथिया लेना चाहता है, वह इस जगत्में अपने उस मनोरथको किसी प्रकार पूर्ण नहीं कर सकता ॥ ९ १/२ ॥

प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १० ॥ न त्वां द्रोणो निगृह्णीयाज्जीवमाने मयि ध्रुवम् । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े और पृथ्वीके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ, तो भी मेरे जीते-जी द्रोणाचार्य आपको पकड़ नहीं सकते; यह ध्रुव सत्य है ॥ १० १/२ ॥

यदि तस्य रणे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ११ ॥ विष्णुर्वा सहितो देवैर्न त्वां प्राप्स्यत्यसौ मृधे । मयि जीवति राजेन्द्र न भयं कर्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ द्रोणादस्त्रभृतां श्रेष्ठात् सर्वशस्त्रभृतामपि । राजेन्द्र! यदि रणक्षेत्रमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र अथवा भगवान् विष्णु सम्पूर्ण देवताओंके साथ आकर दुर्योधनकी सहायता करें, तो भी मेरे जीते-जी वह आपको पकड़ नहीं सकेगा; अतः आपको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे भय नहीं करना चाहिये ॥ ११-१२ १/२ ॥

अन्यच्च ब्रूयां राजेन्द्र प्रतिज्ञां मम निश्चलाम् ॥ १३ ॥ न स्मराम्यनृतं तावन्न स्मरामि पराजयम् । न स्मरामि प्रतिश्रुत्य किंचिदप्यनृतं कृतम् ॥ १४ ॥ महाराज! मैं अपनी दूसरी भी निश्चल प्रतिज्ञा आपको सुनाता हूँ। मैंने कभी झूठ कहा हो, इसका स्मरण नहीं है। मेरी कहीं पराजय हुई हो, इसकी भी याद नहीं है और मैंने

प्रतिज्ञा करके उसे तनिक भी झूठी कर दिया हो, इसका भी मुझे स्मरण नहीं है॥ १३-१४॥

संजय उवाच

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
प्रावाद्यन्त महाराज पाण्डवानां निवेशने ॥ १५ ॥
सिंहनादश्च संजज्ञे पाण्डवानां महात्मनाम् ।
धनुर्ज्यातालशब्दश्च गगनस्पृक् सुभैरवः ॥ १६ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! तदनन्तर पाण्डवोंके शिविरमें शंख, भेरी, मृदंग और आनक आदि बाजे बजने लगे। महात्मा पाण्डवोंका सिंहनाद सहसा प्रकट हुआ। धनुषकी टंकारका भयंकर शब्द आकाशमें गूँजने लगा ॥ १५-१६ ॥

श्रुत्वा शङ्खस्य निर्घोषं पाण्डवस्य महौजसः ।
त्वदीयेष्वप्यनीकेषु वादित्राण्यभिजघ्निरे ॥ १७ ॥
महातेजस्वी पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनामें वह शंखध्वनि सुनकर आपकी सेनाओंमें भी भाँति-भाँतिके बाजे बजने लगे ॥ १७ ॥

ततो व्यूढान्यनीकानि तव तेषां च भारत ।
शनैरुपेयुरन्योन्यं योध्यमानानि संयुगे ॥ १८ ॥
भारत! तदनन्तर आपकी और उनकी भी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर धीरे-धीरे युद्धके लिये एक-दूसरीके समीप आने लगीं ॥ १८ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
पाण्डवानां कुरूणां च द्रोणपाञ्चाल्ययोरपि ॥ १९ ॥
तदनन्तर कौरवों तथा पाण्डवोंमें और द्रोणाचार्य तथा धृष्टद्युम्नमें रोमांचकारी भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १९ ॥

यत्नमानाः प्रयत्नेन द्रोणानीकविशातने ।
न शेकुः सृञ्जया युद्धे तद्धि द्रोणेन पालितम् ॥ २० ॥
सृंजय योद्धा उस युद्धमें द्रोणाचार्यकी सेनाका विनाश करनेके लिये बड़े यत्नके साथ चेष्टा करने लगे, परंतु सफल न हो सके; क्योंकि वह सेना आचार्य द्रोणके द्वारा भली-भाँति सुरक्षित थी ॥ २० ॥

तथैव तव पुत्रस्य रथोदाराः प्रहारिणः ।
न शेकुः पाण्डवीं सेनां पाल्यमानां किरीटिना ॥ २१ ॥
इसी प्रकार आपके पुत्रकी सेनाके उदार महारथी, जो प्रहार करनेमें कुशल थे, पाण्डव-सेनाको परास्त न कर सके; क्योंकि किरीटधारी अर्जुन उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ २१ ॥

