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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१५०-

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना

संजय उवाच

सैन्धवे निहते राजन् पुत्रस्तव सुयोधनः ।
अश्रुपूर्णमुखो दीनो निरुत्साहो द्विषज्जये ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! सिंधुराज जयद्रथके मारे जानेपर आपका पुत्र दुर्योधन बहुत दुःखी हो गया। उसके मुँहपर आँसुओंकी धारा बहने लगी। शत्रुओंको जीतनेका उसका सारा उत्साह जाता रहा ॥ १ ॥

दुर्मना निःश्वसन् दुष्टो भग्नदंष्ट्र इवोरगः ।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रस्तेऽऽर्तिं परामगात् ॥ २ ॥
जिसके दाँत तोड़ दिये गये हैं, उस दुष्ट सर्पके समान वह मन-ही-मन दुःखी हो लंबी साँस खींचने लगा। सम्पूर्ण जगत्का अपराध करनेवाले आपके पुत्रको बड़ी पीड़ा हुई ॥ २ ॥

दृष्ट्वा तत्कदनं घोरं स्वबलस्य कृतं महत् ।
जिष्णुना भीमसेनेन सात्वतेन च संयुगे ॥ ३ ॥
स विवर्णः कृशो दीनो बाष्पविप्लुतलोचनः ।
युद्धस्थलमें अर्जुन, भीमसेन और सात्यकिके द्वारा अपनी सेनाका अत्यन्त घोर संहार हुआ देखकर वह दीन, दुर्बल और कान्तिहीन हो गया। उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ३ ½ ॥

अमन्यतार्जुनसमो न योद्धा भुवि विद्यते ॥ ४ ॥
न द्रोणो न च राधेयो नाश्वत्थामा कृपो न च ।
क्रुद्धस्य समरे स्थातुं पर्याप्ता इति मारिष ॥ ५ ॥
माननीय नरेश! उसे यह निश्चय हो गया कि 'इस भूतलपर अर्जुनके समान कोई दूसरा योद्धा नहीं है। समरांगणमें कुपित हुए अर्जुनके सामने न द्रोण, न कर्ण, न अश्वत्थामा और न कृपाचार्य ही ठहर सकते हैं' ॥ ४-५ ॥

निर्जित्य हि रणे पार्थः सर्वान् मम महारथान् ।
अवधीत् सैन्धवं संख्ये न च कश्चिदवारयत् ॥ ६ ॥
वह सोचने लगा कि 'आजके युद्धमें अर्जुनने हमारे सभी महारथियोंको जीतकर सिंधुराजका वध कर डाला, किन्तु कोई भी उन्हें समरांगणमें रोक न सका ॥ ६ ॥

सर्वथा हतमेवेदं कौरवाणां महद् बलम् ।
न ह्यस्य विद्यते त्राता साक्षादपि पुरंदरः ॥ ७ ॥
‘कौरवोंकी यह विशाल सेना अब सर्वथा नष्टप्राय ही है। साक्षात् देवराज इन्द्र भी इसकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ ७ ॥
यमुपाश्रित्य संग्रामे कृतः शस्त्रसमुद्यमः ।
स कर्णो निर्जितः संख्ये हतश्चैव जयद्रथः ॥ ८ ॥
‘जिसका भरोसा करके मैंने युद्धके लिये शस्त्र-संग्रहकी चेष्टा की, वह कर्ण भी युद्धस्थलमें परास्त हो गया और जयद्रथ भी मारा ही गया ॥ ८ ॥
यस्य वीर्यं समाश्रित्य शमं याचन्तमच्युतम् ।
तृणवत् तमहं मन्ये स कर्णो निर्जितो युधि ॥ ९ ॥
‘जिसके पराक्रमका आश्रय लेकर मैंने संधिकी याचना करनेवाले श्रीकृष्णको तिनकेके समान समझा था, वह कर्ण युद्धमें पराजित हो गया’ ॥ ९ ॥
एवं क्लान्तमना राजन्नुपायाद् द्रोणमीक्षितुम् ।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रस्ते भरतर्षभ ॥ १० ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का अपराध करनेवाला आपका पुत्र जब इस प्रकार सोचते-सोचते मन-ही-मन बहुत खिन्न हो गया, तब आचार्य द्रोणका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ॥ १० ॥
ततस्तत्सर्वमाचख्यौ कुरूणां वैशसं महत् ।
परान् विजयतश्चापि धार्तराष्ट्रान् निमज्जतः ॥ ११ ॥
तदनन्तर वहाँ उसने कौरवोंके महान् संहारका वह सारा समाचार कहा और यह भी बताया कि शत्रु विजयी हो रहे हैं और महाराज धृतराष्ट्रके सभी पुत्र विपत्तिके समुद्रमें डूब रहे हैं ॥ ११ ॥

दुर्योधन उवाच

पश्य मूर्धाभिषिक्तानामाचार्य कदनं महत् ।
कृत्वा प्रमुखतः शूरं भीष्मं मम पितामहम् ॥ १२ ॥
दुर्योधन बोला— आचार्य! जिनके मस्तकपर विधिपूर्वक राज्याभिषेक किया गया था, उन राजाओंका यह महान् संहार देखिये। मेरे शूरवीर पितामह भीष्मसे लेकर अबतक कितने ही नरेश मारे गये ॥ १२ ॥
तं निहत्य प्रलुब्धोऽयं शिखण्डी पूर्णमानसः ।
पाञ्चाल्यैः सहितः सर्वैः सेनाग्रमभिवर्तते ॥ १३ ॥
व्याधों-जैसा बर्ताव करनेवाला यह शिखण्डी भीष्मको मारकर मन-ही-मन उत्साहसे भरा हुआ है और समस्त पांचाल सैनिकोंके साथ सेनाके मुहानेपर खड़ा है ॥ १३ ॥

अपरश्चापि दुर्धर्षः शिष्यस्ते सव्यसाचिना । अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जयद्रथः ॥ १४ ॥ अस्मद्विजयकामानां सुहृदामुपकारिणाम् । गन्तास्मि कथमानृण्यं गतानां यमसादनम् ॥ १५ ॥ सव्यसाची अर्जुनने मेरी सात अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके आपके दूसरे दुर्धर्ष शिष्य राजा जयद्रथको भी मार डाला है। मुझे विजय दिलानेकी इच्छा रखनेवाले मेरे जो-जो उपकारी सुहृद् युद्धमें प्राण देकर यमलोकमें जा पहुँचे हैं, उनका ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा? ॥ १४-१५ ॥

