भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1052

च्छित्त्वा शिरः सिन्धुपतेरुत्पपात विहायसम् ॥ १२२ ॥ गाण्डीव धनुषसे छूटा हुआ वह शीघ्रगामी बाण सिंधुराजका सिर काटकर बाजपक्षीके समान उसे आकाशमें ले उड़ा ॥ १२२ ॥ तच्छिरः सिन्धुराजस्य शरैरूर्ध्वमवाहयत् । दुर्हृदामप्रहर्षाय सुहृदां हर्षणाय च ॥ १२३ ॥ सिंधुराज जयद्रथके उस मस्तकको उन्होंने बाणोंद्वारा ऊपर-ही-ऊपर ढोना आरम्भ किया। इससे अर्जुनके शत्रुओंको बड़ा दुःख और मित्रोंको महान् हर्ष हुआ ॥ १२३ ॥ शरैः कदम्बकीकृत्य काले तस्मिंश्च पाण्डवः । योधयामास तांश्चैव पाण्डवः षण्महारथान् ॥ १२४ ॥ उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने एकके बाद एक करके अनेक बाण मारकर उस मस्तकको कदम्बके फूल-सा बना दिया। साथ ही वे पूर्वोक्त छः महारथियोंसे युद्ध भी करते रहे ॥ १२४ ॥ ततः सुमहदाश्चर्यं तत्रापश्याम भारत । समन्तपञ्चकाद् बाह्यं शिरो यद् व्यहरत् ततः ॥ १२५ ॥ भारत! उस समय हमने समन्तपंचकसे बाहर जहाँ वह बाण उस मस्तकको ले गया था, वहाँ बड़े भारी आश्चर्यकी घटना देखी ॥ १२५ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु वृद्धक्षत्रो महीपतिः । संध्यामुपास्ते तेजस्वी सम्बन्धी तव मारिष ॥ १२६ ॥ आर्य! इसी समय आपके तेजस्वी सम्बन्धी राजा वृद्धक्षत्र संध्योपासना कर रहे थे ॥ १२६ ॥ उपासीनस्य तस्याथ कृष्णकेशं सकुण्डलम् । सिन्धुराजस्य मूर्धानमुत्सङ्गे समपातयत् ॥ १२७ ॥ संध्योपासनामें बैठे हुए वृद्धक्षत्रके अंकमें उस बाणने सिंधुराज जयद्रथका वह काले केशोंवाला कुण्डलमण्डित मस्तक डाल दिया ॥ १२७ ॥ तस्योत्सङ्गे निपतितं शिरस्तच्चारुकुण्डलम् । वृद्धक्षत्रस्य नृपतेरलक्षितमरिंदम ॥ १२८ ॥ शत्रुदमन नरेश! जयद्रथका वह सुन्दर कुण्डलोंसे सुशोभित सिर राजा वृद्धक्षत्रकी गोदमें उनके बिना देखे ही गिर गया ॥ १२८ ॥ कृतजप्यस्य तस्याथ वृद्धक्षत्रस्य भारत । प्रोत्तिष्ठतस्तत् सहसा शिरोऽगच्छद् धरातलम् ॥ १२९ ॥ भरतनन्दन! जप समाप्त करके जब वृद्धक्षत्र सहसा उठने लगे, तब उनकी गोदसे वह मस्तक पृथ्वीपर जा गिरा ॥ १२९ ॥ ततस्तस्य नरेन्द्रस्य पुत्रमूर्धनि भूतले ।