आस्तां ते स्तिमिते सेने रक्ष्यमाणे परस्परम् ।

सम्प्रसुप्ते यथा नक्तं वनराज्यौ सुपुष्पिते ॥ २२ ॥
जैसे रातमें सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित दो वनश्रेणियाँ प्रसुप्त (सिकुड़े हुए पत्तोंसे युक्त) देखी जाती हैं, उसी प्रकार वे सुरक्षित हुई दोनों सेनाएँ आमने-सामने निश्चलभावसे खड़ी थीं ॥ २२ ॥

ततो रुक्मरथो राजन्नर्केणेव विराजता ।
वरूथिना विनिष्पत्य व्यचरत् पृतनामुखे ॥ २३ ॥
राजन्! तदनन्तर सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य सूर्यके समान प्रकाशमान आवरणयुक्त रथके द्वारा आगे बढ़कर सेनाके प्रमुख भागमें विचरने लगे ॥ २३ ॥

तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।
अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे पाण्डुसृञ्जयाः ॥ २४ ॥
द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें केवल रथके द्वारा उद्यत होकर अकेले ही शीघ्रतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग कर रहे थे। उस समय पाण्डव तथा सृंजय भयके मारे उन्हें अनेक-सा मान रहे थे ॥ २४ ॥

तेन मुक्ताः शरा घोरा विचेरुः सर्वतोदिशम् ।
त्रासयन्तो महाराज पाण्डवेयस्य वाहिनीम् ॥ २५ ॥
महाराज! उनके द्वारा छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेनाको भयभीत करते हुए चारों ओर विचर रहे थे ॥ २५ ॥

मध्यंदिनमनुप्राप्तो गभस्तिशतसंवृतः ।
यथा दृश्येत धर्मांशुस्तथा द्रोणोऽप्यदृश्यत ॥ २६ ॥
दोपहरके समय सहस्रों किरणोंसे व्याप्त प्रचण्ड तेजवाले भगवान् सूर्य जैसे दिखायी देते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥

न चैनं पाण्डवेयानां कश्चिच्छक्नोति भारत ।
वीक्षितुं समरे क्रुद्धं महेन्द्रमिव दानवाः ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! जैसे दानवदल क्रोधमें भरे हुए देवराज इन्द्रकी ओर देखनेका साहस नहीं करता है, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका कोई भी वीर समरभूमिमें द्रोणाचार्यकी ओर आँख उठाकर देख न सका ॥ २७ ॥

मोहयित्वा ततः सैन्यं भारद्वाजः प्रतापवान् ।
धृष्टद्युम्नबलं तूर्णं व्यधमन्निशितैः शरैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार प्रतापी द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनाको मोहित करके पैने बाणोंद्वारा तुरंत ही धृष्टद्युम्नकी सेनाका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २८ ॥

स दिशः सर्वतो रुद्ध्वा संवृत्य खमजिह्मगैः ।
पार्षतो यत्र तत्रैव ममृदे पाण्डुवाहिनीम् ॥ २९ ॥

उन्होंने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध करके आकाशको भी आच्छादित कर दिया और जहाँ धृष्टद्युम्न खड़ा था, वहीं वे पाण्डव-सेनाका मर्दन करने लगे ।। २९ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि अर्जुनकृतयुधिष्ठिराश्वासने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अर्जुनके द्वारा युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्दशोऽध्यायः

द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता

संजय उवाच

ततः स पाण्डवानीके जनयन् सुमहद् भयम् ।
व्यचरत् पृतनां द्रोणो दहन् कक्षमिवानलः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे आग घास-फूसके समूहको जला देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य पाण्डव-दलमें महान् भय उत्पन्न करते और सारी सेनाको चलाते हुए सब ओर विचरने लगे ॥ १ ॥

निर्दहन्तमनीकानि साक्षादग्निमिवोत्थितम् ।
दृष्ट्वा रुक्मरथं क्रुद्धं समकम्पन्त सृञ्जयाः ॥ २ ॥
सुवर्णमय रथवाले द्रोणको वहाँ प्रकट हुए साक्षात् अग्निदेवके समान क्रोधमें भरकर सम्पूर्ण सेनाओंको दग्ध करते देख समस्त सृंजयवीर काँप उठे ॥ २ ॥