ये मदर्थं परीप्सन्ते वसुधां वसुधाधिपाः । ते हित्वा वसुधैश्वर्यं वसुधामधिशेरते ॥ १६ ॥ जो भूमिपाल मेरे लिये इस भूमिको जीतना चाहते थे, वे स्वयं भूमण्डलका ऐश्वर्य त्यागकर भूमिपर सो रहे हैं ॥

सोऽहं कापुरुषः कृत्वा मित्राणां क्षयमीदृशम् । अश्वमेधसहस्रेण पावितुं न समुत्सहे ॥ १७ ॥ मैं कायर हूँ, अपने मित्रोंका ऐसा संहार कराकर हजारों अश्वमेध-यज्ञोंसे भी अपनेको पवित्र नहीं कर सकता ॥ १७ ॥

मम लुब्धस्य पापस्य तथा धर्मापचायिनः । व्यायामेन जिगीषन्तः प्राप्ता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥ हाय! मुझ लोभी तथा धर्मनाशक पापीके लिये युद्धके द्वारा विजय चाहनेवाले मेरे मित्रगण यमलोक चले गये ॥ १८ ॥

कथं पतितवृत्तस्य पृथिवी सुहृदां द्रुहः । विवरं नाशकद् दातुं मम पार्थिवसंसदि ॥ १९ ॥ मुझ आचारभ्रष्ट और मित्रद्रोहीके लिये राजाओंके समाजमें यह पृथ्‍वी फट क्यों नहीं जाती, जिससे मैं उसीमें समा जाऊँ ॥ १९ ॥

योऽहं रुधिरसिक्ताङ्गं राज्ञां मध्ये पितामहम् । शयानं नाशकं त्रातुं भीष्ममायोधने हतम् ॥ २० ॥ मेरे पितामह भीष्म राजाओंके बीच युद्धस्थलमें मारे गये और अब खूनसे लथपथ होकर बाणशय्यापर पड़े हैं; परंतु मैं उनकी रक्षा न कर सका ॥ २० ॥

तं मामनार्यपुरुषं मित्रद्रुहमधार्मिकम् । किं वक्ष्यति हि दुर्धर्षः समेत्य परलोकजित् ॥ २१ ॥ ये परलोक-विजयी दुर्धर्ष वीर भीष्म यदि मैं उनके पास जाऊँ तो मुझ नीच, मित्रद्रोही तथा पापात्मा पुरुषसे क्या कहेंगे? ॥ २१ ॥

जलसंधं महेष्वासं पश्य सात्यकिना हतम् ।

मदर्थमुद्यतं शूरं प्राणांस्त्यक्त्वा महारथम् ॥ २२ ॥
आचार्य! देखिये तो सही, मेरे लिये प्राणोंका मोह छोड़कर राज्य दिलानेको उद्यत हुए महाधनुर्धर शूरवीर महारथी जलसंधको सात्यकिने मार डाला ॥ २२ ॥
काम्बोजं निहतं दृष्ट्वा तथालम्बुषमेव च ।
अन्यान् बहूंश्च सुहृदो जीविताथोंऽद्य को मम ॥ २३ ॥
काम्बोजराज, अलम्बुष तथा अन्यान्य बहुत-से सुहृदोंको मारा गया देखकर भी अब मेरे जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥ २३ ॥
व्यायच्छन्तो हताः शूरा मदर्थे येऽपराङ्मुखाः ।
यतमानाः परं शक्त्या विजेतुमहितान् मम ॥ २४ ॥
तेषां गत्वाहमानृण्यमद्य शक्त्या परंतप ।
तर्पयिष्यामि तानेव जलेन यमुनाम नु ॥ २५ ॥
शत्रुओंके संताप देनेवाले आचार्य! जो युद्धसे विमुख न होनेवाले शूरवीर सुहृद् मेरे लिये जूझते और मेरे शत्रुओंको जीतनेके लिये यथाशक्ति पूरी चेष्टा करते हुए मारे गये हैं, उनका अपनी शक्तिभर ऋण उतारकर आज मैं यमुनाके जलसे उन सभीका तर्पण करूँगा ॥ २४-२५ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वशस्त्रभृतां वर ।
इष्टापूर्तेन च शपे वीर्येण च सुतैरपि ॥ २६ ॥
निहत्य तान् रणे सर्वान् पञ्चालान् पाण्डवैः सह ।
शान्तिं लब्धास्मि तेषां वा रणे गन्ता सलोकताम् ॥ २७ ॥
समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! आज मैं अपने यज्ञ-यागादि तथा कुँआ, बावली बनवाने आदि शुभ कर्मोंकी, पराक्रमकी तथा पुत्रोंकी शपथ खाकर आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब मैं पाण्डवोंके सहित समस्त पांचालोंको युद्धमें मारकर ही शान्ति पाऊँगा अथवा मेरे वे सुहृद् युद्धमें मरकर जिन लोकोंमें गये हैं, उसीमें मैं भी चला जाऊँगा ॥ २६-२७ ॥
सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र ते पुरुषर्षभाः ।
हता मदर्थे संग्रामे युध्यमानाः किरीटिना ॥ २८ ॥
वे पुरुषशिरोमणि सुहृद् रणभूमिमें मेरे लिये युद्ध करते-करते अर्जुनके हाथसे मारे जाकर जिन लोकोंमें गये हैं, वहीं मैं भी जाऊँगा ॥ २८ ॥
न हीदानीं सहाया मे परीप्सन्त्यनुपस्कृताः ।
श्रेयो हि पाण्डून् मन्यन्ते न तथास्मान् महाभुज ॥ २९ ॥
महाबाहो! इस समय जो मेरे सहायक हैं, वे अरक्षित होनेके कारण हमारी सहायता करना नहीं चाहते हैं। वे जैसा पाण्डवोंका कल्याण चाहते हैं, वैसा हमलोगोंका नहीं ॥ २९ ॥

स्वयं हि मृत्युर्विहितः सत्यसंधेन संयुगे । भवानुपेक्षां कुरुते शिष्यत्वादर्जुनस्य हि ॥ ३० ॥ युद्धस्थलमें सत्यप्रतिज्ञ भीष्मने स्वयं ही अपनी मृत्यु स्वीकार कर ली और आप भी हमारी इसलिये उपेक्षा करते हैं कि अर्जुन आपके प्रिय शिष्य हैं ॥ ३० ॥

अतो विनिहताः सर्वे येऽस्मज्जयचिकीर्षवः । कर्णमेव तु पश्यामि सम्प्रत्यस्मज्जयैषिणम् ॥ ३१ ॥ इसलिये हमारी विजय चाहनेवाले सभी योद्धा मारे गये। इस समय तो मैं केवल कर्णको ही ऐसा देखता हूँ, जो सच्चे हृदयसे मेरी विजय चाहता है ॥ ३१ ॥

