महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1062, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसव्यसाची अर्जुनके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी महाबाहु केशवने उनसे यह समयोचित वचन कहा— ।।
अलमेष महाबाहुः कर्णायैकोऽपि पाण्डव ।। ३३ ।।
किं पुनद्र्रौपदेयाभ्यां सहितः सात्वतर्षभः ।
‘पाण्डुनन्दन! यह महाबाहु सात्वतशिरोमणि सात्यकि अकेला भी कर्णके लिये पर्याप्त है। फिर इस समय जब द्रुपदके दोनों पुत्र इसके साथ हैं, तब तो कहना ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
न च तावत् क्षमः पार्थ तव कर्णेन सङ्गरः ।। ३४ ।।
प्रज्वलन्ती महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी ।
‘कुन्तीकुमार! इस समय कर्णके साथ तुम्हारा युद्ध होना ठीक नहीं है; क्योंकि उसके पास बड़ी भारी उल्काके समान प्रज्वलित होनेवाली इन्द्रकी दी हुई शक्ति है ।। ३४ १/२ ।।
त्वदर्थं पूज्यमानैषा रक्ष्यते परवीरहन् ।। ३५ ।।
अतः कर्णः प्रयात्वत्र सात्वतस्य यथातथा ।
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन! तुम्हारे लिये कर्ण उसकी प्रतिदिन पूजा करते हुए उसे सदा सुरक्षित रखता है; अतः कर्ण सात्यकिके पास जैसे-तैसे जाय और युद्ध करे ।। ३५ १/२ ।।
अहं ज्ञास्यामि कौन्तेय कालमस्य दुरात्मनः ।
यत्रैनं विशिखैस्तीक्ष्णैः पातयिष्यसि भूतले ।। ३६ ।।
‘कुन्तीकुमार! मैं उस दुरात्माका अन्तकाल जानता हूँ, जब कि तुम अपने तीखे बाणोंद्वारा उसे पृथ्वीपर मार गिराओगे’ ।। ३६ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
योऽसौ कर्णेन वीरस्य वार्ष्णेयस्य समागमः ।
हते तु भूरिश्रवसि सैन्धवे च निपातिते ।। ३७ ।।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! भूरिश्रवाके मारे जाने और सिंधुराजके धराशायी किये जानेपर कर्णके साथ वीरवर सात्यकिका जो संग्राम हुआ, वह कैसा था? ।। ३७ ।।
सात्यकिश्चापि विरथः कं समारूढवान् रथम् ।
चक्ररक्षौ च पाञ्चाल्यौ तन्ममाचक्ष्व संजय ।। ३८ ।।
संजय! सात्यकि भी तो रथहीन हो चुके थे। वे किस रथपर आरूढ़ हुए तथा चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजा इन दोनों पांचाल वीरोंने किसके साथ युद्ध किया? यह सब मुझे बताओ ।। ३८ ।।
संजय उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथा वृत्तं महारणे ।