भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1064

भगवान् श्रीकृष्णकी अनुमति पाकर शिनिपौत्र सात्यकि दारुकद्वारा जोते हुए अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी उस रथपर आरूढ़ हुए ।। ४६ १/२ ।।

कामगैः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः ।। ४७ ।। हयोद्ग्रैर्महावेगैर्हेमभाण्डविभूषितैः । युक्तं समारुह्य च तं विमानप्रतिमं रथम् ।। ४८ ।। अभ्यद्रवत राधेयं प्रवपन् सायकान् बहून् ।

उसमें इच्छानुसार चलनेवाले महान् वेगशाली और सुवर्णमय अलंकारोंसे विभूषित शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले श्रेष्ठ अश्व जुते हुए थे। वह रथ विमानके समान जान पड़ता था। उसपर आरूढ़ होकर बहुत-से बाणोंकी वर्षा करते हुए सात्यकिने राधापुत्र कर्णपर धावा किया ।। ४७-४८ १/२ ।।

चक्ररक्षावपि तदा युधामन्यूत्तमौजसौ ।। ४९ ।। धनंजयरथं हित्वा राधेयं प्रत्युदीयतुः ।

उस समय चक्ररक्षक युधामन्यु और उत्तमौजाने भी धनंजयका रथ छोड़कर कर्णपर ही आक्रमण किया ।। ४९ १/२ ।।

राधेयोऽपि महाराज शरवर्षं समुत्सृजन् ।। ५० ।। अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धो रणे शैनेयमच्युतम् ।

महाराज! अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कर्णने भी उस युद्धस्थलमें अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले सात्यकिपर बाणोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ।। ५० १/२ ।।

नैव दैवं न गान्धर्वं नासुरं न च राक्षसम् ।। ५१ ।। तादृशं भुवि नो युद्धं दिवि वा श्रुतमित्युत ।

राजन्! मैंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें देवताओं, गन्धर्वों, असुरों तथा राक्षसोंका भी वैसा युद्ध नहीं सुना था ।। ५१ १/२ ।।

उपारमत तत् सैन्यं सरथाश्वनरद्विपम् ।। ५२ ।। तयोर्दृष्ट्वा महाराज कर्म सम्मूढचेतसः । सर्वे च समपश्यन्त तद् युद्धमतिमानुषम् ।। ५३ ।। तयोर्नृवरयो राजन् सारथ्यं दारुकस्य च ।

महाराज! उन दोनोंका वह संग्राम देखकर सबके चित्तमें मोह छा गया। राजन्! सभी दर्शकके समान उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंके उस अतिमानव युद्धको और दारुकके सारथ्य कर्मको देखने लगे। हाथी, घोड़े, रथ और मनुष्योंसे युक्त वह चतुरंगिणी सेना भी युद्धसे उपरत हो गयी थी ।। ५२-५३ १/२ ।।

गतप्रत्यागतावृत्तैर्मण्डलैः संनिवर्तनैः ।। ५४ ।। सारथेस्तु रथस्थस्य काश्यपेयस्य विस्मिताः ।