महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदुर्योधन मोहवश सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् केशवको नहीं जानता है, वह दैवयोगसे मोहित हो मौतके फंदेमें फँस गया ॥ ४० ॥ न वेद कृष्णं दाशार्हमर्जुनं चैव पाण्डवम् । पूर्वदेवौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ॥ ४१ ॥ यह दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुनको नहीं जानता है, वे दोनों पूर्वदेवता महात्मा नर और नारायण हैं ॥ एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि । मनसाऽपि हि दुर्धर्षौ सेनामेतां यशस्विनौ ॥ ४२ ॥ नाशयेतामिहेच्छन्तौ मानुषत्वाच्च नेच्छतः । उनकी आत्मा तो एक है; परंतु इस भूतलके मनुष्योंको वे शरीरसे दो होकर दिखायी देते हैं। उन्हें मनसे भी पराजित नहीं किया जा सकता। वे यशस्वी श्रीकृष्ण और अर्जुन यदि इच्छा करें तो मेरी सेनाको तत्काल नष्ट कर सकते हैं; परंतु मानवभावका अनुसरण करनेके कारण ये वैसी इच्छा नहीं करते हैं ॥ ४२ १/२ ॥ युगस्येव विपर्यासो लोकानामिव मोहनम् ॥ ४३ ॥ भीष्मस्य च वधस्तात द्रोणस्य च महात्मनः । तात! भीष्म तथा महात्मा द्रोणका वध युगके उलट जानेकी-सी बात है। सम्पूर्ण लोकोंको यह घटना मानो मोहमें डालनेवाली है ॥ ४३ १/२ ॥ न ह्येव ब्रह्मचर्येण न वेदाध्ययनेन च ॥ ४४ ॥ न क्रियाभिर्न चास्त्रेण मृत्योः कश्चिन्निवार्यते । जान पड़ता है, कोई भी न तो ब्रह्मचर्यके पालनसे, न वेदोंके स्वाध्यायसे, न कर्मोंके अनुष्ठानसे और न अस्त्रोंके प्रयोगसे ही अपनेको मृत्युसे बचा सकता है ॥ ४४ १/२ ॥ लोकसम्भावितौ वीरौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ॥ ४५ ॥ भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा किं नु जीवामि संजय । संजय! लोकसम्मानित, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा युद्धदुर्मद वीरवर भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ ४५ १/२ ॥ यां तां श्रियमसूयामः पुरा दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ॥ ४६ ॥ अद्य तामनुजानीमो भीष्मद्रोणवधेन ह । पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिरके पास जिस प्रसिद्ध राजलक्ष्मीको देखकर हमलोग उनसे डाह करने लगे थे, आज भीष्म और द्रोणाचार्यके वधसे हम उसके कटु फलका अनुभव कर रहे हैं ॥ ४६ १/२ ॥ मत्कृते चाप्यनुप्राप्तः कुरूणामेष संक्षयः ॥ ४७ ॥ पक्वानां हि वधे सूत वज्रायन्ते तृणान्युत ।