भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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चतुर्दशोऽध्यायः

द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता

संजय उवाच

ततः स पाण्डवानीके जनयन् सुमहद् भयम् ।
व्यचरत् पृतनां द्रोणो दहन् कक्षमिवानलः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे आग घास-फूसके समूहको जला देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य पाण्डव-दलमें महान् भय उत्पन्न करते और सारी सेनाको चलाते हुए सब ओर विचरने लगे ॥ १ ॥

निर्दहन्तमनीकानि साक्षादग्निमिवोत्थितम् ।
दृष्ट्वा रुक्मरथं क्रुद्धं समकम्पन्त सृञ्जयाः ॥ २ ॥
सुवर्णमय रथवाले द्रोणको वहाँ प्रकट हुए साक्षात् अग्निदेवके समान क्रोधमें भरकर सम्पूर्ण सेनाओंको दग्ध करते देख समस्त सृंजयवीर काँप उठे ॥ २ ॥

सततं कृष्यतः संख्ये धनुषोऽस्याशुकारिणः ।
ज्याघोषः शुश्रुवेऽत्यर्थं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ ३ ॥
बाण चलानेमें शीघ्रता करनेवाले द्रोणाचार्यके युद्धमें निरन्तर खींचे जाते हुए धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार-घोष वज्रकी गड़गड़ाहटके समान बड़े जोर-जोरसे सुनायी दे रहा था ॥ ३ ॥

रथिनः सादिनश्चैव नागानश्वांन् पदातिनः ।
रौद्रा हस्तवता मुक्ताः सम्मृद्नन्ति स्म सायकाः ॥ ४ ॥
शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले द्रोणाचार्यके छोड़े हुए भयंकर बाण पाण्डव-सेनाके रथियों, घुड़सवारों, हाथियों, घोड़ों और पैदल योद्धाओंको गर्दमें मिला रहे थे ॥ ४ ॥

नानद्यमानः पर्जन्यः प्रवृद्धः शुचिसंक्षये ।
अश्मवर्षमिवावर्षत् परेषामावहद् भयम् ॥ ५ ॥
आषाढ़ मास बीत जानेपर वर्षाके प्रारम्भमें जैसे मेघ अत्यन्त गर्जन-तर्जनके साथ फैलकर आकाशमें छा जाता और पत्थरोंकी वर्षा करने लगता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य भी बाणोंकी वर्षा करके शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करने लगे ॥ ५ ॥

विचरन् स तदा राजन् सेनां संक्षोभयन् प्रभुः ।
वर्धयामास संत्रासं शात्रवाणाममानुषम् ॥ ६ ॥