भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1027, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1027

अभीताः पर्यवर्तन्त व्यादितास्यमिवान्तकम् । उस समय युद्धकुशल कुन्तीकुमार धनुषकी टंकार करते हुए रथके मार्गोंपर नाच रहे थे और मुँह बाये हुए यमराजके समान भयंकर जान पड़ते थे। उन्हें युद्धविशारद समस्त कौरव-महारथियोंने निर्भय हो चारों ओरसे घेर लिया ॥ ४४ १/२ ॥ सैन्धवं पृष्ठतः कृत्वा जिघांसन्तोऽच्युतार्जुनौ ॥ ४५ ॥ सूर्यास्तमनमिच्छन्तो लोहितायति भास्करे । वे श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे सिंधुराज जयद्रथको पीछे करके सूर्यास्त होनेकी इच्छा और प्रतीक्षा करने लगे। उस समय सूर्य लाल-से हो चले ॥ ४५ १/२ ॥ ते भुजैर्भोगिभोगाभैर्ध्नूंष्यानम्य सायकान् ॥ ४६ ॥ मुमुचुः सूर्यरश्म्याभान् शतशः फाल्गुनं प्रति । उन कौरव-सैनिकोंने सर्पके शरीरके समान प्रतीत होनेवाली अपनी भुजाओंद्वारा धनुषोंको नवाकर अर्जुनपर सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले सैकड़ों बाण छोड़े ॥ ततस्तानस्यमानांश्च किरीटी युद्धदुर्मदः ॥ ४७ ॥ द्विधा त्रिधाष्टधैकैकं छित्त्वा विव्याध तान् रथान् । तदनन्तर रणदुर्मद किरीटधारी अर्जुनने उन छोड़े गये बाणोंमेंसे प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन और आठ-आठ टुकड़े करके उन रथियोंको भी घायल कर दिया ॥ सिंहलाङ्गूलकेतुस्तु दर्शयन् वीर्यमात्मनः ॥ ४८ ॥ शारद्वतीसुतो राजन्नर्जुनं प्रत्यवारयत् । राजन्! जिनकी ध्वजामें सिंहकी पूँछका चिह्न था, उन शारद्वतीपुत्र कृपाचार्यने अपना बल-पराक्रम दिखाते हुए अर्जुनको रोका ॥ ४८ १/२ ॥ स विद्ध्वा दशभिः पार्थं वासुदेवं च सप्तभिः ॥ ४९ ॥ अतिष्ठद् रथमार्गेषु सैन्धवं प्रतिपालयन् । वे दस बाणोंसे अर्जुनको और सातसे श्रीकृष्णको घायल करके रथके मार्गोंपर जयद्रथकी रक्षा करते हुए खड़े थे ॥ ४९ १/२ ॥ अथैनं कौरवश्रेष्ठाः सर्व एव महारथाः ॥ ५० ॥ महता रथवंशेन सर्वतः प्रत्यवारयन् । तत्पश्चात् कौरव-सेनाके सभी श्रेष्ठ महारथियोंने विशाल रथसमूहके द्वारा कृपाचार्यको सब ओरसे घेर लिया ॥ ५० १/२ ॥ विस्फारयन्तश्चापानि विसृजन्तश्च सायकान् ॥ ५१ ॥ सैन्धवं पर्य्यरक्षन्त शासनात् तनयस्य ते । वे आपके पुत्रकी आज्ञासे धनुष खींचते और बाण छोड़ते हुए वहाँ जयद्रथकी सब ओरसे रक्षा करने लगे ॥

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