सततं कृष्यतः संख्ये धनुषोऽस्याशुकारिणः ।
ज्याघोषः शुश्रुवेऽत्यर्थं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ ३ ॥
बाण चलानेमें शीघ्रता करनेवाले द्रोणाचार्यके युद्धमें निरन्तर खींचे जाते हुए धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार-घोष वज्रकी गड़गड़ाहटके समान बड़े जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ३ ॥

रथिनः सादिनश्चैव नागानश्वांन् पदातिनः ।
रौद्रा हस्तवता मुक्ताः सम्मृद्नन्ति स्म सायकाः ॥ ४ ॥
शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले द्रोणाचार्यके छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डव-सेनाके रथियों, घुड़सवारों, हाथियों, घोड़ों और पैदल योद्धाओंको गर्दमें मिला रहे थे ॥ ४ ॥

नानद्यमानः पर्जन्यः प्रवृद्धः शुचिसंक्षये ।
अश्मवर्षमिवावर्षत् परेषामावहद् भयम् ॥ ५ ॥
आषाढ़ मास बीत जानेपर वर्षाके प्रारम्भमें जैसे मेघ अत्यन्त गर्जन-तर्जनके साथ फैलकर आकाशमें छा जाता और पत्थरोंकी वर्षा करने लगता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी बाणोंकी वर्षा करके शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने लगे ॥ ५ ॥

विचरन् स तदा राजन् सेनां संक्षोभयन् प्रभुः ।
वर्धयामास संत्रासं शात्रवाणाममानुषम् ॥ ६ ॥

राजन्! शक्तिशाली द्रोणाचार्य उस समय रणभूमिमें विचरते और पाण्डव-सेनाको क्षुब्ध करते हुए शत्रुओंके मनमें लोकोत्तर भयकी वृद्धि करने लगे ॥ ६ ॥ तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् । भ्रमद्रथाम्बुदे चास्मिन् दृश्यते स्म पुनः पुनः ॥ ७ ॥ उनके घूमते हुए रथरूपी मेघमण्डलमें सुवर्णभूषित धनुष विद्युत्के समान बारंबार प्रकाशित दिखायी देता था ॥ स वीरः सत्यवान् प्राज्ञो धर्मनित्यः सदा पुनः । युगान्तकालवद् घोरां रौद्रां प्रावर्तयन्नदीम् ॥ ८ ॥ उन सत्यपरायण परम बुद्धिमान् तथा नित्य धर्ममें तत्पर रहनेवाले वीर द्रोणाचार्यने उस रणक्षेत्रमें प्रलय-कालके समान अत्यन्त भयंकर रक्तकी नदी प्रवाहित कर दी ॥ ८ ॥ अमर्षवेगप्रभवां क्रव्यादगणसंकुलाम् । बलौघैः सर्वतः पूर्णां ध्वजवृक्षापहारिणीम् ॥ ९ ॥ उस नदीका प्राकट्य क्रोधके आवेगसे हुआ था। मांसभक्षी जन्तुओंसे वह घिरी हुई थी। सेनारूपी प्रवाहद्वारा वह सब ओरसे परिपूर्ण थी और ध्वजरूपी वृक्षोंको तोड़-फोड़कर बहा रही थी ॥ ९ ॥ शोणितोदां रथावर्तां हस्त्यश्वकृतरोधसम् । कवचोडुपसंयुक्तां मांसपङ्कसमाकुलाम् ॥ १० ॥ उस नदीमें जलकी जगह रक्तराशि भरी हुई थी, रथोंकी भँवरें उठ रही थीं, हाथी और घोड़ोंकी ऊँची-ऊँची लाशें उस नदीके ऊँचे किनारोंके समान प्रतीत होती थीं। उसमें कवच नावकी भाँति तैर रहे थे तथा वह मांसरूपी कीचड़से भरी हुई थी ॥ १० ॥ मेदोमज्जास्थिसिकतामुष्णीषचयफेनिलाम् । संग्रामजलदापूर्णां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् ॥ ११ ॥ मेद, मज्जा और हड्डियाँ वहाँ बालुकाराशिके समान प्रतीत होती थीं। पगड़ियोंका समूह उसमें फेनके समान जान पड़ता था। संग्रामरूपी मेघ उस नदीको रक्तकी वर्षाद्वारा भर रहा था। वह नदी प्रासरूपी मत्स्योंसे भरी हुई थी ॥ नरनागाश्वकलिलां शरवेगौघवाहिनीम् । शरीरदारुसंघट्टां रथकच्छपसंकुलाम् ॥ १२ ॥ वहाँ पैदल, हाथी और घोड़े ढेर-के-ढेर पड़े हुए थे। बाणोंका वेग ही उस नदीका प्रखर प्रवाह था, जिसके द्वारा वह प्रवाहित हो रही थी। शरीररूपी काष्ठसे ही मानो उसका घाट बनाया गया था। रथरूपी कछुओंसे वह नदी व्याप्त हो रही थी ॥ १२ ॥ उत्तमाङ्गैः पङ्कजिनीं निस्त्रिंशझषसंकुलाम् । रथनागह्रदोपेतां नानाभरणभूषिताम् ॥ १३ ॥