यो हि मित्रमविज्ञाय याथातथ्येन मन्दधीः । मित्रार्थे योजयत्येनं तस्य सोऽर्थोऽवसीदति ॥ ३२ ॥ जो मूर्ख मनुष्य मित्रको ठीक-ठीक पहचाने बिना ही उसे मित्रके कार्यमें नियुक्त कर देता है, उसका वह काम बिगड़ जाता है ॥ ३२ ॥

तादृग् रूपं कृतमिदं मम कार्यं सुहृत्तमैः । मोहाल्लुब्धस्य पापस्य जिह्मस्य धनमीहतः ॥ ३३ ॥ मेरे परम सुहृद् कहलानेवालोंने मोहवश धन (राज्य) चाहनेवाले मुझ लोभी, पापी और कुटिलके इस कार्यको उसी प्रकार चौपट कर दिया है ॥ ३३ ॥

हतो जयद्रथश्चैव सौमदत्तिश्च वीर्यवान् । अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥ ३४ ॥ जयद्रथ और सोमदत्तकुमार भूरिश्रवा मारे गये। अभीषाह, शूरसेन, शिबि तथा वसातिगण भी चल बसे ॥ ३४ ॥

सोऽहमद्य गमिष्यामि यत्र ते पुरुषर्षभाः । हता मदर्थे संग्रामे युध्यमानाः किरीटिना ॥ ३५ ॥ वे नरश्रेष्ठ सुहृद् रणभूमिमें मेरे लिये युद्ध करते-करते अर्जुनके हाथसे मारे जाकर जिन लोकोंमें गये हैं, वहीं आज मैं भी जाऊँगा ॥ ३५ ॥

न हि मे जीवितेनार्थस्तानृते पुरुषर्षभान् । आचार्यः पाण्डुपुत्राणामनुजानातु नो भवान् ॥ ३६ ॥ उन पुरुषरत्न मित्रोंके बिना अब मेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है। आप हम पाण्डुपुत्रोंके आचार्य हैं, अतः मुझे जानेकी आज्ञा दें ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनानुतापे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका अनुतापविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५० ॥

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१५१-

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान

धृतराष्ट्र उवाच

सिन्धुराजे हते तात समरे सव्यसाचिना ।
तथैव भूरिश्रवसि किमासीद् वो मनस्तदा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा—तात! समरांगणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सिंधुराज जयद्रथके तथा सात्यकिद्वारा भूरिश्रवाके मारे जानेपर उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥ १ ॥

दुर्योधनेन च द्रोणस्तथोक्तः कुरुसंसदि ।
किमुक्तवान् परं तस्मै तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥

संजय! दुर्योधनने जब कौरव-सभामें द्रोणाचार्यसे वैसी बातें कहीं, तब उन्होंने उसे क्या उत्तर दिया? यह मुझे बताओ ॥ २ ॥

संजय उवाच

निशानको महानासीत् सैन्यानां तव भारत ।
सैन्धवं निहतं दृष्ट्वा भूरिश्रवसमेव च ॥ ३ ॥

संजयने कहा—भारत! सिंधुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाको मारा गया देखकर आपकी सेनाओंमें महान् आर्तनाद होने लगा ॥ ३ ॥

मन्त्रितं तव पुत्रस्य ते सर्वमवमेनिरे ।
येन मन्त्रेण निहताः शतशः क्षत्रियर्षभाः ॥ ४ ॥

वे सब लोग आपके पुत्र दुर्योधनकी उस सारी मन्त्रणाका अनादर करने लगे, जिससे सैकड़ों क्षत्रिय-शिरोमणि कालके गालमें चले गये ॥ ४ ॥

द्रोणस्तु तद् वचः श्रुत्वा पुत्रस्य तव दुर्मनाः ।
मुहूर्तमिव तद् ध्यात्वा भृशमार्तोऽभ्यभाषत ॥ ५ ॥

आपके पुत्रका पूर्वोक्त वचन सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन दुःखी हो उठे। उन्होंने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर अत्यन्त आर्तभावसे इस प्रकार कहा ॥ ५ ॥

द्रोण उवाच

दुर्योधन किमेवं मां वाक्शरैरपि कृन्तसि ।
अजय्यं सततं संख्ये ब्रुवाणं सव्यसाचिनम् ॥ ६ ॥

द्रोणाचार्य बोले—दुर्योधन! तुम क्यों इस प्रकार अपने वचनरूपी बाणोंसे मुझे छेद रहे हो? मैं तो सदासे ही कहता आया हूँ कि सव्यसाची अर्जुन युद्धमें अजेय हैं ॥ ६ ॥

एतेनैवार्जुनं ज्ञातुमलं कौरव संयुगे । यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्मं पाल्यमानः किरीटिना ॥ ७ ॥ कुरुनन्दन! अर्जुनको तो केवल इसी बातसे समझ लेना चाहिये था कि उनके द्वारा सुरक्षित होकर शिखण्डीने भी युद्धके मैदानमें भीष्मको मार डाला ॥ ७ ॥

अवध्यं निहतं दृष्ट्वा संयुगे देवदानवैः । तदैवाज्ञासिषमहं नेयमस्तीति भारती ॥ ८ ॥ जो देवताओं और दानवोंके लिये भी अवध्य थे, उन्हें युद्धमें मारा गया देख मैंने उसी समय यह जान लिया कि यह कौरव-सेना अब नहीं रह सकेगी ॥ ८ ॥

यं पुंसां त्रिषु लोकेषु सर्वशूरममंसमहि । तस्मिन् निपतिते शूरे किं शेषं पर्युपास्महे ॥ ९ ॥ हमलोग जिन्हें तीनों लोकोंके पुरुषोंमें सबसे अधिक शूरवीर मानते थे, उन शौर्यसम्पन्न भीष्मके मारे जानेपर हम दूसरोंका क्या भरोसा करें? ॥ ९ ॥

यान् स्म तान् ग्लहते तात शकुनिः कुरुसंसदि । अक्षान् न तेऽक्षा निशिता बाणास्ते शत्रुतापनाः ॥ १० ॥ द्यूतक्रीड़ाके समय विदुरजीने तुमसे कहा था कि 'तात! कौरव-सभामें शकुनि जिन पासोंको फेंक रहा है, उन्हें पासे न समझो, वे किसी दिन शत्रुओंको संताप देनेवाले तीखे बाण बन सकते हैं' ॥ १० ॥

