भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1090

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना

संजय उवाच

सैन्धवे निहते राजन् पुत्रस्तव सुयोधनः ।
अश्रुपूर्णमुखो दीनो निरुत्साहो द्विषज्जये ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! सिंधुराज जयद्रथके मारे जानेपर आपका पुत्र दुर्योधन बहुत दुःखी हो गया। उसके मुँहपर आँसुओंकी धारा बहने लगी। शत्रुओंको जीतनेका उसका सारा उत्साह जाता रहा ॥ १ ॥

दुर्मना निःश्वसन् दुष्टो भग्नदंष्ट्र इवोरगः ।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रस्तेऽऽर्तिं परामगात् ॥ २ ॥
जिसके दाँत तोड़ दिये गये हैं, उस दुष्ट सर्पके समान वह मन-ही-मन दुःखी हो लंबी साँस खींचने लगा। सम्पूर्ण जगत्का अपराध करनेवाले आपके पुत्रको बड़ी पीड़ा हुई ॥ २ ॥

दृष्ट्वा तत्कदनं घोरं स्वबलस्य कृतं महत् ।
जिष्णुना भीमसेनेन सात्वतेन च संयुगे ॥ ३ ॥
स विवर्णः कृशो दीनो बाष्पविप्लुतलोचनः ।
युद्धस्थलमें अर्जुन, भीमसेन और सात्यकिके द्वारा अपनी सेनाका अत्यन्त घोर संहार हुआ देखकर वह दीन, दुर्बल और कान्तिहीन हो गया। उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ३ ½ ॥

अमन्यतार्जुनसमो न योद्धा भुवि विद्यते ॥ ४ ॥
न द्रोणो न च राधेयो नाश्वत्थामा कृपो न च ।
क्रुद्धस्य समरे स्थातुं पर्याप्ता इति मारिष ॥ ५ ॥
माननीय नरेश! उसे यह निश्चय हो गया कि 'इस भूतलपर अर्जुनके समान कोई दूसरा योद्धा नहीं है। समरांगणमें कुपित हुए अर्जुनके सामने न द्रोण, न कर्ण, न अश्वत्थामा और न कृपाचार्य ही ठहर सकते हैं' ॥ ४-५ ॥

निर्जित्य हि रणे पार्थः सर्वान् मम महारथान् ।
अवधीत् सैन्धवं संख्ये न च कश्चिदवारयत् ॥ ६ ॥
वह सोचने लगा कि 'आजके युद्धमें अर्जुनने हमारे सभी महारथियोंको जीतकर सिंधुराजका वध कर डाला, किन्तु कोई भी उन्हें समरांगणमें रोक न सका ॥ ६ ॥