महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1051, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमन्तपञ्चकादस्माद् बहिर्वानरकेतन ॥ ११४ ॥ ‘कपिध्वज अर्जुन! वे तेजस्वी राजा वृद्धक्षत्र इस समय इस समन्तपंचक-क्षेत्रसे बाहर घोर एवं दुर्धर्ष तपस्या कर रहे हैं॥ ११४॥
तस्माज्जयद्रथस्य त्वं शिरश्छित्त्वा महामृधे । दिव्येनास्त्रेण रिपुहन् घोरेणाद्भुतकर्मणा ॥ ११५ ॥ सकुण्डलं सिन्धुपतेः प्रभञ्जनसुतानुज । उत्सङ्गे पातयस्वास्य वृद्धक्षत्रस्य भारत ॥ ११६ ॥ ‘अतः शत्रुसूदन! तुम अद्भुत कर्म करनेवाले किसी भयंकर दिव्यास्त्रके द्वारा इस महासमरमें सिंधुराज जयद्रथका कुण्डलसहित मस्तक काटकर उसे इस वृद्धक्षत्रकी गोदमें गिरा दो। भारत! तुम भीमसेनके छोटे भाई हो (अतः सब कुछ कर सकते हो)॥ ११५-११६॥
अथ त्वमस्य मूर्धानं पातयिष्यसि भूतले । तवापि शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥ ११७ ॥ ‘यदि तुम इसके मस्तकको पृथ्वीपर गिराओगे तो तुम्हारे मस्तकके भी सौ टुकड़े हो जायँगे। इसमें संशय नहीं है’॥ ११७॥
यथा चेदं न जानीयात् स राजा तपसि स्थितः । तथा कुरु कुरुश्रेष्ठ दिव्यमस्त्रमुपाश्रितः ॥ ११८ ॥ ‘कुरुश्रेष्ठ! राजा वृद्धक्षत्र तपस्यामें संलग्न हैं। तुम दिव्यास्त्रका आश्रय लेकर ऐसा प्रयत्न करो, जिससे उसे इस बातका पता न चले’॥ ११८॥
न ह्यसाध्यमकार्यं वा विद्यते तव किंचन । समस्तेष्वपि लोकेषु त्रिषु वासवनन्दन ॥ ११९ ॥ ‘इन्द्रकुमार! सम्पूर्ण त्रिलोकीमें कोई ऐसा कार्य नहीं है, जो तुम्हारे लिये असाध्य हो अथवा जिसे तुम कर न सको’॥ ११९॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं सृक्किणी परिसंलिहन् । इन्द्राशनिसमस्पर्शं दिव्यमन्त्राभिमन्त्रितम् ॥ १२० ॥ सर्वभारसहं शश्वद् गन्धमाल्यार्चितं शरम् । विससर्जार्जुनस्तूर्णं सैन्धवस्य वधे धृतम् ॥ १२१ ॥ श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अपने दोनों गलफर चाटते हुए अर्जुनने सिंधुराजके वधके लिये धनुषपर रखे हुए उस बाणको तुरंत ही छोड़ दिया, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान कठोर था, जिसे दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया था, जो सारे भारोंको सहनेमें समर्थ था और जिसकी प्रतिदिन चन्दन और पुष्पमालाद्वारा पूजा की जाती थी॥ १२०-१२१॥
स तु गाण्डीवनिर्मुक्तः शरः श्येन इवाशुगः ।