त एते घ्नन्ति नस्तात विशिखाः पार्थचोदिताः । तांस्तदाऽऽख्यायमानस्त्वं विदुरेण न बुद्धवान् ॥ ११ ॥ परंतु वत्स! उस समय विदुरजीकी कही हुई बातोंको तुमने कुछ नहीं समझा। तात! वे ही पासे ये अर्जुनके चलाये हुए बाण बनकर हमें मार रहे हैं ॥

यास्ता विजयतश्चापि विदुरस्य महात्मनः । धीरस्य वाचो नाश्रौषीः क्षेमाय वदतः शिवाः ॥ १२ ॥ तदिदं वर्तते घोरमागतं वैशसं महत् । तस्यावमानाद् वाक्यस्य दुर्योधन कृते तव ॥ १३ ॥ दुर्योधन! विदुरजी धीर हैं, महात्मा पुरुष हैं। उन्होंने तुम्हारे कल्याणके लिये जो मंगलकारक वचन कहे थे और जिन्हें तुमने विजयके उल्लासमें अनसुना कर दिया था, उनके उन वचनोंके अनादरसे ही तुम्हारे लिये यह घोर महासंहार प्राप्त हुआ है ॥ १२-१३ ॥

योऽवमन्य वचः पथ्यं सुहृदामाप्तकारिणाम् । स्वमतं कुरुते मूढः स शोच्यो नचिरादिव ॥ १४ ॥ जो मूर्ख अपने हितैषी मित्रोंके हितकर वचनकी अवहेलना करके मनमाना बर्ताव करता है, वह थोड़े ही समयमें शोचनीय दशाको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

यच्च नः प्रेक्षमाणानां कृष्णामानाय्य तत्सभाम् । अनर्हन्तीं कुले जातां सर्वधर्मानुचारिणीम् ॥ १५ ॥ तस्याधर्मस्य गान्धारे फलं प्राप्तमिदं महत् । नो चेत् पापं परे लोके त्वमच्छेथास्ततोऽधिकम् ॥ १६ ॥ इसके सिवा तुमने हमलोगोंके सामने ही जो द्रौपदीको सभामें बुलाकर अपमानित किया, वह अपमान उसके योग्य नहीं था। वह उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई है और सम्पूर्ण धर्मोंका निरन्तर पालन करती है। गान्धारीनन्दन! द्रौपदीके अपमानरूपी तुम्हारे अधर्मका ही यह महान् फल प्राप्त हुआ है कि तुम्हारे दलका विनाश हो रहा है। यदि यहाँ यह फल नहीं मिलता तो परलोकमें तुम्हें उस पापका इससे भी अधिक दण्ड भोगना पड़ता ॥ १५-१६ ॥

यच्च तान् पाण्डवान् द्यूते विषमेण विजित्य ह । प्राव्राजयस्तदारण्ये रौरवाजिनवाससः ॥ १७ ॥ इतना ही नहीं, तुमने पाण्डवोंको जूएमैं बेईमानीसे जीतकर और मृगचर्ममय वस्त्र पहनाकर उन्हें वनवास दे दिया (इस अधर्मका भी फल तुम्हें भोगना पड़ता है) ॥ १७ ॥

पुत्राणामिव चैतेषां धर्ममाचरतां सदा । द्रुह्येत् को नु नरो लोके मदन्यो ब्राह्मणब्रुवः ॥ १८ ॥ पाण्डव मेरे पुत्रके समान हैं और वे सदा धर्मका आचरण करते रहते हैं। संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन मनुष्य है, जो ब्राह्मण कहलाकर भी उनसे द्रोह करे ॥ १८ ॥

पाण्डवानामयं कोपस्त्वया शकुनिना सह । आहृतो धृतराष्ट्रस्य सम्मते कुरुसंसदि ॥ १९ ॥ तुमने राजा धृतराष्ट्रकी सम्मतिसे कौरवोंकी सभामें शकुनिके साथ बैठकर पाण्डवोंका यह क्रोध मोल लिया है ॥ १९ ॥

दुःशासनेन संयुक्तः कर्णेन परिवर्धितः । क्षत्तुर्वाक्यमनादृत्य त्वयाभ्यस्तः पुनः पुनः ॥ २० ॥ इस कार्यमें दुःशासनने तुम्हारा साथ दिया है, कर्णसे भी उस क्रोधको बढ़ावा मिला है और विदुरजीके उपदेशकी अवहेलना करके तुमने बारंबार पाण्डवोंके उस क्रोधको बढ़नेका अवसर दिया है ॥ २० ॥

यत्ताः सर्वे पराभूताः पर्यवारयताऽर्जुनम् । सिन्धुराजानमाश्रित्य स वो मध्ये कथं हतः ॥ २१ ॥ तुम सब लोगोंने बड़ी सावधानीसे अर्जुनको घेर लिया था। फिर सब-के-सब पराजित कैसे हो गये? तुमने सिंधुराजको आश्रय दिया था। फिर तुम्हारे बीचमें वह कैसे मारा गया? ॥ २१ ॥

कथं त्वयि च कर्णे च कृपे शल्ये च जीवति ।

अश्वत्थाम्नि च कौरव्य निधनं सैन्धवोऽगमत् ॥ २२ ॥ कुरुनन्दन! तुम और कर्ण तो नहीं मर गये थे, कृपाचार्य, शल्य और अश्वत्थामा तो जीवित थे; फिर तुम्हारे रहते सिंधुराजकी मृत्यु क्यों हुई? ॥ २२ ॥

युध्यन्तः सर्वराजानस्तेजस्तिग्ममुपासते । सिन्धुराजं परित्रातुं स वो मध्ये कथं हतः ॥ २३ ॥ युद्ध करते हुए समस्त राजा सिंधुराजकी रक्षाके लिये प्रचण्ड तेजका आश्रय लिये हुए थे। फिर वह आपलोगोंके बीचमें कैसे मारा गया? ॥ २३ ॥

मय्येव हि विशेषेण तथा दुर्योधन त्वयि । आशंसत परित्राणमर्जुनात् स महीपतिः ॥ २४ ॥ दुर्योधन! राजा जयद्रथ विशेषतः मुझपर और तुमपर ही अर्जुनसे अपनी जीवन-रक्षाका भरोसा किये बैठा था ॥

ततस्तस्मिन् परित्राणमलब्धवति फाल्गुनात् । न किंचिदनुपश्यामि जीवितस्थानमात्मनः ॥ २५ ॥ तो भी जब अर्जुनसे उसकी रक्षा न की जा सकी, तब मुझे अब अपने जीवनकी रक्षाके लिये भी कोई स्थान दिखायी नहीं देता ॥ २५ ॥

