महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1104, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनिच्छतः कथं वीर द्रोणस्य युधि पाण्डवः । भिन्द्यात् सुदुर्भिदं व्यूहं यतमानस्य शुष्मिणः ॥ ९ ॥ ‘वीर! यदि बलवान् द्रोणाचार्य पूरा प्रयत्न करके उन्हें व्यूहमें नहीं घुसने देना चाहते तो वे उस दुर्भेद्य व्यूहको कैसे तोड़ सकते थे? ॥ ९ ॥ दयितः फाल्गुनो नित्यमाचार्यस्य महात्मनः । ततोऽस्य दत्तवान् द्वारमयुद्धेनैव शत्रुहन् ॥ १० ॥ ‘शत्रुसूदन! किंतु अर्जुन तो महात्मा आचार्य द्रोणको सदा ही परम प्रिय हैं। इसीलिये उन्होंने युद्ध किये बिना ही उन्हें व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया ॥ १० ॥ अभयं सिन्धुराजाय दत्त्वा द्रोणः परंतपः । प्रादात् किरीटिने द्वारं पश्य निर्गुणतां मयि ॥ ११ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणाचार्यने सिंधुराजको अभय-दान देकर भी किरीटधारी अर्जुनको व्यूहमें घुसनेका मार्ग दे दिया। देखो, मुझमें कितनी गुणहीनता है ॥ यद्यदास्यदनुज्ञां वै पूर्वमेव गृहान् प्रति । प्रस्थातुं सिन्धुराजस्य नाभविष्यज्जनक्षयः ॥ १२ ॥ ‘यदि उन्होंने पहले ही सिंधुराजको घर जानेकी आज्ञा दे दी होती तो यह इतना बड़ा जनसंहार नहीं होता ॥ १२ ॥ जयद्रथो जीवितार्थी गच्छमानो गृहान् प्रति । मयानानार्येण संरुद्धो द्रोणात् प्राप्याभयं सखे ॥ १३ ॥ ‘सखे! जयद्रथ अपनी जीवनरक्षाके लिये घरकी ओर पधार रहे थे, परंतु मुझ अधमने ही द्रोणाचार्यसे अभय पाकर उन्हें रोक लिया ॥ १३ ॥ (रक्षामि सैन्धवं युद्धे नैनं प्राप्स्यति फाल्गुनः । मम सैन्यविनाशाय रुद्धो विप्रेण सैन्धवः ॥ ‘मैं युद्धमें सिंधुराजकी रक्षा करूँगा; अर्जुन उसे नहीं पा सकेंगे’ ऐसा कहकर इस ब्राह्मणने मेरी सेनाका संहार करानेके लिये सिंधुराजको रोक लिया। तस्य मे मन्दभाग्यस्य यतमानस्य संयुगे । हतानि सर्वसैन्यानि हतो राजा जयद्रथः ॥ ‘युद्धमें प्रयत्न करनेपर भी मुझ भाग्यहीनकी सारी सेनाएँ नष्ट हो गयीं और राजा जयद्रथ भी मार डाले गये। पश्य योधवरान् कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । पार्थनामाङ्कितैर्बाणैः सर्वे नीता यमक्षयम् ॥ ‘कर्ण! इन सैकड़ों-हजारों श्रेष्ठ योद्धाओंको देखो, ये सब-के-सब अर्जुनके नामसे अंकित बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचाये गये हैं। कथमेकरथेनाजौ बहूनां नः प्रपश्यताम् ।