योद्धाओंके कटे हुए मस्तक कमल-पुष्पके समान जान पड़ते थे, जिनके कारण वह कमलवनसे सम्पन्न दिखायी देती थी। उसके भीतर असंख्य डूबती-बहती तलवारोंके कारण वह नदी मछलियोंसे भरी हुई-सी जान पड़ती थी। रथ और हाथियोंसे यत्र-तत्र घिरकर वह नदी गहरे कुण्डके रूपमें परिणत हो गयी थी। वह भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित-सी प्रतीत होती थी ॥ १३ ॥

महारथशतावर्तां भूमिरेणूर्मिमालिनीम् ।
महावीर्यवतां संख्ये सुतरां भीरुदुस्तराम् ॥ १४ ॥
सैकड़ों विशाल रथ उसके भीतर उठती हुई भँवरोंके समान प्रतीत होते थे। वह धरतीकी धूल और तरंगमालाओंसे व्याप्त हो रही थी। उस युद्धस्थलमें वह नदी महापराक्रमी वीरोंके लिये सुगमतासे पार करने-योग्य और कायरोंके लिये दुस्तर थी ॥ १४ ॥

शरीरशतसम्बाधां गृध्रकङ्कनिषेविताम् ।
महारथसहस्राणि नयन्तीं यमसादनम् ॥ १५ ॥
उसके भीतर सैकड़ों लाशें पड़ी हुई थीं। गीध और कंक उस नदीका सेवन करते थे। वह सहस्रों महारथियोंको यमराजके लोकमें ले जा रही थी ॥ १५ ॥

शूलव्यालसमाकीर्णां प्राणिवाजिनिषेविताम् ।
छिन्नक्षत्रमहाहंसां मुकुताण्डजसेविताम् ॥ १६ ॥
उसके भीतर शूल सर्पोंके समान व्याप्त हो रहे थे। विभिन्न प्राणी ही वहाँ चल-पक्षीके रूपमें निवास करते थे। कटे हुए क्षत्रिय-समुदाय उसमें विचरनेवाले बड़े-बड़े हंसोंके समान प्रतीत होते थे। वह नदी राजाओंके मुकुटरूपी जलपक्षियोंसे सेवित दिखायी देती थी ॥ १६ ॥

चक्रकूर्मां गदानक्रां शरक्षुद्रझषाकुलाम् ।
बकगृध्रसृगालानां घोरसंघैर्निषेविताम् ॥ १७ ॥
उसमें रथोंके पहिये कछुओंके समान, गदाएँ नाकोंके समान और बाण छोटी-छोटी मछलियोंके समान भरे हुए थे। बगलों, गीधों और गीदड़ोंके भयानक समुदाय उसके तटपर निवास करते थे ॥ १७ ॥

निहतान् प्राणिनः संख्ये द्रोणेन बलिना रणे ।
वहन्तीं पितृलोकाय शतशो राजसत्तम ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! बलवान् द्रोणाचार्यके द्वारा रणभूमिमें मारे गये सैकड़ों प्राणियोंको वह पितृलोकमें पहुँचा रही थी ॥

शरीरशतसम्बाधां केशशैवलशाद्वलाम् ।
नदीं प्रावर्तयद् राजन् भीरूणां भयवर्धिनीम् ॥ १९ ॥