मज्जन्तमिव चात्मानं धृष्टद्युम्नस्य किल्बिषे । पश्याम्यहत्वा पञ्चालान् सह तेन शिखण्डिना ॥ २६ ॥ मैं धृष्टद्युम्न और शिखण्डीसहित समस्त पांचालोंका वध न करके अपने-आपको धृष्टद्युम्नके पापपूर्ण संकल्पमें डूबता-सा देख रहा हूँ ॥ २६ ॥

तन्मां किमभितप्यन्तं वाक्शरैरेव कृन्तसि । अशक्तः सिन्धुराजस्य भूत्वा त्राणाय भारत ॥ २७ ॥ भारत! ऐसी दशामें तुम स्वयं सिंधुराजकी रक्षामें असमर्थ होकर मुझे अपने वाग्बाणोंसे क्यों छेद रहे हो? मै तो स्वयं ही संतप्त हो रहा हूँ ॥ २७ ॥

सौवर्णं सत्यसंधस्य ध्वजमक्लिष्टकर्मणः । अपश्यन् युधि भीष्मस्य कथमाशंससे जयम् ॥ २८ ॥ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले सत्यप्रतिज्ञ भीष्मके सुवर्णमय ध्वजको अब युद्धस्थलमें फहराता न देखकर भी तुम विजयकी आशा कैसे करते हो? ॥ २८ ॥

मध्ये महारथानां च यत्राहन्यत सैन्धवः । हतो भूरिश्रवाश्चैव किं शेषं तत्र मन्यसे ॥ २९ ॥ जहाँ बड़े-बड़े महारथियोंके बीच सिंधुराज जयद्रथ और भूरिश्रवा मारे गये, वहाँ तुम किसके बचनेकी आशा करते हो? ॥ २९ ॥

कृप एव च दुर्धर्षो यदि जीवति पार्थिव । यो नागात् सिन्धुराजस्य वर्त्म तं पूजयाम्यहम् ॥ ३० ॥

पृथ्वीपते! दुर्धर्ष वीर कृपाचार्य यदि जीवित हैं, यदि सिंधुराजके पथपर नहीं गये हैं तो मैं उनके बल और सौभाग्यकी प्रशंसा करता हूँ॥ ३०॥
यत्रापश्यं हतं भीष्मं पश्यतस्तेऽनुजस्य वै ।
दुःशासनस्य कौरव्य कुर्वाणं कर्म दुष्करम् ॥ ३१ ॥
अवध्यकल्पं संग्रामे देवैरपि सवासवैः ।
न ते वसुन्धरास्तीति तदाहं चिन्तये नृप ॥ ३२ ॥
कुरुनन्दन! नरेश! जिन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी युद्धमें नहीं मार सकते थे, दुष्कर कर्म करनेवाले उन्हीं भीष्मको जबसे मैंने तुम्हारे छोटे भाई दुःशासनके देखते-देखते मारा गया देखा है, तबसे मैं यही सोचता हूँ कि अब यह पृथ्वी तुम्हारे अधिकारमें नहीं रह सकती॥ ३१-३२॥
इमानि पाण्डवानां च सृञ्जयानां च भारत ।
अनीकान्याद्रवन्ते मां सहितान्यद्य भारत ॥ ३३ ॥
भारत! वह देखो, पाण्डवों और सृंजयोंकी सेनाएँ एक साथ मिलकर इस समय मुझपर चढ़ी आ रही हैं॥ ३३॥
नाहत्वा सर्वपञ्चालान् कवचस्य विमोक्षणम् ।
कर्तास्मि समरे कर्म धार्तराष्ट्र हितं तव ॥ ३४ ॥
दुर्योधन! अब मैं समस्त पांचालोंको मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा। मैं समरांगणमें वही कार्य करूँगा, जिससे तुम्हारा हित हो॥ ३४॥
राजन् ब्रूयाः सुतं मे त्वमश्वत्थामानमाहवे ।
न सोमकाः प्रमोक्तव्या जीवितं परिरक्षता ॥ ३५ ॥
राजन्! तुम मेरे पुत्र अश्वत्थामासे जाकर कहना कि ‘वह युद्धमें अपने जीवनकी रक्षा करते हुए जैसे भी हो, सोमकोंको जीवित न छोड़े’॥ ३५॥
यच्च पित्रानुशिष्टोऽसि तद् वचः परिपालय ।
आनृशंस्ये दमे सत्ये चार्जवे च स्थिरो भव ॥ ३६ ॥
यह भी कहना कि ‘पिताने जो तुम्हें उपदेश दिया है, उसका पालन करो। दया, दम, सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंमें स्थिर रहो॥ ३६॥
धर्मार्थकामकुशलो धर्मार्थावप्यपीडयन् ।
धर्मप्रधानकार्याणि कुर्याश्चेति पुनः पुनः ॥ ३७ ॥
‘तुम धर्म, अर्थ और कामके साधनमें कुशल हो। अतः धर्म और अर्थको पीड़ा न देते हुए बारंबार धर्मप्रधान कर्मोंका ही अनुष्ठान करो॥ ३७॥
चक्षुर्मनोभ्यां संतोष्य विप्राः पूज्याश्च शक्तितः ।
न चैषां विप्रियं कार्यं ते हि वह्निशिखोपमाः ॥ ३८ ॥

'विनयपूर्ण दृष्टि और श्रद्धायुक्त हृदयसे ब्राह्मणोंको संतुष्ट रखना, यथाशक्ति उनका आदर-सत्कार करते रहना। कभी उनका अप्रिय न करना; क्योंकि वे अग्निकी ज्वालाके समान तेजस्वी होते हैं' ॥ ३८ ॥ एष त्वहमनीकानि प्रविशाम्यरिसूदन । रणाय महते राजंस्त्वया वाक्शरपीडितः ॥ ३९ ॥ राजन्! शत्रुसूदन! अब मैं तुम्हारे वाग्बाणोंसे पीड़ित हो महान् युद्धके लिये शत्रुओंकी सेनामें प्रवेश करता हूँ ॥ ३९ ॥ त्वं च दुर्योधन बलं यदि शक्तोऽसि पालय । रात्रावपि च योत्स्यन्ते संरब्धाः कुरुसृञ्जयाः ॥ ४० ॥ दुर्योधन! यदि तुममें शक्ति हो तो सेनाकी रक्षा करना; क्योंकि इस समय क्रोधमें भरे हुए कौरव और सृंजय रात्रिमें भी युद्ध करेंगे ॥ ४० ॥ एवमुक्त्वा ततः प्रायाद् द्रोणः पाण्डवसृञ्जयान् । मुष्णन् क्षत्रियतेजांसि नक्षत्राणामिवांशुमान् ॥ ४१ ॥ जैसे सूर्य नक्षत्रोंके तेज हर लेते हैं, उसी प्रकार क्षत्रियोंके तेजका अपहरण करते हुए आचार्य द्रोण दुर्योधनसे पूर्वोक्त बातें कहकर पाण्डवों और सृंजयोंसे युद्ध करनेके लिये चल दिये ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणवाक्ये एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें द्रोणवाक्यविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥

