महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1068, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! सात्यकि युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णके समान हैं। उन्होंने श्रीकृष्णके ही अजेय रथपर आरूढ़ होकर कर्णको रथहीन कर दिया। उस समय उनके साथ दारुक-जैसा सारथि था और उन्हें अपने बाहुबलका अभिमान तो था ही; परंतु शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि क्या किसी दूसरे रथपर भी आरूढ़ हुए थे? ।। ७८-७९ ।। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कुशलो ह्यसि भाषितुम् । असह्यं तमहं मन्ये तन्ममाचक्ष्व संजय ।। ८० ।। मैं यह सुनना चाहता हूँ। तुम कथा कहनेमें बड़े कुशल हो। मैं तो सात्यकिको किसीके लिये भी असह्य मानता हूँ, अतः संजय! तुम मुझसे सारी बातें स्पष्ट रूपसे बताओ ।। ८० ।।
संजय उवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं रथमम्यं महामतिः । दारुकस्यानुजस्तूर्णं कल्पनाविधिकल्पितम् ।। ८१ ।। **संजयने कहा—**राजन्! सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनिये। दारुकका एक छोटा भाई था, जो बड़ा बुद्धिमान् था। वह तुरंत ही रथ सजानेकी विधिसे सुसज्जित किया हुआ एक दूसरा रथ ले आया ।। ८१ ।। आयसैः काञ्चनैश्चापि पट्टैः संनद्धकूबरम् । तारासहस्रखचितं सिंहध्वजपताकिनम् ।। ८२ ।। लोहे और सोनेके पट्टोंसे उसका कूबर अच्छी तरह कसा हुआ था। उसमें सहस्रों तारे जड़े गये थे। उसकी ध्वजा-पताकाओंमें सिंहका चिह्न बना हुआ था ।। ८२ ।। अश्वैर्वातजवैर्युक्तं हेमभाण्डपरिच्छदैः । सैन्धवैरिन्दुसंकाशैः सर्वशब्दातिगैर्दृढैः ।। ८३ ।। उस रथमें सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित, वायुके समान वेगशाली, सम्पूर्ण शब्दोंको लाँघ जानेवाले, सुदृढ़ तथा चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण सिन्धी घोड़े जुते हुए थे ।। ८३ ।। चित्रकाञ्चनसंनाहैर्वाजिमुख्यैर्विशाम्पते । घण्टाजालाकुलरवं शक्तितोमरविद्युतम् ।। ८४ ।। प्रजानाथ! उन घोड़ोंको विचित्र स्वर्णमय कवचोंसे सुसज्जित किया गया था। वे सभी अश्व अच्छी श्रेणीके थे। उनसे जुते हुए उस रथमें क्षुद्र घंटिकाओंके समूहसे निकलती हुई मधुर ध्वनि व्याप्त हो रही थी। वहाँ रखे हुए शक्ति और तोमर आदि शस्त्र विद्युत्के समान प्रकाशित होते थे ।। ८४ ।। युक्तं सांग्रामिकैर्द्रव्यैर्बहुशस्त्रपरिच्छदैः । रथं सम्पादयामास मेघगम्भीरनिःस्वनम् ।। ८५ ।।