महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1048, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! जिनके सवार मार डाले गये थे और समस्त अंग बाणोंसे विदीर्ण हो रहे थे, वे आपके योद्धाओंके वेगवान् और मदमत्त सहस्रों हाथी समरभूमिमें अपनी ही सेनाओंको रौंदते और आर्तनाद करते हुए जोर-जोरसे भागने लगे ॥ ८९-९० ॥ हयाश्च पतितारोहाः पत्तयश्च नराधिप । प्रदुद्रुवुर्भयाद् राजन् धनंजयशराहताः ॥ ९१ ॥ नरेश्वर! राजन्! घुड़सवार गिर गये थे और घोड़े एवं पैदल सैनिक धनंजयके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो भयके मारे भागे जा रहे थे ॥ ९१ ॥ मुक्तकेशा विकवचाः क्षरन्तः क्षतजं क्षतैः । प्रापलायन्त संत्रस्तास्त्यक्त्वा रणशिरो जनाः ॥ ९२ ॥ लोगोंके बाल खुले हुए थे, कवच कटकर गिर गये थे और वे अत्यन्त भयभीत हो युद्धका मुहाना छोड़कर अपने घावोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए जान बचानेके लिये भाग रहे थे ॥ ९२ ॥ ऊरुग्राहगृहीताश्च केचित् तत्राभवन् भुवि । हतानां चापरे मध्ये द्विरदानां निलिल्यिरे ॥ ९३ ॥ कुछ लोग बिना हिले-डुले इस प्रकार भूमिपर खड़े थे, मानो उनकी जाँघें अकड़ गयी हों। दूसरे बहुत-से सैनिक वहाँ मारे गये हाथियोंके बीचमें जा छिपे थे ॥ ९३ ॥ एवं तव बलं राजन् द्रावयित्वा धनंजयः । न्यवधीत् सायकैर्घोरैः सिन्धुराजस्य रक्षिणः ॥ ९४ ॥ राजन्! इस प्रकार अर्जुनने आपकी सेनाको भगाकर भयंकर बाणोंद्वारा सिंधुराजके रक्षकोंको मारना आरम्भ किया ॥ ९४ ॥ द्रौणिं कृपं कर्णशल्यौ वृषसेनं सुयोधनम् । छादयामास तीव्रेण शरजालेन पाण्डवः ॥ ९५ ॥ पाण्डुकुमार अर्जुनने अपने तीखे बाणसमूहसे अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कर्ण, शल्य, वृषसेन तथा दुर्योधनको आच्छादित कर दिया ॥ ९५ ॥ न गृह्णन् न क्षिपन् राजन् मुञ्चन्नापि च संदधत् । अदृश्यतार्जुनः संख्ये शीघ्रास्त्रत्वात् कथंचन ॥ ९६ ॥ राजन्! उस समय युद्धस्थलमें अर्जुन इतनी फुर्तीसे बाण चलाते थे कि कोई किसी प्रकार भी यह न देख सका कि वे कब बाण लेते हैं, कब उसे धनुषपर रखते हैं, कब प्रत्यंचा खींचते हैं और कब वह बाण छोड़ते हैं ॥ ९६ ॥ धनुर्मण्डलमेवास्य दृश्यते स्मास्यतः सदा । सायकाश्च व्यदृश्यन्त निश्चरन्तः समन्ततः ॥ ९७ ॥ निरन्तर बाण छोड़ते हुए अर्जुनका केवल मण्डलाकार धनुष ही लोगोंकी दृष्टिमें आता था एवं चारों ओर फैलते हुए उनके बाण भी दृष्टिगोचर होते थे ॥ ९७ ॥