१५२-

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

दुर्योधन और कर्णकी बातचीत तथा पुनः युद्धका आरम्भ

संजय उवाच

ततो दुर्योधनो राजा द्रोणेनैवं प्रचोदितः ।
अमर्षवशमापन्नो युद्धायैव मनो दधे ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर द्रोणाचार्यसे इस प्रकार प्रेरित हो अमर्षमें भरे हुए राजा दुर्योधनने मन-ही-मन युद्ध करनेका ही निश्चय किया ॥ १ ॥

अब्रवीच्च तदा कर्णं पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
पश्य कृष्णसहायेन पाण्डवेन किरीटिना ॥ २ ॥
आचार्यविहितं व्यूहं भित्त्वा देवैः सुदुर्भिदम् ।
तव व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥
मिषतां योधमुख्यानां सैन्धवो विनिपातितः ।
उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने कर्णसे इस प्रकार कहा—‘कर्ण! देखो, श्रीकृष्णसहित पाण्डुपुत्र अर्जुनने आचार्यद्वारा निर्मित व्यूहको, जिसका भेदन करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था, भेदकर तुम्हारे और महात्मा द्रोणके युद्धमें तत्पर रहते हुए भी मुख्य-मुख्य योद्धाओंके देखते-देखते सिंधुराज जयद्रथको मार गिराया है ॥ २-३ १/२ ॥

पश्य राधेय पृथ्वीशाः पृथिव्यां प्रवरा युधि ॥ ४ ॥
पार्थेनैकेन निहताः सिंहेनेवेतरे मृगाः ।
‘राधानन्दन! देखो, जैसे सिंह दूसरे वन्य पशुओंका संहार कर डालता है, उसी प्रकार एकमात्र कुन्तीकुमार अर्जुनद्वारा मारे गये ये भूमण्डलके श्रेष्ठ भूपाल युद्धभूमिमें पड़े हैं ॥ ४ १/२ ॥

मम व्यायच्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः ॥ ५ ॥ अल्पावशेषं सैन्यं मे कृतं शक्रात्मजेन ह । 'मेरे और महात्मा द्रोणके परिश्रमपूर्वक युद्ध करते रहनेपर भी इन्द्रपुत्र अर्जुनने मेरी सेनाको अल्प-मात्रामें ही जीवित छोड़ा है (अधिकांश सेनाको तो मार ही डाला है) ।। ५१/२ ।।

कथं नियच्छमानस्य द्रोणस्य युधि फाल्गुनः ॥ ६ ॥ भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानोऽपि संयुगे । प्रतिज्ञाया गतः पारं हत्वा सैन्धवमर्जुनः ॥ ७ ॥ 'यदि इस युद्धमें आचार्य द्रोण अर्जुनको रोकनेकी पूरी चेष्टा करते तो प्रयत्न करनेपर भी वे समरांगणमें उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? सिंधुराजको मारकर अर्जुन अपनी प्रतिज्ञाके भारसे मुक्त हो गये ।।

पश्य राधेय पृथ्वीशान् पृथिव्यां पातितान् बहून् । पार्थेन निहतान् संख्ये महेन्द्रोपमविक्रमान् ॥ ८ ॥ 'राधाकुमार! संग्रामभूमिमें पार्थके मारे और पृथ्वीपर गिराये हुए इन बहुसंख्यक भूपतियोंको देखो, ये सब-के-सब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे ।। ८ ।।

अनिच्छतः कथं वीर द्रोणस्य युधि पाण्डवः । भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानस्य शुष्मिणः ॥ ९ ॥ ‘वीर! यदि बलवान् द्रोणाचार्य पूरा प्रयत्न करके उन्हें व्यूहमें नहीं घुसने देना चाहते तो वे उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? ॥ ९ ॥ दयितः फाल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः । ततोऽस्य दत्तवान् द्वारमयुद्धेनैव शत्रुहन् ॥ १० ॥ ‘शत्रुसूदन! किंतु अर्जुन तो महात्मा आचार्य द्रोणको सदा ही परम प्रिय हैं। इसीलिये उन्होंने युद्ध किये बिना ही उन्हें व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया ॥ १० ॥ अभयं सिन्धुराजाय दत्त्वा द्रोणः परंतपः । प्रादात् किरीटिने द्वारं पश्य निर्गुणतां मयि ॥ ११ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्यने सिंधुराजको अभय-दान देकर भी किरीटधारी अर्जुनको व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया। देखो, मुझमें कितनी गुणहीनता है ॥ यद्यदास्यदनुज्ञां वै पूर्वमेव गृहान् प्रति । प्रस्थातुं सिन्धुराजस्य नाभविष्यज्जनक्षयः ॥ १२ ॥ ‘यदि उन्होंने पहले ही सिंधुराजको घर जानेकी आज्ञा दे दी होती तो यह इतना बड़ा जनसंहार नहीं होता ॥ १२ ॥ जयद्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान् प्रति । मयानानार्येण संरुद्धो द्रोणात् प्राप्याभयं सखे ॥ १३ ॥ ‘सखे! जयद्रथ अपनी जीवनरक्षाके लिये घरकी ओर पधार रहे थे, परंतु मुझ अधमने ही द्रोणाचार्यसे अभय पाकर उन्हें रोक लिया ॥ १३ ॥ (रक्षामि सैन्धवं युद्धे नैनं प्राप्स्यति फाल्गुनः । मम सैन्यविनाशाय रुद्धो विप्रेण सैन्धवः ॥ ‘मैं युद्धमें सिंधुराजकी रक्षा करूँगा; अर्जुन उसे नहीं पा सकेंगे’ ऐसा कहकर इस ब्राह्मणने मेरी सेनाका संहार करानेके लिये सिंधुराजको रोक लिया। तस्य मे मन्दभाग्यस्य यतमानस्य संयुगे । हतानि सर्वसैन्यानि हतो राजा जयद्रथः ॥ ‘युद्धमें प्रयत्न करनेपर भी मुझ भाग्यहीनकी सारी सेनाएँ नष्ट हो गयीं और राजा जयद्रथ भी मार डाले गये। पश्य योधवरान् कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । पार्थनामाङ्कितैर्बाणैः सर्वे नीता यमक्षयम् ॥ ‘कर्ण! इन सैकड़ों-हजारों श्रेष्ठ योद्धाओंको देखो, ये सब-के-सब अर्जुनके नामसे अंकित बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचाये गये हैं। कथमेकरथेनाजौ बहूनां नः प्रपश्यताम् ।

