महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथापि सत्यपराक्रमी बलवान् एवं दुर्धर्ष वीर अर्जुनने आपकी सेनाके अधिकांश योद्धाओंका संहार करके सिन्धुराजपर आक्रमण किया ।। ५९½ ।।
तं कर्णः संयुगे राजन् प्रत्यवारयदाशुगैः ।। ६० ।।
मिषतो भीमसेनस्य सात्वतस्य च भारत ।
राजन्! भरतनन्दन! उस युद्धस्थलमें कर्णने भीमसेन और सात्यकिके देखते-देखते अपने शीघ्रगामी बाणोंद्वारा अर्जुनको आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ६०½ ।।
तं पार्थो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यद् रणाजिरे ।। ६१ ।।
सूतपुत्रं महाबाहुः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
तब महाबाहु अर्जुनने समरांगणमें सारी सेनाके देखते-देखते सूतपुत्र कर्णको दस बाणोंसे घायल कर दिया ।। ६१½ ।।
सात्वतश्च त्रिभिर्बाणैः कर्णं विव्याध मारिष ।। ६२ ।।
भीमसेनस्त्रिभिश्चैव पुनः पार्थश्च सप्तभिः ।
माननीय नरेश! तदनन्तर सात्यकिने तीन बाणोंसे कर्णको वेध दिया, फिर भीमसेनने भी उसे तीन बाण मारे और अर्जुनने पुनः सात बाणोंसे कर्णको घायल कर दिया ।।
तान् कर्णः प्रतिविव्याध षष्ट्या षष्ट्या महारथः ।। ६३ ।।
तद् युद्धमभवद् राजन् कर्णस्य बहुभिः सह ।
तब महारथी कर्णने उन तीनोंको साठ-साठ बाण मारकर बदला चुकाया। राजन्! कर्णका वह युद्ध अनेक वीरोंके साथ हो रहा था ।। ६३½ ।।
तत्राद्भुतमपश्याम सूतपुत्रस्य मारिष ।। ६४ ।।
यदेकः समरे क्रुद्धस्त्रीन् रथान् पर्यवारयत् ।
आर्य! वहाँ हमने सूतपुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समरभूमिमें कुपित होकर उसने अकेले ही तीन-तीन महारथियोंको रोक दिया था ।। ६४½ ।।
फाल्गुनस्तु महाबाहुः कर्णं वैकर्तनं रणे ।। ६५ ।।
सायकानां शतेनैव सर्वमर्मस्वताडयत् ।
उस समय महाबाहु अर्जुनने रणभूमिमें सौ बाणोंद्वारा, सूर्यपुत्र कर्णको उसके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें चोट पहुँचायी ।। ६५½ ।।
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ६६ ।।
शरैः पञ्चाशता वीरः फाल्गुनं प्रत्यविध्यत ।
तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा नामृष्यत रणेऽर्जुनः ।। ६७ ।।
प्रतापी सूतपुत्र कर्णके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये, तथापि उस वीरने पचास बाणोंसे अर्जुनको भी घायल कर दिया। रणक्षेत्रमें उसकी यह फुर्ती देखकर अर्जुन सहन न कर सके ।। ६६-६७ ।।