महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1063, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा दुराचरितमात्मनः ॥ ३९ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! मैं बड़े खेदके साथ उस महासमरमें घटित हुई घटनाओंका आपके समक्ष वर्णन करूँगा। आप स्थिर होकर अपने दुराचारका परिणाम सुनें ॥ पूर्वमेव हि कृष्णस्य मनोगतमिदं प्रभो । विजेतव्यो यथा वीरः सात्यकिः सौमदत्तिना ॥ ४० ॥ प्रभो! भगवान् श्रीकृष्णके मनमें पहले ही यह बात आ गयी थी कि आज वीर सात्यकिको सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा परास्त कर देगा ॥ ४० ॥ अतीतानागते राजन् स हि वेत्ति जनार्दनः । ततः सूतं समाहूय दारुकं संदिदेश ह ॥ ४१ ॥ रथो मे युज्यतां कल्पमिति राजन् महाबलः । न हि देवा न गन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ॥ ४२ ॥ मानवा वापि जेतारः कृष्णयोः सन्ति केचन । राजन्! वे जनार्दन भूत और भविष्य दोनों कालोंको जानते हैं। इसीलिये उन्होंने अपने सारथि दारुकको बुलाकर पहले ही दिन यह आज्ञा दे दी थी कि कल सबेरेसे ही मेरा रथ जोतकर तैयार रखना। महाराज! श्रीकृष्णका बल महान् है। श्रीकृष्ण और अर्जुनको परास्त करनेवाले न तो कोई देवता हैं, न गन्धर्व हैं, न यक्ष, नाग तथा राक्षस हैं और न मनुष्य ही हैं ॥ ४१-४२ १/२ ॥ पितामहपुरोगाश्च देवाः सिद्धाश्च तं विदुः ॥ ४३ ॥ तयोः प्रभावमतुलं शृणु युद्धं तु तत् तथा । उन्हें ब्रह्मा आदि देवता और सिद्ध पुरुष ही यथार्थ रूपसे जान पाते हैं। उन दोनोंके प्रभावकी कहीं तुलना नहीं है। अच्छा, अब युद्धका वृत्तान्त सुनिये ॥ ४३ १/२ ॥ सात्यकिं विरथं दृष्ट्वा कर्णं चाभ्युद्यतं रणे ॥ ४४ ॥ दध्मौ शङ्खं महानादमार्षभेणाथ माधवः । सात्यकिको रथहीन और कर्णको युद्धके लिये उद्यत देख भगवान् श्रीकृष्णने बड़े जोरकी ध्वनि करनेवाले शंखको ऋषभस्वरसे बजाया ॥ ४४ १/२ ॥ दारुकोऽवेत्य संदेशं श्रुत्वा शङ्खस्य च स्वनम् ॥ ४५ ॥ रथमन्वानयत् तस्मै सुपर्णोच्छ्रितकेतनम् । दारुकने उस शंखध्वनिको सुनकर भगवान्के संदेशको स्मरण करके तुरंत ही उनके लिये अपना रथ ला दिया, जिसपर गरुड़चिह्नसे युक्त ऊँची ध्वजा फहरा रही थी ॥ ४५ १/२ ॥ स केशवस्यानुमते रथं दारुकसंयुतम् ॥ ४६ ॥ आरुरोह शिनेः पौत्रो ज्वलनादित्यसंनिभम् ।