विपन्नः सैन्धवो राजा योधाश्चैव सहस्रशः ॥)
'हम बहुसंख्यक योद्धा देखते ही रह गये और युद्धस्थलमें एकमात्र रथकी सहायतासे अर्जुनने मेरे इन सहस्रों योद्धाओं तथा सिंधुराज जयद्रथको भी मार डाला। यह कैसे सम्भव हुआ।
अद्य मे भ्रातरः क्षीणाश्चित्रसेनादयो रणे ।
भीमसेनं समासाद्य पश्यतां नो दुरात्मनाम् ॥ १४ ॥
'आज युद्धमें हम दुरात्माओंके देखते-देखते मेरे चित्रसेन आदि भाई भीमसेनसे भिड़कर नष्ट हो गये' ॥

कर्ण उवाच

आचार्यं मा विगर्हस्व शक्त्यासौ युध्यते द्विजः ।
यथाबलं यथोत्साहं त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ १५ ॥
कर्ण बोला— भाई! तुम आचार्यकी निन्दा न करो। वह ब्राह्मण तो अपने बल, शक्ति और उत्साहके अनुसार प्राणोंका भी मोह छोड़कर युद्ध करता ही है ॥
यद्येनं समतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः ।
नात्र सूक्ष्मोऽपि दोषः स्यादाचार्यस्य कथंचन ॥ १६ ॥
यदि श्वेतवाहन अर्जुन आचार्य द्रोणका उल्लंघन करके सेनामें घुस गये तो इसमें किसी प्रकार आचार्यका कोई सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म दोष नहीं है ॥ १६ ॥
कृती दक्षो युवा शूरः कृतास्त्रो लघुविक्रमः ।
दिव्यास्त्रयुक्तमास्थाय रथं वानरलक्षणम् ॥ १७ ॥
कृष्णेन च गृहीताश्वमभेद्यकवचावृतः ।
गाण्डीवमजरं दिव्यं धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १८ ॥
प्रवर्षन् निशितान् बाणान् बाहुद्रविणदर्पितः ।
यदर्जुनोऽभ्ययाद् द्रोणमुपपन्नं हि तस्य तत् ॥ १९ ॥
अर्जुन अस्त्रविद्याके विद्वान्, दक्ष, युवावस्थासे सम्पन्न, शूरवीर, अनेक दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और शीघ्रता-पूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले हैं। वे दिव्यास्त्रोंसे सम्पन्न एवं वानरध्वजसे उपलक्षित रथपर बैठे हुए थे। श्रीकृष्णने उनके घोड़ोंकी बागडोर ले रखी थी। वे अभेद्य कवचसे सुरक्षित थे। उन्हें अपने बाहुबलका अभिमान है ही। ऐसी दशामें पराक्रमी अर्जुन कभी जीर्ण न होनेवाले दिव्य गाण्डीव धनुषको लेकर तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए यदि वहाँ आचार्य द्रोणको लाँघ गये तो वह उनके योग्य ही कर्म था ॥ १७—१९ ॥
आचार्यः स्थविरो राजन् शीघ्रयाने तथाक्षमः ।
बाहुव्यायामचेष्टायामशक्तस्तु नराधिप ॥ २० ॥

राजन्! नरेश्वर! आचार्य द्रोण अब बूढ़े हुए। वे शीघ्रतापूर्वक चलनेमें भी असमर्थ हैं। भुजाओंद्वारा परिश्रमपूर्वक की जानेवाली प्रत्येक चेष्टामें अब उनकी शक्ति उतनी काम नहीं देती है ॥ २० ॥

तेनैवमभ्यतिक्रान्तः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
तस्य दोषं न पश्यामि द्रोणस्यानेन हेतुना ॥ २१ ॥
इसीलिये श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, वे श्वेतवाहन अर्जुन द्रोणाचार्यको लाँघ गये। यही कारण है कि मैं इसमें द्रोणाचार्यका दोष नहीं देख रहा हूँ ॥ २१ ॥

अजय्यान् पाण्डवान् मन्ये द्रोणेनास्त्रविदा मृधे ।
तथा ह्येनमतिक्रम्य प्रविष्टः श्वेतवाहनः ॥ २२ ॥
मैं तो ऐसा मानता हूँ कि अस्त्रवेत्ता होनेपर भी द्रोण युद्धमें पाण्डवोंको नहीं जीत सकते, तभी तो उन्हें लाँघकर श्वेतवाहन अर्जुन व्यूहमें घुस गये ॥ २२ ॥

दैवादिष्टेऽन्यथाभावो न मन्ये विद्यते क्वचित् ।
यतो नो युध्यमानानां परं शक्त्या सुयोधन ॥ २३ ॥
सैन्धवो निहतो युद्धे दैवमत्र परं स्मृतम् ।
सुयोधन! दैवके विधानमें कहीं कोई उलट-फेर नहीं हो सकता, यह मेरी मान्यता है; क्योंकि हमलोग सम्पूर्ण शक्ति लगाकर युद्ध कर रहे थे, तो भी रणभूमिमें सिंधुराज मारे गये। इस विषयमें दैव (प्रारब्ध)-को ही प्रधान माना गया है ॥ २३ १/२ ॥

परं यत्नं कुर्वतां च त्वया सार्धं रणाजिरे ॥ २४ ॥
हत्वास्माकं पौरुषं वै दैवं पश्चात् करोति नः ।
सततं चेष्टमानानां निकृत्या विक्रमेण च ॥ २५ ॥
समरांगणमें तुम्हारे साथ हमलोग भी विजयके लिये महान् प्रयत्न करते हैं, छल-कपट तथा पराक्रमद्वारा भी सदा विजयकी चेष्टामें लगे रहते हैं, तो भी दैव हमारे पुरुषार्थको नष्ट करके हमें पीछे धकेल देता है ॥

दैवोपसृष्टः पुरुषो यत् कर्म कुरुते क्वचित् ।
कृतं कृतं हि तत्कर्म दैवेन विनिपात्यते ॥ २६ ॥
दैव या दुर्भाग्यका मारा हुआ पुरुष कहीं जो भी कर्म करता है, उसके किये हुए प्रत्येक कर्मको दैव उलट देता है ॥ २६ ॥

