महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1023, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिनक्षयं प्राप्य नरप्रवीर ध्रुवो हि नः कर्ण जयो भविष्यति ॥ १३ ॥ ‘नरवीर! अब दिनका थोड़ा-सा ही भाग शेष है। तुम अपने बाणसमूहोंद्वारा इस समय शत्रुको घायल करके उसके कार्यमें बाधा डालो। मनुष्यलोकके प्रमुख वीर कर्ण! दिन समाप्त होनेपर तो निश्चय ही हमारी विजय हो जायगी ॥ १३ ॥
सैन्धवे रक्ष्यमाणे तु सूर्यस्यास्तमनं प्रति । मिथ्याप्रतिज्ञः कौन्तेयः प्रवेक्ष्यति हुताशनम् ॥ १४ ॥ ‘सूर्यास्त होनेतक यदि सिंधुराज सुरक्षित रहे तो प्रतिज्ञा झूठी होनेके कारण अर्जुन अग्निमें प्रवेश कर जायँगे ॥ १४ ॥
अनर्जुनायां च भुवि मुहूर्तमपि मानद । जीवितुं नोत्सहेरन् वै भ्रातरोऽस्य सहानुगाः ॥ १५ ॥ ‘मानद! फिर अर्जुनरहित भूतलपर उनके भाई और अनुगामी सेवक दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकते ॥ १५ ॥
विनष्टैः पाण्डवैश्च सशैलवनकाननाम् । वसुंधरामिमां कर्ण भोक्ष्यामो हतकण्टकाम् ॥ १६ ॥ ‘कर्ण! पाण्डवोंके नष्ट हो जानेपर हमलोग पर्वत, वन और काननोंसहित इस निष्कण्टक वसुधाका राज्य भोगेंगे ॥ १६ ॥
दैवेनोपहतः पार्थो विपरीतश्च मानद । कार्याकार्यमजानानः प्रतिज्ञां कृतवान् रणे ॥ १७ ॥ ‘मानद! दैवके मारे हुए अर्जुनकी बुद्धि विपरीत हो गयी थी। इसीलिये कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करके उन्होंने रणभूमिमें जयद्रथको मारनेकी प्रतिज्ञा कर ली ॥ १७ ॥
नूनमात्मविनाशाय पाण्डवेन किरीटिना । प्रतिज्ञेयं कृता कर्ण जयद्रथवधं प्रति ॥ १८ ॥ ‘कर्ण! निश्चय ही किरीटधारी पाण्डव अर्जुनने अपने ही विनाशके लिये जयद्रथ-वधकी यह प्रतिज्ञा कर डाली है ॥ १८ ॥
कथं जीवति दुर्धर्षे त्वयि राधेय फाल्गुनः । अनस्तंगत आदित्ये हन्यात् सैन्धवकं नृपम् ॥ १९ ॥ ‘राधानन्दन! तुम-जैसे दुर्धर्ष वीरके जीते-जी अर्जुन सिंधुराजको सूर्यास्त होनेसे पहले ही कैसे मार सकेंगे? ॥ १९ ॥
रक्षितं मद्रराजेन कृपेण च महात्मना । जयद्रथं रणमुखे कथं हन्याद् धनंजयः ॥ २० ॥