भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1047

वहाँ हमलोगोंने कुन्तीकुमारका अद्भुत पराक्रम देखा। उन महायशस्वी वीरने उस समय जो पुरुषार्थ प्रकट किया था, वैसा न तो पहले कभी प्रकट हुआ था और न आगे कभी होगा ही ॥ ८२ ॥ द्विपान् द्विपगतांश्चैव हयान् हयगतानपि । तथा स रथिनश्चैव न्यहन् रुद्रः पशूनिव ॥ ८३ ॥ जैसे संहारकारी रुद्र समस्त प्राणियोंका विनाश कर डालते हैं, उसी प्रकार उन्होंने हाथियों और हाथीसवारोंको, घोड़ों और घुड़सवारोंको तथा रथों एवं रथियोंको भी नष्ट कर दिया ॥ ८३ ॥ न तत्र समरे कश्चिन्मया दृष्टो नराधिप । गजो वाजी नरो वापि यो न पार्थशराहतः ॥ ८४ ॥ नरेश्वर! उस समरभूमिमें मैंने कोई भी ऐसा हाथी, घोड़ा या मनुष्य नहीं देखा, जो अर्जुनके बाणोंसे क्षत-विक्षत न हो गया हो ॥ ८४ ॥ रजसा तमसा चैव योधाः संछन्नचक्षुषः । कश्मलं प्राविशन् घोरं नान्वजानन् परस्परम् ॥ ८५ ॥ उस समय धूल और अन्धकारसे सारे योद्धाओंके नेत्र आच्छादित हो गये थे। वे भयंकर मोहमें पड़ गये। उनके लिये एक-दूसरेको पहचानना भी असम्भव हो गया ॥ ते शरैर्भिन्नमर्माणः सैनिकाः पार्थचोदितैः । बभ्रमुश्चस्खलुः पेतुः सेदुर्मम्लुश्च भारत ॥ ८६ ॥ भारत! अर्जुनके चलाये हुए बाणोंसे जिनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये थे, वे सैनिक चक्कर काटते, लड़खड़ाते, गिरते, व्यथित होते और प्राणशून्य होकर मलिन हो जाते थे ॥ ८६ ॥ तस्मिन् महाभीषणके प्रजानामिव संक्षये । रणे महति दुष्पारे वर्तमाने सुदारुणे ॥ ८७ ॥ शोणितस्य प्रसेकेन शीघ्रत्वादिनलस्य च । अशाम्यत् तद् रजो भौममसृक्सिक्ते धरातले ॥ ८८ ॥ आनाभि निरमज्जंश्च रथचक्राणि शोणिते । समस्त प्राणियोंके प्रलयकालके समान जब वह महाभीषण अत्यन्त दारुण महान् एवं दुर्लङ्घ्य संग्राम चल रहा था, उस समय रक्तकी वर्षासे और वायुके वेगपूर्वक चलनेसे रुधिरसे भीगे हुए धरातलकी धूल शान्त हो गयी। रथके पहिये नाभितक खूनमें डूबे हुए थे ॥ ८७-८८ १/२ ॥ मत्ता वेगवतो राजंस्तावकानां रणाङ्गणे ॥ ८९ ॥ हस्तिनश्च हतारोहा दारिताङ्गाः सहस्रशः । स्वान्यनीकानि मृद्नन्त आर्तनादाः प्रदुद्रुवुः ॥ ९० ॥