उसके भीतर सैकड़ों लाशें बह रही थीं। केश सेवार तथा घासोंके समान प्रतीत होते थे। राजन्! इस प्रकार द्रोणाचार्यने वहाँ खूनकी नदी बहायी थी, जो कायरोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १९ ॥ तर्जयन्तमनीकानि तानि तानि महारथम् । सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ २० ॥ उस समय समस्त सेनाओंको अपने गर्जन-तर्जनसे डराते हुए महारथी द्रोणाचार्यपर युधिष्ठिर आदि योद्धा सब ओरसे टूट पड़े ॥ २० ॥ तानभिद्रवतः शूरांस्तावका दृढविक्रमाः । सर्वतः प्रत्यगृह्णन्त तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ २१ ॥ उन आक्रमण करनेवाले पाण्डव वीरोंको आपके सुदृढ़ पराक्रमी सैनिकोंने सब ओरसे रोक दिया। उस समय दोनों दलोंमें रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ २१ ॥ शतमायस्तु शकुनिः सहदेवं समाद्रवत् । सनियन्तृध्वजरथं विव्याध निशितैः शरैः ॥ २२ ॥ सैकड़ों मायाओंको जाननेवाले शकुनिने सहदेवपर धावा किया और उनके सारथि, ध्वज एवं रथसहित उन्हें अपने पैने बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २२ ॥ तस्य माद्रीसुतः केतुं धनुः सूतं हयानपि । नातिक्रुद्धः शरैश्छित्त्वा षष्ट्या विव्याध सौबलम् ॥ २३ ॥ तब माद्रीकुमार सहदेवने अधिक कुपित न होकर शकुनिके ध्वज, धनुष, सारथि और घोड़ोंको अपने बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न करके साठ बाणोंसे सुबलपुत्र शकुनिको भी बींध डाला ॥ २३ ॥ सौबलस्तु गदां गृह्य प्रचस्कन्द रथोत्तमात् । स तस्य गदया राजन् रथात् सूतमपातयत् ॥ २४ ॥ यह देख सुबलपुत्र शकुनि गदा हाथमें लेकर उस श्रेष्ठ रथसे कूद पड़ा। राजन्! उसने अपनी गदाद्वारा सहदेवके रथसे उनके सारथिको मार गिराया ॥ २४ ॥ ततस्तौ विरथौ राजन् गदाहस्तौ महाबलौ । चिक्रीडतू रणे शूरौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ॥ २५ ॥ महाराज! उस समय वे दोनों महाबली शूरवीर रथहीन हो गदा हाथमें लेकर रणक्षेत्रमें खेल-सा करने लगे, मानो शिखरवाले दो पर्वत परस्पर टकरा रहे हों ॥ २५ ॥ द्रोणः पाञ्चालराजानं विद्ध्वा दशभिराशुगैः । बहुभिस्तेन चाभ्यस्तस्तं विव्याध ततोऽधिकैः ॥ २६ ॥ द्रोणाचार्यने पांचालराज द्रुपदको दस शीघ्रगामी बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रुपदने भी बहुत-से बाणोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया। तब द्रोणने भी और अधिक सायकोंद्वारा द्रुपदको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २६ ॥

विविंशतिं भीमसेनो विंशत्या निशितैः शरैः ।
विद्ध्वा नाकम्पयद् वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २७ ॥

वीर भीमसेन बीस तीखे बाणोंद्वारा विविंशतिको घायल करके भी उन्हें विचलित न कर सके। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ २७ ॥
विविंशतिस्तु सहसा व्यश्वकेतुशरासनम् ।
भीमं चक्रे महाराज ततः सैन्यान्यपूजयन् ॥ २८ ॥

महाराज! फिर विविंशतिने भी सहसा आक्रमण करके भीमसेनके घोड़े, ध्वज और धनुष काट डाले; यह देख सारी सेनाओंने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २८ ॥
स तन्न ममृषे वीरः शत्रोर्विक्रममाहवे ।
ततोऽस्य गदया दान्तान् हयान् सर्वानपातयत् ॥ २९ ॥

वीर भीमसेन युद्धमें शत्रुके इस पराक्रमको न सह सके। उन्होंने अपनी गदाद्वारा उसके समस्त सुशिक्षित घोड़ोंको मार डाला ॥ २९ ॥
हताश्वात् सरथाद् राजन् गृह्य चर्म महाबलः ।
अभ्यायाद् भीमसेनं तु मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥ ३० ॥

राजन्! घोड़ोंके मारे जानेपर महाबली विविंशति ढाल और तलवार लिये रथसे कूद पड़ा और जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त गजराजपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने भीमसेनपर चढ़ाई की ॥ ३० ॥
शल्यस्तु नकुलं वीरः स्वस्त्रीयं प्रियमात्मनः ।
विव्याध प्रहसन् बाणैर्लालयन् कोपयन्निव ॥ ३१ ॥

