भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

राजन्! शक्तिशाली द्रोणाचार्य उस समय रणभूमिमें विचरते और पाण्डव-सेनाको क्षुब्ध करते हुए शत्रुओंके मनमें लोकोत्तर भयकी वृद्धि करने लगे ॥ ६ ॥ तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् । भ्रमद्रथाम्बुदे चास्मिन् दृश्यते स्म पुनः पुनः ॥ ७ ॥ उनके घूमते हुए रथरूपी मेघमण्डलमें सुवर्णभूषित धनुष विद्युत्के समान बारंबार प्रकाशित दिखायी देता था ॥ स वीरः सत्यवान् प्राज्ञो धर्मनित्यः सदा पुनः । युगान्तकालवद् घोरां रौद्रां प्रावर्तयन्नदीम् ॥ ८ ॥ उन सत्यपरायण परम बुद्धिमान् तथा नित्य धर्ममें तत्पर रहनेवाले वीर द्रोणाचार्यने उस रणक्षेत्रमें प्रलय-कालके समान अत्यन्त भयंकर रक्तकी नदी प्रवाहित कर दी ॥ ८ ॥ अमर्षवेगप्रभवां क्रव्यादगणसंकुलाम् । बलौघैः सर्वतः पूर्णां ध्वजवृक्षापहारिणीम् ॥ ९ ॥ उस नदीका प्राकट्य क्रोधके आवेगसे हुआ था। मांसभक्षी जन्तुओंसे वह घिरी हुई थी। सेनारूपी प्रवाहद्वारा वह सब ओरसे परिपूर्ण थी और ध्वजरूपी वृक्षोंको तोड़-फोड़कर बहा रही थी ॥ ९ ॥ शोणितोदां रथावर्तां हस्त्यश्वकृतरोधसम् । कवचोडुपसंयुक्तां मांसपङ्कसमाकुलाम् ॥ १० ॥ उस नदीमें जलकी जगह रक्तराशि भरी हुई थी, रथोंकी भँवरें उठ रही थीं, हाथी और घोड़ोंकी ऊँची-ऊँची लाशें उस नदीके ऊँचे किनारोंके समान प्रतीत होती थीं। उसमें कवच नावकी भाँति तैर रहे थे तथा वह मांसरूपी कीचड़से भरी हुई थी ॥ १० ॥ मेदोमज्जास्थिसिकतामुष्णीषचयफेनिलाम् । संग्रामजलदापूर्णां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् ॥ ११ ॥ मेद, मज्जा और हड्डियाँ वहाँ बालुकाराशिके समान प्रतीत होती थीं। पगड़ियोंका समूह उसमें फेनके समान जान पड़ता था। संग्रामरूपी मेघ उस नदीको रक्तकी वर्षाद्वारा भर रहा था। वह नदी प्रासरूपी मत्स्योंसे भरी हुई थी ॥ नरनागाश्वकलिलां शरवेगौघवाहिनीम् । शरीरदारुसंघट्टां रथकच्छपसंकुलाम् ॥ १२ ॥ वहाँ पैदल, हाथी और घोड़े ढेर-के-ढेर पड़े हुए थे। बाणोंका वेग ही उस नदीका प्रखर प्रवाह था, जिसके द्वारा वह प्रवाहित हो रही थी। शरीररूपी काष्ठसे ही मानो उसका घाट बनाया गया था। रथरूपी कछुओंसे वह नदी व्याप्त हो रही थी ॥ १२ ॥ उत्तमाङ्गैः पङ्कजिनीं निस्त्रिंशझषसंकुलाम् । रथनागह्रदोपेतां नानाभरणभूषिताम् ॥ १३ ॥