भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1025, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1025

‘पाण्डवोंके प्रधान वीर अर्जुन जैसे भी किसी तरह सिंधुराजको नहीं मार सकेंगे, वैसा प्रयत्न करूँगा। जबतक मैं युद्धमें तत्पर होकर पैने बाण छोड़ता रहूँगा, तबतक सव्यसाची वीर धनंजय सिंधुराजको नहीं पा सकेंगे।। २८½ ।। यत्तू भक्तिमता कार्यं सततं हितकाङ्क्षिणा ।। २९ ।। तत् करिष्यामि कौरव्य जयो दैवे प्रतिष्ठितः । ‘कुरुनन्दन! सदा मित्रका हित चाहनेवाले भक्तिमान् पुरुषको जो कार्य करना चाहिये, वह मैं करूँगा। विजयकी प्राप्ति तो दैवके अधीन है।। २९½ ।। सैन्धवार्थे परं यत्नं करिष्याम्यद्य संयुगे ।। ३० ।। त्वत्प्रियार्थं महाराज जयो दैवे प्रतिष्ठितः । ‘महाराज! आज युद्धस्थलमें आपका प्रिय करनेके लिये मैं सिंधुराजकी रक्षाके निमित्त पूरा प्रयत्न करूँगा। विजय तो दैवके अधीन है।। ३०½ ।। अद्य योत्स्येऽर्जुनमहं पौरुषं स्वं व्यपाश्रितः ।। ३१ ।। त्वदर्थे पुरुषव्याघ्र जयो दैवे प्रतिष्ठितः । ‘पुरुषसिंह! आज मैं अपने पुरुषार्थका भरोसा करके तुम्हारे हितके लिये अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा। विजयकी प्राप्ति तो दैवके अधीन है।। ३१½ ।। अद्य युद्धं कुरुश्रेष्ठ मम पार्थस्य चोभयोः ।। ३२ ।। पश्यन्तु सर्वसैन्यानि दारुणं लोमहर्षणम् । ‘कुरुश्रेष्ठ! आज सारी सेनाएँ मेरे और अर्जुन दोनोंके भयंकर एवं रोमांचकारी युद्धको देखें’।। ३२½ ।। कर्णकौरवयोरेवं रणे सम्भाषमाणयोः ।। ३३ ।। अर्जुनो निशितैर्बाणैर्जघान तव वाहिनीम् । जब रणक्षेत्रमें कर्ण और दुर्योधन इस तरह वार्तालाप कर रहे थे, उस समय अर्जुनने अपने पैने बाणोंद्वारा आपकी सेनाका संहार आरम्भ किया।। ३३½ ।। चिच्छेद निशितैर्बाणैः शूराणामनिवर्तिनाम् ।। ३४ ।। भुजान् परिघसंकाशान् हस्तिहस्तोपमान् रणे । उन्होंने तीखे बाणोंसे रणभूमिमें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंकी परिघके समान सुदृढ़ तथा हाथीकी सूँड़के समान मोटी भुजाओंको काट डाला।। शिरांसि च महाबाहुश्चिच्छेद निशितैः शरैः ।। ३५ ।। हस्तिहस्तान् हयग्रीवान् रथाक्षांश्च समन्ततः । महाबाहु अर्जुनने सब ओर अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंके मस्तक, हाथियोंके शुण्डदण्डों, घोड़ोंकी गर्दनों तथा रथके धुरोंको भी खण्डित कर दिया।। ३५½ ।। शोणिताक्तान् हयारोहान् गृहीतप्रासतोमरान् ।। ३६ ।।