महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1060, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंको हि ब्राह्मणमाचार्यमभिद्रुह्येत मादृशः । ऋषिपुत्रो ममाचार्यो द्रोणस्य परमः सखा ॥ १७ ॥ एष शेते रथोपस्थे कृपो मद्बाणपीडितः । 'मेरे-जैसा कौन पुरुष ब्राह्मण एवं आचार्यसे द्रोह करेगा? ये ऋषिकुमार, मेरे आचार्य तथा गुरुवर द्रोणाचार्यके परम सखा कृप मेरे बाणोंसे पीड़ित हो रथकी बैठकमें पड़े हैं ॥ १७ १/२ ॥' अकामयानेन मया विशिखैरर्दितो भृशम् ॥ १८ ॥ अवसीदन् रथोपस्थे प्राणान् पीडयतीव मे । 'मैंने इच्छा न रहते हुए भी उन्हें बाणोंद्वारा अधिक चोट पहुँचायी है। वे रथकी बैठकमें पड़े-पड़े कष्ट पा रहे हैं और मुझे अत्यन्त पीड़ित-सा कर रहे हैं ॥ १८ १/२ ॥' पुत्रशोकाभितप्तेन शरैरभ्यर्दितेन च ॥ १९ ॥ अभ्यस्तो बहुभिर्बाणैर्दशधर्मगतेन वै । 'मैंने पुत्रशोकसे संतप्त, बाणोंद्वारा पीड़ित तथा भारी दुरवस्थाको प्राप्त होकर बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उन्हें अनेक बार चोट पहुँचायी है ॥ १९ १/२ ॥' शोचयत्येष नियतं भूयः पुत्रवधाद्धि माम् ॥ २० ॥ कृपणं स्वरथे सन्नं पश्य कृष्ण यथागतम् । 'निश्चय ही ये कृपाचार्य आहत होकर मुझे पुत्रवधकी अपेक्षा भी अधिक शोकमें डाल रहे हैं। श्रीकृष्ण! देखिये, वे अपने रथपर कैसे सन्न और दीन होकर पड़े हैं ॥ २० १/२ ॥' उपाकृत्य तु वै विद्यामाचार्येभ्यो नरर्षभाः ॥ २१ ॥ प्रयच्छन्तीह ये कामान् देवत्वमुपयान्ति ते । 'आचार्योंसे विद्या ग्रहण करके जो श्रेष्ठ पुरुष उन्हें उनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं, वे देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥ २१ १/२ ॥' ये च विद्यामुपादाय गुरुभ्यः पुरुषाधमाः ॥ २२ ॥ घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तास्ते वै निरयगामिनः । 'गुरुसे विद्या ग्रहण करके जो नराधम उनपर ही चोट करते हैं, वे दुराचारी मानव निश्चय ही नरकगामी होते हैं ॥ २२ १/२ ॥' तदिदं नरकायाद्य कृतं कर्म मया ध्रुवम् ॥ २३ ॥ आचार्यं शरवर्षेण रथे सादयता कृपम् । 'मैंने आचार्य कृपको अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा रथपर सुला दिया है। निश्चय ही यह कर्म मैंने आज नरकमें जानेके लिये ही किया है ॥ २३ १/२ ॥' यत् तत् पूर्वमुपाकुर्वन्नस्त्रं मामब्रवीत् कृपः ॥ २४ ॥ न कथंचन कौरव्य प्रहर्तव्यं गुराविति ।