महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः पार्थस्य शूरस्य बाह्वोर्बलमदृश्यत ।। ५२ ।।
इषूणामक्षयत्वं च धनुषो गाण्डिवस्य च ।
तत्पश्चात् वहाँ शूरवीर कुन्तीकुमारकी भुजाओंका बल देखा गया। उनके गाण्डीव धनुष तथा बाणोंकी अक्षयताका परिचय मिला ।। ५२ १/२ ।।
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्रौणेः शारद्वतस्य च ।। ५३ ।।
एकैकं दशभिर्बाणैः सर्वानैव समर्पयत् ।
उन्होंने अश्वत्थामा तथा कृपाचार्यके अस्त्रोंका अपने अस्त्रोंद्वारा निवारण करके बारी-बारीसे उन सबको दस-दस बाण मारे ।। ५३ १/२ ।।
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या वृषसेनश्च सप्तभिः ।। ५४ ।।
दुर्योधनस्तु विंशत्या कर्णशल्यौ त्रिभिस्त्रिभिः ।
अश्वत्थामाने पचीस, वृषसेनने सात, दुर्योधनने बीस तथा कर्ण और शल्यने तीन-तीन बाणोंसे अर्जुनको घायल कर दिया ।। ५४ १/२ ।।
त एनमभिगर्जन्तो विध्यन्तश्च पुनः पुनः ।। ५५ ।।
विधुन्वन्तश्च चापानि सर्वतः प्रत्यवारयन् ।
वे अर्जुनको लक्ष्य करके बार-बार गरजते, उन्हें बारंबार बाणोंसे बींधते और धनुषको हिलाते हुए सब ओरसे उन्हें आगे बढ़नेसे रोकने लगे ।। ५५ १/२ ।।
श्लिष्टं च सर्वतश्चक्रू रथमण्डलमाशु ते ।। ५६ ।।
सूर्यास्तमनमिच्छन्तस्त्वरमाणा महारथाः ।
उन महारथियोंने सूर्यास्तकी इच्छा रखते हुए बड़ी उतावलीके साथ अपने रथसमूहको परस्पर सटाकर सब ओरसे खड़ा कर दिया ।। ५६ १/२ ।।
त एनमभिनर्दन्तो विधुन्वाना धनूंषि च ।। ५७ ।।
सिषिचुर्मार्गणैस्तीक्ष्णैर्गिरिं मेघा इवाम्बुभिः ।
जैसे बादल पर्वतशिखरपर अपने जलकी बूँदोंसे आघात करते हैं, उसी प्रकार वे कौरव-महारथी धनुष हिलाते तथा अर्जुनके सामने गर्जना करते हुए उनपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ।। ५७ १/२ ।।
ते महास्त्राणि दिव्यानि तत्र राजन् व्यदर्शयन् ।। ५८ ।।
धनंजयस्य गात्रे तु शूराः परिघबाहवः ।
राजन्! परिघके समान सुदृढ़ भुजाओंवाले उन शूरवीरोंने अर्जुनके शरीरपर वहाँ बड़े-बड़े दिव्यास्त्रोंका प्रदर्शन किया ।। ५८ १/२ ।।
हतभूयिष्ठयोधं तत् कृत्वा तव बलं बली ।। ५९ ।।
आससाद दुराधर्षः सैन्धवं सत्यविक्रमः ।