यत् कर्तव्यं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ।
तत् कार्यमविशङ्केन सिद्धिर्देवे प्रतिष्ठिता ॥ २७ ॥
मनुष्यको सदा उद्योगशील होकर निःशंकभावसे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये; परंतु उसकी सिद्धि दैवके ही अधीन है ॥ २७ ॥

निकृत्या वञ्चिताः पार्था विषयौघैश्च भारत ।
दग्धा जतुगृहे चापि द्यूतेन च पराजिताः ॥ २८ ॥

राजनीतिं व्यपाश्रित्य प्रहिताश्चैव काननम्। यत्नेन च कृतं तत्तद् दैवेन विनिपातितम्॥ २९॥ भारत! हमलोगोंने कपट करके कुन्तीकुमारोंको छला, उन्हें मारनेके लिये विषका प्रयोग किया, लाक्षागृहमें जलाया, जूएमैं हराया और राजनीतिका सहारा लेकर उन्हें वनमें भी भेजा। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक किये हुए हमारे उन सभी कार्योंको दैवने नष्ट कर दिया॥ २८-२९॥

युध्यस्व यत्नमास्थाय दैवं कृत्वा निरर्थकम्। यततस्तव तेषां च दैवं मार्गेण यास्यति॥ ३०॥ फिर भी तुम दैवको व्यर्थ समझकर प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे और पाण्डवोंके अपनी-अपनी विजयके लिये प्रयत्न करते रहनेपर दैव अपने गन्तव्य मार्गसे जाता रहेगा॥ ३०॥

न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित्। दुष्कृतं तव वा वीर बुद्ध्या हीनं कुरूद्वह॥ ३१॥ वीर कुरुश्रेष्ठ! मुझे तो पाण्डवोंका बुद्धिपूर्वक किया हुआ कहीं कोई सुकृत नहीं दिखायी देता अथवा तुम्हारा बुद्धिहीनतापूर्वक किया हुआ कोई दुष्कृत भी देखनेमें नहीं आता॥ ३१॥

दैवं प्रमाणं सर्वस्य सुकृतस्येतरस्य वा। अनन्यकर्म दैवं हि जागर्ति स्वपतामपि॥ ३२॥ सुकृत हो या दुष्कृत, सबपर दैवका ही अधिकार है; वही उसका फल देनेवाला है। अपना ही पूर्वकृत कर्म दैव है, जो मनुष्योंके सो जानेपर भी जागता रहता है॥ ३२॥

बहूनि तव सैन्यानि योधाश्च बहवस्तव। न तथा पाण्डुपुत्राणामेवं युद्धमवर्तत॥ ३३॥ पहले तुम्हारे पास बहुत-सी सेनाएँ और बहुत-से योद्धा थे। पाण्डवोंके पास उतने सैनिक नहीं थे। इस अवस्थामें युद्ध आरम्भ हुआ था॥ ३३॥

तैरल्पैर्बहवो यूयं क्षयं नीताः प्रहारिणः। शङ्के दैवस्य तत् कर्म पौरुषं येन नाशितम्॥ ३४॥ तथापि उन अल्पसंख्यकोंने तुम बहुसंख्यक योद्धाओंको क्षीण कर दिया। मैं समझता हूँ, वह दैवका ही कर्म है; जिसने तुम्हारे पुरुषार्थका नाश कर दिया है॥ ३४॥

संजय उवाच

एवं सम्भाषमाणानां बहु तत् तज्जनाधिप। पाण्डवानामनीकानि समदृश्यन्त संयुगे॥ ३५॥

संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार जब कर्ण और दुर्योधन परस्पर बहुत-सी बातें कर रहे थे, उसी समय युद्धस्थलमें पाण्डवोंकी सेनाएँ दिखायी दीं ॥ ३५ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं व्यतिषक्तरथद्विपम् ।
तावकानां परैः सार्धं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ३६ ॥
राजन्! तदनन्तर आपकी कुमन्त्रणाके अनुसार आपके पुत्रोंका शत्रुओंके साथ घोर युद्ध छिड़ गया, जिसमें रथसे रथ और हाथीसे हाथी भिड़ गये थे ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि पुनर्युद्धारम्भे
द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें पुनः युद्धारम्भविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं।)

(घटोत्कचवधपर्व)

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(घटोत्कचवधपर्व)

त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-पाण्डव-सेनाका युद्ध, दुर्योधन और युधिष्ठिरका संग्राम तथा दुर्योधनकी पराजय

संजय उवाच

तदुदीर्णं गजानीकं बलं तव जनाधिप ।
पाण्डुसेनामतिक्रम्य योधयामास सर्वतः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**जनेश्वर! आपकी प्रचण्ड गजसेना पाण्डव-सेनाका उल्लंघन करके सब ओर फैलकर युद्ध करने लगी ॥ १ ॥

पञ्चालाः कुरवश्चैव योधयन्तः परस्परम् ।
यमराष्ट्राय महते परलोकाय दीक्षिताः ॥ २ ॥
पांचाल और कौरव योद्धा महान् यमराज्य एवं परलोककी दीक्षा लेकर परस्पर युद्ध करने लगे ॥ २ ॥

शूराः शूरैः समागम्य शरतोमरशक्तिभिः ।
विव्यधुः समरेऽन्योन्यं निन्युश्चैव यमक्षयम् ॥ ३ ॥
एक पक्षके शूरवीर दूसरे पक्षके शूरवीरोंसे भिड़कर बाण, तोमर और शक्तियोंसे समरभूमिमें एक-दूसरेको चोट पहुँचाने और यमलोक भेजने लगे ॥ ३ ॥

रथिनां रथिभिः सार्धं रुधिरस्रावदारुणम् ।
प्रावर्तत महत् युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ॥ ४ ॥
परस्पर प्रहार करनेवाले रथियोंका रथियोंके साथ महान् युद्ध होने लगा, जो खूनकी धारा बहानेके कारण अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था ॥ ४ ॥

वारणाश्च महाराज समासाद्य परस्परम् ।
विषाणैर्दारयामासुः सुसंक्रुद्धा मदोत्कटाः ॥ ५ ॥
महाराज! अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मदमत्त हाथी परस्पर भिड़कर दाँतोंके प्रहारसे एक-दूसरेको विदीर्ण करने लगे ॥

हयारोहान् हयारोहाः प्रासशक्तिपरश्वधैः ।
बिभिदुस्तुमुले युद्धे प्रार्थयन्तो महत् यशः ॥ ६ ॥