महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'मद्रराज शल्य और महामना कृपाचार्यसे सुरक्षित हुए जयद्रथको अर्जुन युद्धके मुहानेपर कैसे मार सकेंगे? ॥ २० ॥
द्रौणिना रक्ष्यमाणं च मया दुःशासनेन च । कथं प्राप्स्यति बीभत्सुः सैन्धवं कालचोदितः ॥ २१ ॥ 'मैं, दुःशासन तथा अश्वत्थामा जिनकी रक्षा कर रहे हैं, उन सिंधुराज जयद्रथको अर्जुन कैसे प्राप्त कर सकेंगे? जान पड़ता है कि वे कालसे प्रेरित हो रहे हैं ।।
युध्यन्ते बहवः शूरा लम्बते च दिवाकरः । शङ्के जयद्रथं पार्थो नैव प्राप्स्यति मानद ॥ २२ ॥ 'मानद! बहुत-से शूरवीर युद्ध कर रहे हैं, उधर सूर्य भी अस्ताचलपर जा रहे हैं। अतः मुझे संदेह यह होता है कि अर्जुन जयद्रथतक नहीं पहुँच पायेंगे ।। २२ ।।
स त्वं कर्ण मया सार्धं शूरैश्चान्यैर्महारथैः । द्रौणिना त्वं हि सहितो मद्वेशेन कृपेण च ॥ २३ ॥ युध्यस्व यत्नमास्थाय परं पार्थेन संयुगे । 'कर्ण! तुम मेरे, अश्वत्थामाके, मद्रराज शल्यके, कृपाचार्यके तथा अन्य शूरवीर महारथियोंके साथ पूरा प्रयत्न करके रणक्षेत्रमें अर्जुनके साथ युद्ध करो' ॥ २३ १/२ ॥
एवमुक्तस्तु राधेयस्तव पुत्रेण मारिष ॥ २४ ॥ दुर्योधनमिदं वाक्यं प्रत्युवाच कुरूत्तमम् । आर्य! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर राधानन्दन कर्णने कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनसे इस प्रकार कहा - ॥ २४ १/२ ॥
दृढलक्ष्येण वीरेण भीमसेनेन धन्विना ॥ २५ ॥ भृशं भिन्नतनुः संख्ये शरजालैरनेकशः । स्थातव्यमिति तिष्ठामि रणे सम्प्रति मानद ॥ २६ ॥ 'मानद! सुदृढ़ लक्ष्यवाले वीर धनुर्धर भीमसेनने संग्राममें अपने बाणसमूहोंद्वारा अनेक बार मेरे शरीरको अत्यन्त क्षत-विक्षत कर दिया है। मुझे खड़ा रहना चाहिये (भागना नहीं चाहिये), यह सोचकर ही इस समय मैं रणभूमिमें ठहरा हुआ हूँ ।। २५-२६ ।।
नाङ्गमङ्गति किंचिन्मे संतप्तस्य महेषुभिः । योत्स्यामि तु यथाशक्त्या त्वदर्थं जीवितं मम ॥ २७ ॥ 'इस समय मेरा कोई भी अंग किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं कर रहा है। मैं बड़े-बड़े बाणोंकी आगसे संतप्त हूँ, तथापि यथाशक्ति युद्ध करूँगा; क्योंकि यह मेरा जीवन तुम्हारे लिये ही है ।। २७ ।।
यथा पाण्डवमुख्योऽसौ न हनिष्यति सैन्धवम् । न हि मे युध्यमानस्य सायकानस्यतः शितान् ॥ २८ ॥ सैन्धवं प्राप्स्यते वीरः सव्यसाची धनंजयः ।