भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1059, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1059

अथ शारद्वतो राजन् कौन्तेयशरपीडितः ।
अवासीदद् रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ॥ ९ ॥
राजन्! कृपाचार्य अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो मूर्च्छित हो गये और रथके पिछले भागमें जा बैठे ॥ ९ ॥

विह्वलं तमभिज्ञाय भर्तारं शरपीडितम् ।
हतोऽयमिति च ज्ञात्वा सारथिस्तमपावहत् ॥ १० ॥
अपने स्वामीको बाणोंसे पीड़ित एवं विह्वल जानकर और उन्हें मरा हुआ समझकर सारथि रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ १० ॥

तस्मिन् भग्ने महाराज कृपे शारद्वते युधि ।
अश्वत्थामाप्यपायासीत् पाण्डवेयाद् रथान्तरम् ॥ ११ ॥
महाराज! युद्धस्थलमें शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यके अचेत होकर वहाँसे हट जानेपर अश्वत्थामा भी अर्जुनको छोड़कर दूसरे किसी रथीका सामना करनेके लिये चला गया ॥ ११ ॥

दृष्ट्वा शारद्वतं पार्थो मूर्च्छितं शरपीडितम् ।
रथ एव महेष्वासः सकृपं पर्यदेवयत् ॥ १२ ॥
अश्रुपूर्णमुखो दीनो वचनं चेदमब्रवीत् ।
कृपाचार्यको बाणोंसे पीड़ित एवं मूर्च्छित देखकर महाधनुर्धर कुन्तीकुमार अर्जुन दयावश रथपर बैठे-बैठे ही विलाप करने लगे। उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे दीनभावसे इस प्रकार कहने लगे— ॥

पश्यन्निदं महाप्राज्ञः क्षत्ता राजानमुक्तवान् ॥ १३ ॥
कुलान्तकरणे पापे जातमात्रे सुयोधने ।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥ १४ ॥
अस्माद्धि कुरुमुख्यानां महदुत्पत्स्यते भयम् ।
‘जिस समय कुलान्तकारी पापी दुर्योधनका जन्म हुआ था, उस समय महाज्ञानी विदुरजीने यही सब विनाशकारी परिणाम देखकर राजा धृतराष्ट्रसे कहा था कि ‘इस कुलांगार बालकको परलोक भेज दिया जाय, यही अच्छा होगा; क्योंकि इससे प्रधान-प्रधान कुरुवंशियोंको महान् भय उत्पन्न होगा’ ॥ १३-१४ १/२ ॥

तदिदं समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ॥ १५ ॥
तत्कृते ह्यद्य पश्यामि शरतल्पगतं गुरुम् ।
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम् ॥ १६ ॥
‘सत्यवादी विदुरजीका वह कथन आज सत्य हो रहा है। दुर्योधनके ही कारण आज मैं अपने गुरुको शर-शय्यापर पड़ा देखता हूँ। क्षत्रियके आचार, बल और पुरुषार्थको धिक्कार है! धिक्कार है ॥ १५-१६ ॥

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 1059, कुल 3237 में से · BharatKosha