वीर राजा शल्यने अपने प्यारे भानजे नकुलको हँसकर लाड़ लड़ाते और कुपित करते हुए-से अनेक बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ३१ ॥
तस्याश्वानासपत्रं च ध्वजं सूतमथो धनुः ।
निपात्य नकुलः संख्ये शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ ३२ ॥

तब प्रतापी नकुलने उस युद्धस्थलमें शल्यके घोड़ों, छत्र, ध्वज, सारथि और धनुषको काट गिराया और विजयी होकर अपना शंख बजाया ॥ ३२ ॥
धृष्टकेतुः कृपेणास्तान् छित्त्वा बहुविधाञ्छरान् ।
कृपं विव्याध सप्तत्या लक्ष्म चास्याहरत् त्रिभिः ॥ ३३ ॥

धृष्टकेतुने कृपाचार्यके चलाये हुए अनेक बाणोंको काटकर उन्हें सत्तर बाणोंसे घायल कर दिया और तीन बाणोंद्वारा उनके चिह्नस्वरूप ध्वजको भी काट गिराया ॥ ३३ ॥
तं कृपः शरवर्षेण महता समवारयत् ।
विव्याध च रणे विप्रो धृष्टकेतुममर्षणम् ॥ ३४ ॥

तब ब्राह्मण कृपाचार्यने भारी बाण-वर्षाके द्वारा अमर्षशील धृष्टकेतुको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोका और घायल कर दिया ॥ ३४ ॥

सात्यकिः कृतवर्माणं नाराचेन स्तनान्तरे । विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या पुनरन्यैः स्मयन्निव ॥ ३५ ॥ सात्यकिने मुसकराते हुए-से एक नाराचद्वारा कृतवर्माकी छातीमें चोट की और पुनः अन्य सत्तर बाणोंद्वारा उसे क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ३५ ॥

तं भोजः सप्तसप्तत्या विद्ध्वाऽऽशु निशितैः शरैः । नाकम्पयत शैनेयं शीघ्रो वायुरिवाचलम् ॥ ३६ ॥ तब भोजवंशी कृतवर्माने तुरंत ही सतहत्तर पैने बाणोंद्वारा सात्यकिको बींध डाला, तथापि वह उन्हें विचलित न कर सका। जैसे तेज चलनेवाली वायु पर्वतको नहीं हिला पाती है ॥ ३६ ॥

सेनापतिः सुशर्माणं भृशं मर्मस्वताडयत् । स चापि तं तोमरेण जत्रुदेशेऽभ्यताडयत् ॥ ३७ ॥ दूसरी ओर सेनापति धृष्टद्युम्नने त्रिगर्तराज सुशर्माको उसके मर्मस्थानोंमें अत्यन्त चोट पहुँचायी। यह देख सुशर्माने भी तोमरद्वारा धृष्टद्युम्नके गलेकी हँसलीपर प्रहार किया ॥ ३७ ॥

वैकर्तनं तु समरे विराटः प्रत्यवारयत् । सह मत्स्यैर्महावीर्यैस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३८ ॥ समरभूमिमें महापराक्रमी मत्स्यदेशीय वीरोंके साथ विराटने विकर्तनपुत्र कर्णको रोका। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ ३८ ॥

तत् पौरुषमभूत् तत्र सूतपुत्रस्य दारुणम् । यत् सैन्यं वारयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३९ ॥ वहाँ सूतपुत्र कर्णका भयंकर पुरुषार्थ प्रकट हुआ। उसने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उनकी समस्त सेनाकी प्रगति रोक दी ॥ ३९ ॥

द्रुपदस्तु स्वयं राजा भगदत्तेन संगतः । तयोर्युद्धं महाराज चित्ररूपमिवाभवत् ॥ ४० ॥ महाराज! तदनन्तर राजा द्रुपद स्वयं जाकर भगदत्तसे भिड़ गये। महाराज! फिर उन दोनोंमें विचित्र-सा युद्ध होने लगा ॥ ४० ॥

भगदत्तस्तु राजानं द्रुपदं नतपर्वभिः । सनियन्तृध्वजरथं विव्याध पुरुषर्षभः ॥ ४१ ॥ पुरुषश्रेष्ठ भगदत्तने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे राजा द्रुपदको उनके सारथि, रथ और ध्वजसहित बींध डाला ॥

द्रुपदस्तु ततः क्रुद्धो भगदत्तं महारथम् । आजघानोरसि क्षिप्रं शरेणानतपर्वणा ॥ ४२ ॥