भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1061

'पूर्वकालमें मुझे अस्त्रविद्याकी शिक्षा देकर कृपाचार्यने जो मुझसे यह कहा था कि ‘कुरुनन्दन! तुम्हें गुरुके ऊपर किसी प्रकार भी प्रहार नहीं करना चाहिये’ ॥ २४ १/२ ॥ तदिदं वचनं साधोराचार्यस्य महात्मनः ॥ २५ ॥ नानुष्ठितं तमेवाजौ विशिखैरभिवर्षता । 'उन श्रेष्ठ महात्मा आचार्यका यह वचन युद्धस्थलमें उन्हींपर बाणोंकी वर्षा करके मैंने नहीं माना है ॥ २५ १/२ ॥ नमस्तस्मै सुपूज्याय गौतमायापलायिने ॥ २६ ॥ धिगस्तु मम वार्ष्णेय यदस्मै प्रहराम्यहम् । 'वार्ष्णेय! युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले उन परम पूजनीय गौतमवंशी कृपाचार्यको मेरा नमस्कार है। मैं जो उनपर प्रहार करता हूँ, इसके लिये मुझे धिक्कार है' ॥ तथा विलपमाने तु सव्यसाचिनि तं प्रति ॥ २७ ॥ सैन्धवं निहतं दृष्ट्वा राधेयः समुपाद्रवत् । सव्यसाची अर्जुन कृपाचार्यके लिये विलाप कर ही रहे थे कि सिंधुराजको मारा गया देख राधानन्दन कर्णने उनपर धावा कर दिया ॥ २७ १/२ ॥ तमापतन्तं राधेयमर्जुनस्य रथं प्रति ॥ २८ ॥ पाञ्चाल्यौ सात्यकिश्चैव सहसा समुपाद्रवन् । राधापुत्र कर्णको अर्जुनके रथकी ओर आते देख दोनों भाई पांचालराजकुमार (युधामन्यु और उत्तमौजा) तथा सात्वतवंशी सात्यकि सहसा उसकी ओर दौड़े ॥ २८ १/२ ॥ उपायान्तं तु राधेयं दृष्ट्वा पार्थो महारथः ॥ २९ ॥ प्रहसन् देवकीपुत्रमिदं वचनमब्रवीत् । राधापुत्रको अपने समीप आते देख महारथी कुन्तीकुमार अर्जुनने देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे हँसते हुए कहा— ॥ २९ १/२ ॥ एष प्रयात्याधिरथिः सात्यकेः स्यन्दनं प्रति ॥ ३० ॥ न मृष्यति हतं नूनं भूरिश्रवसमाहवे । 'यह अधिरथपुत्र कर्ण सात्यकिके रथकी ओर जा रहा है। अवश्य ही युद्धस्थलमें भूरिश्रवाका मारा जाना इसके लिये असह्य हो उठा है ॥ ३० १/२ ॥ यत्र यात्येष तत्र त्वं चोदयाश्वान् जनार्दन ॥ ३१ ॥ न सौमदत्तिपदवीं गमयेत् सात्यकिं वृषः । 'जनार्दन! यह जहाँ जाता है, वहीं आप भी अपने घोड़ोंको हाँकिये। कहीं ऐसा न हो कि कर्ण सात्यकिको भूरिश्रवाके पथपर पहुँचा दे' ॥ ३१ १/२ ॥ एवमुक्तो महाबाहुः केशवः सव्यसाचिना ॥ ३२ ॥ प्रत्युवाच महातेजाः कालयुक्तमिदं वचः ।